
स्टील के व्यवसाय में हुआ नुकसान, खाद्य इंडस्ट्री में मिली सफलता
भिवाड़ी. विरल गर्ग का जन्म दिल्ली में हुआ और डीयू से ग्रेजुएशन की। सीए की पढ़ाई के दौरान पारिवारिक बंटवार हुआ, इसकी वजह से मुझे पिता के साथ व्यवसाय में 2009 से जुडऩा पड़ा। इसलिए सीए की पढ़ाई पूरी नहीं हो सकी। पिता रतन महीपाल की सिलेंडर निर्माण फैक्ट्री थी। तीन पीढ़ी से पारिवारिक पैतृक व्यवसाय था। इसलिए शुरू से मुझे भी व्यवसाय ही करने का इरादा था। 1978 में दादा और पिता ने मिलकर फैक्ट्री लगाई। पहले पिता का सिलेंडर निर्माण का ही काम था। मेरे जुडऩे के बाद स्टील निर्माण के क्षेत्र में कई व्यवसाय शुरू किए सफलता भी मिली। 2013-14 में चीन से भारी मात्रा में स्टील का आयात होने लगा। जिसकी वजह से इस सेक्टर में लाभ का अंतर बहुत कम होने लगा और उधार बढऩे लगा। इसके बाद नोटबंदी हुई, कई लोग व्यवसाय बंद कर चले गए। हमारी काफी उधारी डूब गई। हमें काफी नुकसान हुआ। व्यवसाय में हुए नुकसान की भरपाई फैक्टरी और घर बेचकर की। स्टील व्यवसाय को बंद कर दिया। 2012 में हमने फूड इंडस्ट्री में शुरुआत की थी, जिसे छोटे स्तर पर संचालित कर रहे थे। नोटबंदी और स्टील व्यवसाय बंद करने के बाद हमने फूड इंडस्ट्री पर पूरा ध्यान दिया। कॉर्नफ्लेक्स का उत्पादन करने लगे। शुरुआत में सिर्फ एक कंपनी को माल देते थे। अब तीन फैक्टरी हो गई हैं, तीनों फैक्टरी में बीटफ्लेक्स, राइसफ्लेक्स, बाजरा, ज्वार, सत्तू सहित बीस तरह के खाद्य पदार्थ तैयार कर रहे हैं। पीएम मोदी ने 2022-23 में जो वल्र्ड मिलेट ईयर घोषित किया था, उसके तहत हमने मिलेट फैक्टरी निर्मित की और कई तरह के मिलेट उत्पाद तैयार करने लगे। सीएसआईआर, सीएफटीआरआइ के साथ मिलकर मिलेट उत्पाद पर रिसर्च की। खाद्य पदार्थ विदेश तक भेजने लगे हैं। कई कंपनियों के लिए पैकेजिंग का काम भी करते हैं। खुद का ब्रांड भी बाजार में लाने की तैयारी है। फूड निर्माण और पैकेजिंग के लिए ऑटोमेटिक मशीन विदेश से मंगाकर लगाई हैं।
उतार चढ़ाव से मिली बड़ी सीख
स्टील व्यवसाय में हुए नुकसान के बाद मुझे सीखने का बहुत अवसर मिला। 18 साल की उम्र में व्यवसाय में आ गया। मेरी उम्र बहुत कम थी। अच्छे समय में और बुरे वक्त में लोगों के व्यवहार को देखा, कि लोग समय बदलने पर कैसे बदलते हैं। मुश्किल समय में कोई साथ नहीं देता, सिर्फ माता-पिता, भाई-बहन ही साथ खड़े होते हैं। जो लोग बहुत नजदीक दिखते हैं, बुरे समय में एक झटके में दूरी बना लेते हैं। कोर्ट कचहरी भी जाना पड़ा। पैसा सिर्फ वही होता है जो कि अपनी जेब और अपने खाते में हैं। बाजार में पड़ा पैसा, उधारी का पैसा कभी अपना नहीं होता, उसके मिलने नहीं मिलने की कोई गारंटी नहीं है। एमएसएमई में भी सरकार उधारी का पैसा दिलाने के लिए नियम लाई है लेकिन उसमें सालों केस चलता है, केस जीतने के बाद भी रिकवरी नहीं होती। कम उम्र में जो घाटे हुए उससे सीख मिली, व्यापार के तौर तरीके बदले। ज्यादा बिक्री के चक्कर में अब अधिक उधारी नहीं देते।
Published on:
23 Feb 2026 06:54 pm
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