
70 के दशक में मुंबई के अंडरवर्ल्ड में कई गैंग काम कर रहे थे। इन सबके बीच बादशाहत कायम करने के लिए खूनी जंग लगातार चलती रहती थी। इनमें से दाऊद इब्राहिम वह नाम था जिसने बड़े-बड़े गैंगस्टर से सीधा पंगा लिया। उस समय एक डॉन हुआ करता था बाशु दादा। वह डॉन भी था और नेता भी। तेली मोहल्ला का वह खतरनाक गुंडा मामूली गुर्गे से डोंगरी का डॉन बना था। वह हर दोपहर अपनी महफिल सजाता था। उसे क्रिकेट मैच की कमेंट्री सुनने का बड़ा शौक था। इस महफिल में भी कमेंट्री चलती रहती थी। साथ ही, उसके पसंदीदा बादाम शर्बत का दौर भी चलता रहता था। विधान सभा चुनाव के वक्त एक दिन ऐसी ही एक महफिल में राशिद ने बताया कि मौलाना जियाउद्दीन बुखारी खतरा बन रहे हैं।
बाशु दादा का काम करने का तरीका थोड़ा अलग था। वह खून बहाने में कम यकीन रखता था। खौफ पैदा कर और पुलिस को मिला कर अपना काम निकालने में उसका ज्यादा यकीन था। उसने मौलाना की हार का इंतजाम कर लिया था।
चुनाव में हारने के बाद मौलाना बुखारी ने नई चाल चली। उन्होंने इब्राहिम कासकर (दाऊद के पिता) के साथ मिल कर 'यंग पार्टी' बना ली। इस पार्टी के जरिये मौलाना मुस्लिमों के बीच अपनी पैठ बनाए रखना चाहते थे। शुरू में उन्हें कुछ हद तक कामयाबी भी मिली, लेकिन मौलाना की चुनावी अपील कोर्ट में खारिज हो जाने के बाद यंग पार्टी को भी धक्का लगा। तब दाऊद इब्राहिम ने अपने फायदे के लिए पार्टी का इस्तेमाल करने की योजना बनाई और इसकी आड़ में अपने बुरे कामों का दायरा बढ़ाने लगा।
दाऊद ने बाशु से भी रार ठान रखी थी। उसके करीबी हामिद पर हमला करके उसने बाशु से खुली जंग छेड़ दी। धीरे-धीरे उसने बाशु का अखाड़ा खत्म कर दिया। बाशु ने आखिरकार दाऊद के आगे हथियार डाल दिए। इसके साथ ही अंडरवर्ल्ड में बादशाहत का नया दौर शुरू हुआ।
इसके बाद दाऊद की ताकत बढ़ती ही गई। 1977 में इकबाल की हत्या के बाद दाऊद थोड़ा कमजोर पड़ता लग रहा था। इकबाल उसका भरोसेमंद कारिंदा था। उसकी मौत से वह कमजोर पड़ने के साथ-साथ बौखला भी गया था। उसके बदले की आग में जल कर वह लगातार कत्ल करवा रहा था। तभी उसके गैंग में खालिद पहलवान की एंट्री हुई।
असल में दाऊद अपराध की दुनिया में आगे बढ़ा ही था अपने 'कलेजे' के दम पर। जिगर उसका था और हाथ कई लोगों के थे। इन्हीं में एक थे पत्रकार मोहम्मद इकबाल नातिक और सीनियर इंस्पेक्टर रणबीर लिक्खा।
दाऊद इब्राहिम उसकी जम कर तारीफ करता और खुले आम उसे दोस्त बताता था। दोनों एक ही जगह (रत्नागिरी) के थे, लेकिन उनकी दोस्ती की वजह जगह से ज्यादा 'हिम्मत' थी। दाऊद अपने दोस्तों को उसके बारे में बताते हुए कहता, 'बंदे में दम है।' नातिक भी दाऊद को गज़ब का साहसी बताता था।
डोंगरी थाने में रणबीर लिक्खा सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर हुआ करते थे। एक दोपहर वह थाने में बड़े परेशान बैठे थे। तभी नातिक वहां पहुंच गया। उसने लिक्खा से परेशानी की वजह पूछी। उन्होंने झुंझलाते हुए जवाब दिया, ये पठान या तो दूसरों को परेशान करते हैं या आपस में ही लड़ते रहते हैं। इनकी हरकतों से तो मैं तंग आ चुका हूं।'
