एक समय था जब अनंत सिंह साधू बनने के लिए घर से निकल पड़े थे। नेता तो वह कतई नहीं बनना चाहते थे। लेकिन, कुछ ऐसा हुआ कि वह जुर्म की दुनिया में दाखिल हो गए।
नीतीश कुमार ने सांसद बनने के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने का फैसला किया तो उनके एक 'भक्त' विधायक ने चुनावी राजनीति से संन्यास लेने का फैसला कर लिया। उस विधायक का नाम है अनंत कुमार सिंह। जी हां, वही जिन्हें उनके इलाके में 'छोटे सरकार' और बाकी जगह बाहुबली अनंत सिंह के नाम से जाना जाता है।
एक समय था जब अनंत सिंह साधू बनने के लिए घर से निकल पड़े थे। नेता तो वह कतई नहीं बनना चाहते थे। लेकिन, कुछ ऐसा हुआ कि वह जुर्म की दुनिया में दाखिल हो गए। यहां उन्होंने अपनी स्थिति इतनी मजबूत कर ली कि नेताओं को काम के लगने लगे। नीतीश कुमार ने उनसे खूब काम लिया और यहीं से बाहुबली नेता बनने का उनका रास्ता खुल गया। पांच बार विधायक का चुनाव जीत चुके अनंत सिंह का मन अब चुनावी राजनीति से भर गया है।
अनंत सिंह नीतीश के जरिए ही राजनीति में आए थे। कुछ समय के लिए नीतीश से उनका मोह भंग हुआ था, लेकिन बाद में वह फिर उन्हीं के खेमे में लौट आए।
यह बात सालों पुरानी है। बिहार के एक गांव के मुखिया बिरंची सिंह की हत्या कर दी गई। हत्या करने वाला नक्सल समर्थक था। वह कत्ल करके फरार हो गया। पुलिस उसे ढूंढ नहीं सकी। हत्यारा कौन था, यह सभी को पता था। फिर भी, वह पकड़ा नहीं जा रहा था। पुलिस की निष्क्रियता से बिरंची के परिवार का गुस्सा बढ़ रहा था। बिरंची के छोटे भाइयों में से एक ने हत्या का बदला लेने की ठान ली। एक दिन वह तैर कर गंगा नदी के पार गया और हत्यारे की हत्या करके लौट आया। यहीं से अनंत कुमार सिंह उर्फ 'छोटे सरकार' का एक अलग सफर शुरू हुआ।
दिसंबर 2008 में अनंत सिंह के एक एक और बड़े भाई फाजो सिंह की भी हत्या कर दी गई। शाम का वक्त था। बाढ़ के एक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स के पास मोटरसाइकिल पर सवार होकर चार बदमाश आए और फाजो सिंह व उनके बॉडीगार्ड को गोली मार कर चले गए। इस कत्ल के बाद अनंत सिंह भाइयों में अकेले रह गए।
अपराध के साथ राजनीति और 'समाज सेवा' भी चलती रही। सब जगह उनकी 'मांग' भी बढ़ती गई। मोकामा से विधायक बनने के बाद तो उनका रुतबा और बढ़ता ही चला गया। चुनाव के समय विरोधियों के बीच भी उनकी 'सेवा' पाने की होड़ मची रहती थी।
अनंत सिंह ने एक बार नीतीश कुमार पर भड़कते हुए कहा था, 'नीतीश ने मुझे राजनीति में फंसा दिया है। नीतीश ने पहले कहा तीन महीना, फिर छह महीना…लेकिन अब तो लगता है यह सदा के लिए हो गया है। मैं लौटना चाहता हूं। राजनीति आपको झूठा बना देता है। मैं धार्मिक इंसान हूं। झूठ नहीं बोलना चाहता। नीतीश कुमार ने अच्छा नहीं किया। मुझे बरगलाया गया। मैं जाऊंगा और अपने लोगों की मदद करूंगा।' लेकिन, यह कहने की बात थी। वह लगातार विधान सभा जाते रहे। बीच-बीच में जेल की भी यात्रा होती रही।
अनंत सिंह ने सौ करोड़ रुपये से भी ज्यादा की घोषित संपत्ति बना ली है। उन्होंने हाथी-घोड़े पाल रखे हैं और करीब पौने तीन करोड़ रुपये की एक कार भी रखी हुई है। करीब दो करोड़ की बाकी कारें भी घर में हैं। पति-पत्नी के पास 850 ग्राम सोना भी है। उन पर 1979 से 2025 के बीच दर्ज 28 मुकदमे भी लंबित हैं।
