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‘सरकार को अपना काम करने दो’…सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट को लगाई फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश में लोकल बॉडी चुनाव को लेकर हाई कोर्ट के हस्तक्षेप पर सख्त टिप्पणी की। अदालत ने डिलिमिटेशन के आधार पर चुनाव टालने को गलत ठहराते हुए तय समय सीमा में चुनाव कराने का निर्देश दिया।

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भारत

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Himadri Joshi

Feb 14, 2026

Supreme Court

सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)

देश में संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका को लेकर एक बार फिर महत्वपूर्ण टिप्पणी सामने आई है। हिमाचल प्रदेश में लोकल बॉडी चुनाव को लेकर चल रहे विवाद पर देश की सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट रुख अपनाया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनी हुई सरकार को काम करने से रोकना उचित नहीं है और समय पर चुनाव कराना संवैधानिक दायित्व है। मामला हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट द्वारा राज्य सरकार के कुछ निर्णयों में हस्तक्षेप और डिलिमिटेशन प्रक्रिया के आधार पर चुनाव स्थगित करने की मांग से जुड़ा था। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए भविष्य में ऐसे हस्तक्षेप को गंभीरता से लेने की बात कही है।

चुनाव संविधान के तहत समय पर कराना अनिवार्य

मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि डिलिमिटेशन प्रक्रिया लंबित होना चुनाव टालने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि नगर निकायों, नगर पालिकाओं और पंचायतों के चुनाव संविधान के तहत समय पर कराना अनिवार्य है। पीठ ने यह भी कहा कि हाई कोर्ट का यह निर्देश कि कार्यकाल समाप्त होने के बाद चुनाव कराए जाएं, संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप है और इसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। अदालत ने राज्य में हजारों ग्राम पंचायतों, पंचायत समितियों और जिला परिषदों का उल्लेख करते हुए कहा कि अधिकांश निकायों का चुनाव इसी वर्ष होना है।

समय सीमा में किया संशोधन

लॉजिस्टिक चुनौतियों और दूरदराज क्षेत्रों में सर्दियों की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने समय सीमा में सीमित संशोधन किया। पहले तय की गई अंतिम तिथि को बढ़ाते हुए अदालत ने कहा कि सभी तैयारी 31 मार्च तक पूरी कर ली जाए और उसके आठ सप्ताह के भीतर चुनाव संपन्न कराए जाएं। अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि आगे समय बढ़ाने के लिए किसी भी आवेदन पर विचार नहीं किया जाएगा। इस आदेश से राज्य निर्वाचन आयोग और प्रशासन पर तय समय सीमा के भीतर प्रक्रिया पूरी करने का दबाव बढ़ गया है।

न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संतुलन आवश्यक

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी दोहराया कि उच्च न्यायालय नागरिकों के अधिकारों के संरक्षक हैं, लेकिन उन्हें चुनी हुई सरकार के कार्य में अनावश्यक बाधा नहीं डालनी चाहिए। न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संतुलन बनाए रखना लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। इस फैसले को हिमाचल प्रदेश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए अहम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय भविष्य में चुनावी प्रक्रिया से जुड़े विवादों के लिए मिसाल बन सकता है और संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका को और स्पष्ट करता है।