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Pakistan Role: पाकिस्तान कैसे बनेगा ईरान-अमेरिका के बीच शांतिदूत ? पूर्व राजदूत ने खोल दी पूरी पोल

West Asia Crisis:पूर्व राजदूत दिनकर श्रीवास्तव ने कहा कि पाकिस्तान एक ईमानदार मध्यस्थ नहीं है। ईरान उसकी अमेरिका से नजदीकी के कारण उस पर भरोसा नहीं करता।

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Mar 26, 2026
यूएस इजराइल की ईरान के साथ जंग खत्म करने की जुगत। ( सांकेतिक फोटो: पत्रिका)

West Asia Diplomatic Crisis: पश्चिम एशिया ( West Asia) में जारी तनाव के बीच पाकिस्तान (Pakistan) द्वारा मध्यस्थता (Mediator) की खबरों ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। हालांकि, ईरान (Iran) में भारत के पूर्व राजदूत दिनकर श्रीवास्तव (Dinkar Srivastava) ने इन दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा है कि पाकिस्तान एक 'ईमानदार ब्रोकर' (Honest Broker) नहीं हो सकता। उनके अनुसार, अमेरिका (United States) के साथ पाकिस्तान की बढ़ती नजदीकी के कारण ईरान उस पर कभी भरोसा नहीं करेगा। पूर्व राजदूत दिनकर श्रीवास्तव ने एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा किया है। उन्होंने याद दिलाया कि पिछले साल जून में जब ईरान इजराइली हमलों (Israeli Attack) का सामना कर रहा था, ठीक उसी समय पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर (General Asim Munir) व्हाइट हाउस में लंच कर रहे थे। ईरान इस घटना को भूला नहीं है, इसलिए वह पाकिस्तान की किसी भी मध्यस्थता की पेशकश को संदेह की दृष्टि से देखता है। ईरान के लिए पाकिस्तान की छवि एक ऐसे देश की है जो अमेरिका के इशारों पर काम करता है।

अमेरिका का '15-सूत्री प्रस्ताव' और गतिरोध (Peace Proposal)

दिनकर श्रीवास्तव के अनुसार, अमेरिका ने युद्ध खत्म करने के लिए 15-सूत्री प्रस्ताव दिया था, जिसे ईरान ने 'अत्यधिक मांग' (Maximalist Demands) बताकर ठुकरा दिया है। अमेरिका इस युद्ध को जीतने की स्थिति में नहीं है और वर्तमान में वहां केवल गतिरोध (Stalemate) बना हुआ है। जब युद्ध बराबरी पर हो, तो कोई एक पक्ष अपनी शर्तें दूसरे पर थोप नहीं सकता। ईरान का मानना है कि अमेरिका के प्रस्ताव में उसके परमाणु कार्यक्रमों (Nuclear Program) और मिसाइल डिफेंस को खत्म करने की बात कही गई है, जो उसे कतई मंजूर नहीं है।

मिसाइल प्रोग्राम: ईरान की आखिरी ढाल (Defense Strategy)

पूर्व राजदूत ने स्पष्ट किया कि ईरान अपने मिसाइल कार्यक्रम को अपनी रक्षा की एकमात्र गारंटी मानता है। चल रहे संघर्ष के बीच ईरान किसी भी कीमत पर अपनी सैन्य क्षमता कम नहीं करेगा। उन्होंने अमेरिकी दावों को भी खारिज किया जिसमें कहा जा रहा था कि ईरान समझौते के लिए 'बेताब' है। श्रीवास्तव ने कहा कि अगर ईरान वास्तव में बेताब होता, तो वह बातचीत की पहल करता और अमेरिका के प्रस्तावों को नहीं ठुकराता।

तेल की कीमतों में उछाल और आर्थिक संकट (Global Economy)

इस युद्ध का असर केवल सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया की जेब पर भी पड़ रहा है। पूर्व राजदूत ने चेतावनी दी है कि तेल की कीमतों (Oil Prices) में भारी उछाल आया है, जो दूसरे 'ऑयल शॉक' से भी बड़ा संकट पैदा कर सकता है। इसके अलावा, ईरान द्वारा स्ट्रैट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) पर नियंत्रण दिखाकर अपनी ताकत का अहसास कराया जा रहा है, जिससे वैश्विक व्यापार मार्ग प्रभावित हो रहे हैं।

समाधान की राह: केवल कूटनीति (Diplomatic Solution)

अंत में, दिनकर श्रीवास्तव ने जोर देकर कहा कि सैन्य कार्रवाई से शांति संभव नहीं है। तत्काल युद्धविराम (Ceasefire), फारस की खाड़ी को खोलना और परमाणु मुद्दे पर जिनेवा वार्ता को वहीं से शुरू करना जरूरी है जहां वह रुकी थी। शांति तभी संभव है जब सभी पक्ष एक-दूसरे का सम्मान करें और विश्वास बहाली के उपाय (Trust Building) करें।

पूर्व राजनयिक के बयान से पाकिस्तान की दोहरी नीति बेनकाब

बहरहाल,भारत के पूर्व राजनयिक का यह बयान पाकिस्तान की दोहरी नीति बेनकाब करता है और वैश्विक मंच पर भारत की सतर्क दृष्टि को दर्शाता है। अब आने वाले दिनों में देखना होगा कि क्या तुर्की या कतर जैसे अन्य देश इस संकट में मध्यस्थ के रूप में आगे आते हैं, क्योंकि पाकिस्तान की साख पर सवाल उठ चुके हैं। इस विवाद के बीच चीन की चुप्पी भी रहस्यमयी है, जो पहले सऊदी-ईरान समझौते में बड़ी भूमिका निभा चुका है।

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