अनंत सिंह की राजनीतिक यात्रा नीतीश कुमार से उनकी करीबी के साथ ही शुरू हुई थी, लेकिन जब 'छोटे सरकार' की हरकतें 'सुशासन बाबू' की छवि बनाने में लगे नीतीश कुमार पर भारी पड़ने लगीं, तो उन्होंने पल्ला झाड़ते हुए उनको सलाखों के अंदर भी भिजवा दिया।
नीतीश के राज में अनंत सिंह को कई सालों तक खुली छूट मिली हुई थी। पुलिस उन पर हाथ डालने से डरती थी।
मोकामा-बाढ़ में 'छोटे सरकार' की तूती बोलती थी। वह खुले आम दुकानदारों को धमकाते और उनसे उनकी दुकानें अपने नाम कर देने के लिए कहते। बाकी गैंगस्टर भी नीतीश की छवि खराब कर ही रहे थे। उन्हीं की पार्टी के एक गैंगस्टर विधायक ने नीतीश की नाक में दम कर रखा था। अनंत सिंह उनसे भी बड़ी मुसीबत बन रहे थे। नीतीश ने दोनों पर नकेल कसी। इसके बाद तो वर्षों से धूल फांक रहीं फाइलें भी निकाली जाने लगीं और केवल बिहार पुलिस ही नहीं, ईडी-सीबीआई तक सक्रिय हो गईं।
इतना सब कुछ होने के बाद भी 65 साल के अनंत सिंह नीतीश के प्रति लगभग वफादार ही बने रहे। लेकिन, चुनावी राजनीति से हटने का ऐलान शायद उनकी किसी दूसरी योजना का हिस्सा हो।
बिहार में एक बाहुबली विधायक ऐसे भी थे जो बीवी-बच्चों के साथ पटना के फाइव स्टार होटल में चले जाते थे, वहां जम कर खाते-पीते और जब बिल देने की बारी आती तो रौब दिखाते हुए निकल जाते थे। बिल मांगने पर होटल स्टाफ को जान से मार डालने की धमकी देते थे। इस बाहुबली का नाम था नरेंद्र कुमार उर्फ सुनील पांडे। वह भोजपुर के पीरो से समता पार्टी के विधायक भी हुआ करते थे।
2006 के मध्य की बात है। नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बने कुछ ही महीने हुए थे। उन्होंने राज्य को 'जंगल राज' से मुक्त करने का अभियान चला रखा था। सुनील पांडे जैसे बाहुबली नेताओं की हरकतें नीतीश के अभियान में पलीता लगा रही थीं।
एक बार सुनील पांडे ने होटल का बिल देने से मना किया तो स्टाफ ने टीवी पत्रकारों को फोन कर दिया। वे फौरन कैमरा-माइक लेकर पहुंच गए। सुनील पांडे का गुस्सा सातवें आसमान पर था। कुछ ही पल में टीवी पर स्टोरी चलने लगी। विपक्षी नेता भी सीएम के सुशासन के दावे की धज्जियां उड़ाते हुए बाइट देने लगे। एसएसपी कुंदन कृष्णन से किसी पत्रकार ने पूछा कि विधायक पर क्या कार्रवाई करेंगे? एसएसपी ने जवाब दिया- हमारे पास किसी ने शिकायत नहीं की है। नीतीश कुमार की भद पिट गई।
नीतीश जहां अपनी छवि चमकाना चाह रहे थे, वहीं उनके अपने भद पिटवा रहे थे। वह असमंजस में थे। एक ओर सीएम की छवि, दूसरी ओर मददगार अपने नेता। अंततः उन्होंने फैसला कर लिया। छवि खराब नहीं होने देना है। उन्होंने पुलिस को एक्शन लेने के लिए कह दिया।
जो पुलिस कह रही थी कि उसके पास किसी ने शिकायत नहीं की है, वह अचानक सक्रिय हो गई। उसने केस दर्ज किया, लेकिन आरोपी अंडरग्राउंड हो गया। नीतीश पर दांव उल्टा पड़ गया। मीडिया में कहा जाने लगा कि पुलिस सीएम की छवि बचाने के लिए झूठी कवायद कर रही है। वह भी तब जब पुलिस का बाहुबली नेताओं पर एक्शन जारी था।
एसएसपी कृष्णन ने आनंद मोहन सिंह को उठा लिया। सुनील पांडे ने इस पर भी सरकार की भद पिटवा दी। उन्होंने बयान दिया- कृष्णन ने मेरे साथ ऐसा किया होता तो मैं उसे गोली मार देता। पांडे अंदर ही अंदर नीतीश पर भी दवाब बनाने की कवायद में लगे थे। पार्टी को खबर मिली कि वह विधायकों को गोलबंद करने में लगे हैं। उन्हें पार्टी से निलंबित किया गया और पुलिस को उनके खिलाफ सक्रिय किया गया। कोर्ट से भी एक मामले में अग्रिम जमानत की उनकी याचिका खारिज हो गई। इसके बाद पांडे ठंडा पड़े।