गुजरात हाई कोर्ट ने 23 साल पुराने मामले में कहा कि एक बार थप्पड मारना 498A के तहत क्रूरता नहीं है। आत्महत्या के लिए उकसावे के पर्याप्त सबूत न होने पर पति को बरी किया गया।
गुजरात हाई कोर्ट के एक फैसले ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। कोर्ट ने हाल ही में 23 साल पूराने एक आपराधिक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। यह मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 498A और 306 से जुडा था, जिसमें पति पर पत्नी को क्रूरता और आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाया गया था। गुजरात हाई कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कहा कि यदि पत्नी के मायके में बिना बताए रुकने पर पति ने एक बार थप्पड मारा, तो इसे धारा 498A के तहत क्रूरता नहीं माना जा सकता है।
Gujarat High Court की न्यायमूर्ति गीता गोपी ने इस मामले में आरोपी पति को बरी करते हुए कहा कि पति द्वारा लगातार और असहनीय मारपीट के आरोपों को साबित करने के लिए ठोस सबूतों की जरूरत होती है, ताकि यह साबित हो सके कि इन कारणों की वजह से पत्नी आत्महत्या करने पर मजबूर हुई थी। अदालत ने पाया कि गवाह क्रूरता और आत्महत्या के लिए उकसावे के आरोप साबित करने में असफल रहे। इसलिए सत्र न्यायालय द्वारा दी गई दोषसिद्धि और सजा टिक नहीं सकती।
यह मामला दिलीपभाई मंगलभाई वरली द्वारा दायर क्रिमिनल अपील से जुडा था। सत्र न्यायालय ने वर्ष 2003 में उन्हें धारा 498A के तहत एक वर्ष और धारा 306 के तहत सात वर्ष की सजा सुनाई थी। आरोप था कि शादी के एक वर्ष के भीतर मंगलभाई की पत्नी ने कथित मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न के कारण मई 1996 में आत्महत्या कर ली थी। बचाव पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता धवल व्यास ने तर्क दिया कि आरोप सामान्य प्रकृति के हैं और 498A के तहत क्रूरता की कानूनी परिभाषा को पूरा नहीं करते। उन्होंने कहा कि विवाद मुख्यतः इस बात पर होते थे कि आरोपी रात में अतिरिक्त आय के लिए बैंजो बजाने जाते थे, जिसे पत्नी पसंद नहीं करती थी।
अतिरिक्त लोक अभियोजक ज्योति भट्ट ने पीडिता के माता पिता की गवाही का हवाला देते हुए उत्पीड़न का दावा किया। हालांकि, हाई कोर्ट ने पाया कि दहेज मांग का कोई आरोप नहीं था और न ही पूर्व में किसी प्रकार की शिकायत दर्ज हुई थी। इसके साथ ही इस मामले में कथित मारपीट के मेडिकल रिकॉर्ड भी प्रस्तुत नहीं किए गए थे। अदालत ने दोहराया कि धारा 306 के तहत दोषसिद्धि के लिए स्पष्ट आपराधिक मंशा और आत्महत्या के लिए प्रत्यक्ष या निकट उकसावे का प्रमाण आवश्यक है। सामान्य वैवाहिक विवाद को आत्महत्या के लिए उकसावा नहीं माना जा सकता। इन तथ्यों के आधार पर हाई कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए दोषसिद्धि और सजा को निरस्त कर दिया।