IIT कानपुर में चल रहे एक नए शोध में यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि हॉस्टल का तापमान, वेंटिलेशन और नमी छात्रों की नींद और पढ़ाई पर कैसे असर डालते हैं। शुरुआती सर्वे में 70 प्रतिशत छात्रों ने खराब स्लीप क्वालिटी बताई।
भारत के प्रमुख इंजीनियरिंग संस्थानों में से एक भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर (IIT Kanpur) में छात्रों की नींद को लेकर एक दिलचस्प शोध चल रहा है। कई छात्रों ने शिकायत की कि वे दिन की पहली क्लास शुरू होने से पहले ही थकान और नींद महसूस करते हैं। इसी समस्या ने शोधकर्ताओं को एक नए सवाल की ओर सोचने पर मजबूर किया। संस्थान के सिविल इंजीनियरिंग विभाग की प्रोफेसर अनुबा गोयल के नेतृत्व में यह अध्ययन किया जा रहा है कि हॉस्टल के कमरे का वातावरण, जैसे वेंटिलेशन, तापमान और नमी, छात्रों की स्लीप क्वालिटी और पढ़ाई पर किस तरह असर डालते हैं।
इस शोध का मुख्य उद्देश्य यह समझना है कि हॉस्टल के अंदर का वातावरण छात्रों की नींद की गुणवत्ता को कैसे प्रभावित करता है। प्रोफेसर अनुबा गोयल का मानना है कि यदि यह साबित हो जाता है कि रहने की जगह का माहौल नींद पर असर डालता है, तो भविष्य में हॉस्टल और रेसिडेंशियल बिल्डिंग के डिजाइन में बदलाव किए जा सकते हैं। इस विचार की शुरुआत लगभग चार साल पहले एक अन्य अध्ययन से हुई थी, जिसमें क्लासरूम के वेंटिलेशन का छात्रों की सतर्कता पर प्रभाव देखा जा रहा था। उस अध्ययन में पाया गया कि कई छात्र क्लास शुरू होने से पहले ही थके हुए महसूस कर रहे थे। इसी अवलोकन से यह सवाल उठा कि क्या हॉस्टल के कमरे की स्थिति उनकी नींद को प्रभावित कर रही है।
इस विषय को समझने के लिए शोधकर्ताओं ने IIT कानपुर के हॉस्टल में रहने वाले 500 से अधिक छात्रों पर सर्वे किया। इसमें पिट्सबर्ग स्लीप क्वालिटी इंडेक्स (PSQI) नामक एक अंतरराष्ट्रीय मानक टूल का उपयोग किया गया, जो स्लीप क्वालिटी को मापने के लिए प्रयोग किया जाता है। सर्वे में छात्रों से उनके कमरे की वेंटिलेशन, तापमान, नमी और खिड़कियां खुली रखने जैसी आदतों के बारे में भी पूछा गया। परिणामों से पता चला कि लगभग 70 प्रतिशत छात्रों ने खराब स्लीप क्वालिटी की शिकायत की। शोधकर्ताओं के अनुसार, गर्म मौसम, ज्यादा नमी, बंद खिड़कियां और खराब हवा का प्रवाह इस समस्या के प्रमुख कारण हो सकते हैं।
शोध का दूसरा चरण और भी उन्नत तकनीक के साथ किया जा रहा है। इसमें लगभग 140 छात्रों के हॉस्टल कमरों में सेंसर लगाए गए हैं, जो तापमान, नमी और वेंटिलेशन जैसी स्थितियों को रियल टाइम में रिकॉर्ड करते हैं। साथ ही छात्र स्मार्टवॉच पहनते हैं, जो उनकी नींद के पैटर्न और गुणवत्ता को ट्रैक करती हैं। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिल रही है कि कमरे का वातावरण और नींद के बीच वास्तविक संबंध क्या है। इस रिसर्च में डेनमार्क के तकनीकी विश्वविद्यालय (Technical University of Denmark) के प्रोफेसर पावेल वारगोकी भी सहयोग कर रहे हैं।