राष्ट्रीय

महानगरों से मोहभंग, अब छोटे शहर बन रहे नए ‘जॉब पावरहाउस’

भारतीय कॉर्पोरेट जगत में अब लोगों को बड़े शहरों से मोहभंग हो रहा है और छोटे शहरों की ओर रुझान बढ़ रहा है। क्या कहते हैं ताज़ा आंकड़े? आइए नज़र डालते हैं।

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Mar 29, 2026
People in Jaipur (Photo - AI generated)

भारतीय कॉर्पोरेट जगत में एक बड़ा 'रिवर्स माइग्रेशन' देखा जा रहा है। अब भारत का जॉब मार्केट दिल्ली, मुंबई और बेंगलूरु जैसे महंगे महानगरों से खिसककर टियर-2 शहरों की तरफ बढ़ रहा है। 'फाउंडिट इनसाइट्स ट्रैकर' के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि जयपुर, इंदौर, कोयंबटूर, लखनऊ और भुवनेश्वर जैसे शहर अब देश के नए 'जॉब पावरहाउस' बनकर उभरे हैं। महानगरों में जहां नियुक्तियाँ ठहरी हुई हैं, वहीं इन उभरते शहरों में नई नौकरियों की मांग सालाना 15-20% की दर से बढ़ी हैं। हालांकि वेतन वृद्धि 5-8% पर स्थिर है।

कॉर्पोरेट रणनीति में बड़े बदलाव का संकेत

ये बदलाव कॉर्पोरेट रणनीति में बड़े बदलाव का संकेत है। कंपनियाँ अब महंगे महानगरों की बजाय कम लागत वाले शहरों में विस्तार कर रही हैं, जहाँ उन्हें सस्ता इंफ्रास्ट्रक्चर, स्थिर टैलेंट और बेहतर रिटेंशन मिल रहा है। साथ ही डिजिटल इकोनॉमी और रिमोट वर्क के बढ़ते प्रभाव ने भौगोलिक सीमाओं को भी काफी हद तक खत्म कर दिया है। कॉर्पोरेट जगत अब महानगरों के महंगे वर्क कल्चर की बजाय इन टियर-2 शहरों में अपनी क्षमताएं बढ़ा रहा है।

सस्टेनेबल हायरिंग की ओर एक बड़ा कदम

जयपुर अब सिर्फ पर्यटन का केंद्र नहीं, बल्कि स्टार्टअप्स और 'ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स' का नया ठिकाना बन गया है। वहीं इंदौर आइटी और सर्विस सेक्टर में अपनी धाक जमा रहा है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह बदलाव 'सस्टेनेबल हायरिंग' की ओर एक बड़ा कदम है, जहाँ कंपनियाँ वेतन की अंधी दौड़ में शामिल होने के बजाय एक मजबूत और स्थिर टैलेंट पाइपलाइन बनाने पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं।

महिलाओं के लिए अवसर - समावेशी रोजगार

नौकरियों के इस विकेंद्रीकरण का सबसे बड़ा लाभ महिलाओं और पहली पीढ़ी के स्नातकों को मिल रहा है। जिन्हें पहले कॅरियर के लिए घर छोडऩा पड़ता था, अब उनके घर के पास अवसर उपलब्ध हैं। इससे कंपनियों को कम एट्रिशन रेट (नौकरी छोडऩे की दर) और वफादार वर्कर्स मिल रहे हैं।

छोटे शहरों की ओर क्यों रुख कर रही कंपनियाँ?

स्थिर नियुक्ति-संतुलित वेतन ढांचा

कंपनियाँ अब भारी-भरकम बढ़ोतरी के जरिए 'वेतन युद्ध' के बजाय टिकाऊ नियुक्तियों पर ध्यान दे रही हैं। टियर-2 शहर कंपनियों को अपने मूल वेतन ढांचे को बिगाड़े बिना बड़े पैमाने पर टीम विस्तार की सुविधा देते हैं।

वर्क-लाइफ बैलेंस

छोटे शहरों में प्रोफेशनल ग्रोथ और फैमिली सपोर्ट सिस्टम के बीच किसी एक को नहीं चुनना पड़ता। आप दोनों को एक साथ हासिल कर सकते हैं।

अवसरों का नया वितरण

भारत का 'हायरिंग बूम' (भर्तियों का दौर) न सिर्फ विस्तार ले रहा है, बल्कि पुनर्वितरित हो रहा है। ऐसे में वहाँ जाने में लाभ है, जहाँ भविष्य के अवसर और करियर निर्माण की संभावनाएं सबसे तेज़ी से बढ़ रही हों।

ज़्यादा बचत

जयपुर या इंदौर जैसे शहरों में रहने का खर्च मेट्रो की तुलना में 40-50% कम है। मेट्रो शहरों में 1 लाख कमाने वाला व्यक्ति बचत के मामले में इन शहरों में 60-70 हज़ार कमाने वाले से पीछे रह जाता है। रहने की लागत कम होने से बचत ज्यादा है।

डिजिटल ने बदला भूगोल

डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन ने भूगोल की बाधाएं खत्म कर दी हैं। कंपनियाँ अब भौगोलिक सीमाओं में नहीं बंधी हैं। वो 'प्रीमियम सैलरी' देने के बजाय 'सस्टेनेबल टीम' बनाने पर खर्च कर रही हैं, जिससे रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं।

Published on:
29 Mar 2026 07:25 am
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