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कभी कांपते हाथों से पहली बार लगाई थी लिपस्टिक, अब बन गईं परिवार की रीढ़

रूढ़ियों को मात देकर कश्मीर की बेटियां लिख रही कामयाबी की नई तस्वीर। पढ़ें पत्रिका रिपोर्टर विकास सिंह की ग्राउंड रिपोर्ट...
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कश्मीर में बदलाव (फोटो- पत्रिका)

पहली बार लिपस्टिक हाथ में आई, तो समझ नहीं आया कि इसे लगाते कैसे हैं। पहली बार बिना हिजाब मेहमानों के सामने खड़ी हुईं, तो नजरें झुक गईं। सवाल घर से भी थे और पड़ोस से भी- 'होटल में क्या बर्तन मांजने जाएगी? लोग क्या कहेंगे?' लेकिन आज कश्मीर की सर्द हवाओं के बीच एक खामोश इंकलाब की बयार बह रही है। जिन सपनों को समाज ने बंदिशों की बेडिय़ों में कैद करना चाहा, आज वही सपने कश्मीर के हॉस्पिटैलिटी सेक्टर का चेहरा बन रहे हैं। जब प्रोफेशनल डिमांड के अनुरूप इन लड़कियों ने खुद को 'ग्रूम' किया, तो विरोध की एक लहर उठी। सोशल मीडिया पर लानतें भेजी गईं, लेकिन इन्होंने अपने ‘हौसले का मेकअप’ नहीं उतरने दिया। आज गुरेज की निशा हों या काजीकुंड की सेहरून- इनकी मुस्कान और शानदार सर्विस का ही जादू था कि सचिन तेंदुलकर भी सपरिवार इनके काम के मुरीद हो गए। यह सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि उस नए कश्मीर का घोषणापत्र है, जहां बेटियां परंपरा की चौखट लांघकर आर्थिक आजादी का नया इतिहास लिख रही हैं।

'बर्तन धोने नहीं, मुकाम बनाने आई हूं'

बांदीपोरा के गुरेज की निशा फैयाज ग्रेजुएशन के लिए 2023 में श्रीनगर आईं तो खर्च उठाना मुश्किल था। होटल में नौकरी की बात की, तो घर वाले बोले- 'बर्तन धोने जाएगी?' निशा ने परिवार को बिना बताए होटल में ट्रेनिंग ली। पहली सैलरी आई आने के बाद वीडियो कॉल पर सुरक्षित वर्किंग माहौल दिखाया, तब जाकर घरवालों की फिक्र फख्र में बदली। निशा कहती हैं, 'अनुच्छेद 370 के हटने के बाद बिना जोखिम काम करने की आजादी मिली।

पिता बीमार हुए तो घर की जिम्मेदारी उठाई

अनंतनाग के काजीकुंड की सहरून मुजफ्फर के पिता ड्राइवर हैं। जब पिता की तबीयत बिगड़ी, तो घर की जिम्मेदारी सेहरून के कंधों पर आ गई। साल 2024 में जब उन्होंने होटल इंडस्ट्री जॉइन की, तो रिश्तेदारों ने नाक सिकोड़ी। मेहमानों को 'नमस्ते' कहने पर उन्हें सोशल मीडिया पर बुरी तरह ट्रोल किया गया। लेकिन पिता बेटी के लिए ढाल बन गए। आज वही रिश्तेदार अब अपने बच्चों की नौकरी के लिए मुझसे सिफारिश लगवाते हैं।"

पहचान खोना नहीं, दुनिया की भाषा सीखना है

इस बदलाव का सबसे संवेदनशील मोड़ वह था, जब इन लड़कियों को पहली बार 'यूनिफॉर्म' और 'मेकअप' को अपनाना पड़ा। निशा बताती हैं कि बचपन से खुद को ढंककर रखने की आदत थी, इसलिए शुरुआत में यह सब अजीब लगा। सहरून कहती हैं, 'होटल इंडस्ट्री का एक प्रोटोकॉल होता है। हमें प्रेजेंटेबल दिखना है। यह दिखावा नहीं, प्रोफेशनल डिमांड है। हम हिजाब की अहमियत जानते हैं, लेकिन काम की अपनी जरूरतें होती हैं।' आज ये लड़कियां मेकअप, कम्युनिकेशन और गेस्ट हैंडलिंग को अपनी नई ताकत मानती हैं।

ग्लोबल स्टैंडर्ड को टक्कर

"शुरुआत में ये लड़कियां बहुत शर्मीली थीं, लेकिन आज मेरे स्टाफ में 70 फीसदी कश्मीरी लड़कियां हैं जो ग्लोबल स्टैंडर को टक्कर दे रही हैं। - केशो (टीम लीडर, नगालैंड)

पर्यटन अब बदलती अर्थव्यवस्था का नया इंजन

2023: 2.06 करोड़ पर्यटक (नया रेकॉर्ड)
2024: 2.36 करोड़ पर्यटक (ऐतिहासिक आंकड़ा)
2025: 1.77 करोड़ पर्यटक (चुनौतियों के बावजूद मजबूत आधार)

कश्मीर में आया टूरिज्म बूम इन लड़कियों के सपनों को पंख दे रहा है। पर्यटकों की आमद ने स्किल्ड प्रोफेशनल्स की मांग बढ़ा दी है। स्थानीय लड़कियां अब पारंपरिक पेशों से इतर हॉस्पिटैलिटी को करियर बना रही हैं, जिससे कश्मीर की 'माइक्रो इकोनॉमी' में सीधा योगदान मिल रहा है।

एक लाख फॉलोअर के साथ बनीं डिजिटल आइकॉन

सहरून मुजफ्फर आज घाटी की सोशल मीडिया स्टार हैं। इंस्टाग्राम पर उनके एक लाख से ज्यादा फॉलोअर हैं। जब ग्रूमिंग और बिना दुपट्टे के काम करने पर उन्हें ट्रोल किया गया, तो उनकी मां ने मोर्चा संभाला। मां ने दो-टूक कहा, 'मेरी बेटी घर चला रही है, क्या अब उसे भी घर में बिठा दें?' सहरून कहती हैं, 'जब मेरे प्रोफेशन का यही उसूल है कि मुझे प्रेजेंटेबल दिखना है, तो मैं धर्म को बीच में लाकर काम से समझौता क्यों करूं?' आज सेहरून उन हजारों लड़कियों के लिए एक प्रेरणा हैं जो अपने दम पर अपनी तकदीर लिखना चाहती हैं।

Updated on:
01 May 2026 08:53 am
Published on:
01 May 2026 08:49 am