
राजस्थान में यहां होली पर गांव छोड़ने की परंपरा आज भी जीवित। पत्रिका फाइल फोटो
भिवाड़ी। औद्योगिक नगरी भिवाड़ी में होली की अजब-गजब परंपरा है, यहां ग्रामीण गांव से बाहर निकलते हैं तब लगता है की होली है। सैकड़ों साल से गांव छोड़ने की परंपरा अभी भी जीवित है। जिसमें गांव के बच्चे, जवान और बुजुर्ग सभी शामिल होते हैं और पूर्व दिशा में शाम के समय एकत्रित होते हैं।
पूर्णिमा वाले दिन भिवाड़ी गांव के सभी ग्रामीण चौपाल पर एकत्रित होकर दोपहर 12 से शाम को 5 बजे तक होली गायन करते हैं। होली गायन में भी यहां महाभारत के प्रसंग गाए जाते हैं। होली गायन शाम को पांच बजे तक चलता है। इस दौरान गांव का खाती अपने घर में पूजा करता रहता है। होली गायन में से कुछ लोग खाती के घर जाते हैं और उसे लेकर आते हैं। खाती को हनुमान का भक्त माना जाता है।
खाती आता है और होली गायन मंडली के बीच में दोनों हाथ ऊपर कर देता है, इस इशारे के बाद होली गायन समाप्त हो जाता है। इसके बाद सभी ग्रामीण दौड़ते हुए पूर्व दिशा की ओर जाते हैं। पहले समय गांव से बाहर निकलकर लोग घुड़दौड और ऊंटदौड़ करते थे, ये परंपरा अभी भी कायम है और लोग अब स्टेडियम स्थल पर एकत्रित होकर घुड़दौड़ करते हैं। खेल प्रतियोगिता के बाद खेजड़ी के पेड़ पर फायरिंग करने की परंपरा थी, जिसे गत वर्षों से बंद कर दिया गया है। अब फायरिंग की जगह पटाखे चलाए जाते हैं।
भिवाड़ी के बुजुर्गों की मानें तो सैकड़ों साल पहले दो गांव के बीच लड़ाई हो गई, जिसमें नरसंहार हुआ। दूसरा गांव खाली हो गया। उस गांव का पाप भिवाड़ी के ग्रामीणों को लगा, जिससे ग्रामीणों को रोग हो गए। विद्वानों ने बताया कि पीडि़त गांव के लोगों को दोबारा लाकर बसाओ। तब उस गांव की सिर्फ एक महिला बची थी, जिसके गर्भ में बच्चा था, उसे लाकर बसाया गया। वह गांव पूर्व दिशा में था। तो ऐसा माना जाता है कि उस नरसंहार में मारे गए ग्रामीणों के प्रति शोक प्रकट करने, क्षमा याचना और श्रद्धांजलि देने के लिए ग्रामीण गांव से बाहर निकलते हैं।
Published on:
02 Mar 2026 10:17 am
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