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पिता ने फैक्टरी शुरू कर दी, इसलिए आइआइटी के बाद नौकरी के तीन प्रस्ताव ठुकराए

भिवाड़ी. रामप्रकाश गर्ग बताते हैं कि 1972 में दिल्ली आइआइटी से मिकेनिकल इंजीनियर की। पिता रतनलाल गर्ग ने तभी सोचा था कि बेटा पढ़ाई के बाद अपना ही व्यवसाय करेगा, इसलिए उन्होंने एक डीजल इंजन स्पेयर पार्टस की फैक्टरी शाहदरा दिल्ली में लगाई थी। पढ़ाई पूरी करने के बाद तीन नौकरी के प्रस्ताव मिले, एक […]

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भिवाड़ी

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Dharmendra dixit

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Dharmendra Dixit

Mar 04, 2026

घाटे से फैक्टरी बंद होने की नौबत, सोचा कंसल्टेंसी शुरू कर दूं, अब दो फैक्टरी में दो सौ कर्मचारियों को मिल रहा रोजगार

भिवाड़ी. रामप्रकाश गर्ग बताते हैं कि 1972 में दिल्ली आइआइटी से मिकेनिकल इंजीनियर की। पिता रतनलाल गर्ग ने तभी सोचा था कि बेटा पढ़ाई के बाद अपना ही व्यवसाय करेगा, इसलिए उन्होंने एक डीजल इंजन स्पेयर पार्टस की फैक्टरी शाहदरा दिल्ली में लगाई थी। पढ़ाई पूरी करने के बाद तीन नौकरी के प्रस्ताव मिले, एक रक्षा मंत्रालय, दूसरा एलएंडटी और तीसरा आरकोबिटने में मिला। तीनों ऑफर ठुकरा दिए, पिता की फैक्टरी संभाल ली। वहां पर खुद मशीन पर जाकर काम किया। जिससे कि एक श्रमिक का वेतन बचे और मेरा प्रशिक्षण हो जाए। काम करते-करते 1975 में रेलवे से इंजन की बियरिंग निर्माण का ऑर्डर मिला। एक दिन विज्ञापन देखा। 1985 में रीको भिवाड़ी में आकर जमीन खरीद ली। यहां पर आकर ढलाई (स्टील कास्टिंग) का काम शुरू किया। फैक्टरी लगाने आरएफसी से ऋण लिया था। फैक्टरी लगा ली, जो माल बेचा उसका पैसा नहीं मिला, फैक्टरी की लागत के अनुसार ऑर्डर भी नहीं मिले, इसकी वजह से हम आरएफसी के डिफॉल्टर हो गए। हमने तब भी एक नियम बनाया कि बाजार का एक भी भुगतान नहीं रोका, सिर्फ आरएफसी के ही कर्जदार हुए, जिससे बाजार में साख अच्छी बनी रही, बाजार से माल मिलता रहा। उत्पादन नियमित चलता रहा। आरएफसी का पैसा समय पर नहीं चुकाने से भी हमें बहुत नुकसान हुआ, अधिक ब्याज देना पड़ा। जब हमें घाटे हुए तो फैक्टरी बंद करने की नौबत आ गई। कई बार सोचा कि फैक्टरी बंद कर कंसल्टेंसी शुरू कर लूं। क्योंकि घर परिवार के खर्चों के साथ बच्चों को पढ़ाना था। बेटी की शादी के लिए भी पैसा जोडऩा था। उस समय ऐसी स्थिति थी कि फुटवियर भी नहीं बदल सकते थे, मालिक होने के बावजूद कई बार फटे जूते पहनकर फैक्टरी जाता था। समय बदला, बीएचईएल से ऑर्डर मिलने शुरू हो गए। निर्यात भी शुरू हो गया। इसके बाद सारी देनदारी चुक गई। मेरे बेटे विक्रम गर्ग ने आइआइटी मुम्बई से बीटेक करने के बाद 2010 में उत्पादन में मेरा हाथ बंटाना शुरू कर दिया। 2013 में कहरानी में 20 हजार वर्गमीटर में दूसरा प्लांट शुरू कर दिया। अब करीब दो सौ कर्मचारी हमारे साथ काम करते हैं। दो सौ परिवार हमारी जिंदगी का हिस्सा हैं, यही हमारी सफलता है।

मेरा मिशन 750 उद्यमी बनाने का
रामप्रकाश बताते हैं कि अब मेरी उम्र 75 वर्ष हो चुकी है। मैंने अपनी जिंदगी में जो उद्यम करने थे कर लिए। अब मेरा मिशन देशभर में 750 नए उद्यमी तैयार करना है। जो स्वच्छता से संबंधित होंगे। ये उद्यमी ऐसे होंगे जो कि कबाड़ से नया उत्पाद तैयार करेंगे। हर जिले में एक ऐसा उद्यमी होगा। अभी तक दिल्ली, गुरुग्राम और भिवाड़ी में तीन उद्यमी ऐसे तैयार कर दिए हैं। पर्यावरण स्वच्छता को लेकर आरपीसीबी से फर्नेस श्रेणी में पहला पुरस्कार मिला है।