चुनावों के दौरान मुफ्त घोषणा मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है। पिछले कई दिनों से इस मामले पर सुनवाई हो रही थी। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बहस की जरूरत भी बताई थी।
देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को चुनाव के दौरान रजानीतिक दलों की ओर से किए जाने वाली मुफ्त घोषणाओं के मामले में बड़ा कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों की ओर से किए गए वादों और चुनावी मुफ्त में दिए गए वादों से संबंधित मुद्दों को तीन-न्यायाधीशों की पीठ के पास भेज दिया है। सीजेआई एनवी रमना के नेतृत्व वाली पीठ ने कहा, 'पक्षकारों की ओर से उठाए गए मुद्दों पर व्यापक सुनवाई की आवश्यकता है। कुछ प्रारंभिक सुनवाई को निर्धारित करने की आवश्यकता है, जैसे कि न्यायिक हस्तक्षेप का दायरा क्या है? क्या अदालत की ओर से विशेषज्ञ निकाय की नियुक्ति किसी उद्देश्य की पूर्ति करती है जैसी बातें शामिल हैं।
कई पक्षों ने यह भी प्रस्तुत किया कि सुब्रमण्यम बालाजी में निर्णय पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। इस मामले में न्यायालय ने कहा कि इस तरह की प्रथाएं भ्रष्ट प्रथाओं की राशि नहीं होंगी। मुद्दों की जटिलता और सुब्रमण्यम बालाजी को खत्म करने की प्रार्थना को देखते हुए, हम मामलों को 3 से संदर्भित करते हैं जज बेंच।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट इस मामले में बहस पर जोर दिया था। कोर्ट ने कहा कि इस मसले पर चर्चा की जरूरत है क्योंकि देश के कल्याण का मसला है।
अदालत ने कहा कि चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों का जनता से मुफ्त की रेवड़ियों का वादा और वेलफेयर स्कीम के बीच अंतर करने की जरूरत है।
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सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान साफ-साफ कहा कि मुफ्त की रेवड़ियों पर बीजेपी समेत सभी दल एक ही दिख रहे हैं। दरअसल सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दिल्ली बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय ने दायर की है। इससे देश में चुनाव के दौरान मुफ्त घोषणाओं पर बड़ी बहस शुरू कर दी।
CJI ने राजनीतिक दलों से पूछा था कि मुफ्त को कैसे परिभाषित किया जाए? अदालत इस बात पर भी गौर करेगी कि क्या उन चुनावी वादों को रोका जा सकता है, जिन्हें सरकार का समर्थन नहीं है।
बीजेपी की ओर से दायर याचिका को लेकर कई राजनीतिक दलों ने विरोध दर्ज कराया है। इसमें आम आदमी पार्टी , डीएमके और वाईएसआर कांग्रेस प्रमुख रूप से शामिल हैं।
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