पठान गैंग से परेशान लिक्खा को नातिक ने बड़े रहस्यमय अंदाज में समाधान सुझाया, 'साहब! शोले! लोहे को लोहा ही काटेगा!' लिक्खा सन्न रह गए। फिर थोड़ा संभले और पूछा, 'लेकिन पठान से टक्कर लेगा कौन?' नातिक ने इसका भी समाधान सुझा दिया और कहा, 'है एक लड़का- दाऊद इब्राहिम कासकर।'
यह नाम सुन कर लिक्खा को यकीन नहीं हो रहा था। लेकिन जैसे दाऊद अपने दोस्तों को नातिक के बारे में कहता था कि बंदे में दम है, वैसे ही नातिक ने इंस्पेक्टर से उसके बारे में कहा- पूरे इलाके में सबको पता है कि वह कितना साहसी है। इतना कह कर वह तो थाने से चला गया, लेकिन लिक्खा अब भी हैरान-परेशान ही थे। उन्हें दाऊद में अपनी परेशानी का हल नजर नहीं आ रहा था।
एक सुबह कुछ ऐसा हुआ कि दाऊद की हिम्मत को लेकर सीनियर इंस्पेक्टर लिक्खा का सारा शक गायब हो गया। वह गश्त पर थे। उनकी जीप खड़ा पारसी जंक्शन से जेजे हॉस्पिटल की तरफ मुड़ी। थोड़ी ही दूर पर भयंकर जाम लगा था। लिक्खा जीप से उतरे और जाम का कारण जानने के लिए आगे बढ़े। आगे उन्होंने जो देखा, उसे देख कर वह दंग रह गए।
सड़क पर एक पठान खून से लथपथ पड़ा था। उसके सिर और मुंह से खून बह रहा था। एक नौजवान लड़का उसे बेतहाशा पीट रहा था। लिक्खा को लगा कि यह कोई 'सड़क छाप लड़ाई' है। करीब जाकर उन्होंने मार रहे लड़के की फटी शर्ट पकड़ी और खींच कर पूछा, 'नाम क्या है तुम्हारा?' करीब 20 साल के उस लड़के ने इंस्पेक्टर की आंखों में आंख डालते हुए जवाब दिया, 'दाऊद। दाऊद इब्राहिम कासकर। पुलिसवाले का बेटा हूं।'
दाऊद का साहस इंस्पेक्टर ने अपनी आंखों से देख लिया था। अब उन्हें नातिक की बात याद आ रही थी। उन्होंने मन ही मन उसकी सलाह पर अमल करने की ठान ली थी। मन में कुछ और योजना बनाते हुए उन्होंने दाऊद को भीड़ से खींचते हुए कहा- चल, गाड़ी में बैठ। वह जीप में बैठ गया। बिना किसी डर और झिझक के उसने साथ के एक लड़के को आवाज लगाई- मेरे घर में बता देना आज आने में थोड़ी देर हो जाएगी।
जीप चल पड़ी थी और दाऊद की बगल में बैठे लिक्खा ने उसे पठान से लड़ने की पेशकश दे दी थी। उन्होंने कहा- तुम्हें पठानों से लड़ने में मजा आता है? दाऊद ने जवाब दिया- बात मजे की नहीं है, लड़ेंगे नहीं तो मार डाले जाएंगे। लिक्खा ने कहा- तो फिर हमारे लिए लड़ो। पठानों को हराओ। बाकी हम पर छोड़ दो।
एस. हुसैन जैदी ने अपनी किताब 'डोंगरी टु दुबई, सिक्स डिकेड्स ऑफ द मुंबई माफिया' में यह किस्सा बताते हुए लिखा है कि दाऊद को यह पेशकश अच्छी लगी। यहां पुलिस ही उसकी मदद करने की बात कह रही थी। अपनी ताकत बढ़ाने के लिए इससे अच्छा और क्या हो सकता था! इस तरह अंडरवर्ल्ड में सत्ता के एक नए समीकरण की नींव पड़ी और दाऊद के रूप में एक नया डॉन पैदा हुआ।
नातिक को इसकी कीमत जान देकर चुकानी पड़ी। पठान गैंग ने नातिक को उठा लिया और मार डाला। उसके कत्ल से दाऊद बौखला गया था।