
जन्म प्रमाणपत्र बताता है कि आपकी उम्र कितनी है, लेकिन शरीर के भीतर बहने वाला खून एक दूसरी कहानी कह सकता है। संभव है कि आप 30 साल के हों, मगर आपकी धमनियाँ 50 या 60 साल पुरानी जैसी हो चुकी हों। यह चिंताजनक स्थिति हो सकती है। इसी ‘छिपी उम्र’ को पहचानने के लिए आईआईटी मद्रास (IIT Madras) ने 'वेस्पा' मिशन (Vespa Mission) शुरू किया है।
आईआईटी मद्रास का वेस्पा मिशन इंसान के शरीर की रक्त-नलिकाओं का पहला बड़ा हेल्थ मैप है और इसी उद्देश्य से इसे बनाया गया है। इससे भविष्य में हृदय रोग के खतरे को लक्षण आने से पहले पहचानने की कोशिश की जाएगी।
स्वस्थ धमनी रबड़ की नली की तरह लचीली होती है। दिल की हर धड़कन के साथ वह फैलती-सिकुड़ती है और रक्त प्रवाह के दबाव को संभालती है। उम्र और खराब जीवनशैली के साथ यह लचीलापन कम होने लगता है। धमनियों की इसी बढ़ती कठोरता को अर्ली वैस्कुलर एजिंग यानी समय से पहले रक्त-नलिकाओं का बूढ़ा होना माना जाता है।
आईआईटी मद्रास के वैज्ञानिकों ने इसके लिए 'आर्टसेंस' नामक स्वदेशी उपकरण विकसित किया है। करीब पांच मिनट की जांच में यह तकनीक धमनियों की कठोरता और रक्त तरंग की गति जैसे संकेतों का आकलन करती है। जांच के लिए न खून निकालना पड़ता है और न इंजेक्शन लगाया जाता है।
धमनी जितनी कठोर होगी, पल्स वेव उतनी तेज होगी यानी रक्त तरंग की गति और धमनियों के व्यवहार से उनकी जैविक सेहत का अंदाजा लगाया जा सकता है। यह किसी व्यक्ति को हार्ट अटैक की निश्चित भविष्यवाणी नहीं देता, बल्कि हृदय रोग के संभावित जोखिम की समय रहते स्क्रीनिंग में मदद कर सकता है।
अब तक धमनियों की कठोरता के आकलन में विदेशी आबादी पर बने संदर्भ मानकों का सहारा लिया जाता रहा है। वेस्पा मिशन का लक्ष्य 1 लाख से ज़्यादा लोगों की स्क्रीनिंग कर भारतीय आबादी के लिए अपना वैस्कुलर हेल्थ डेटाबेस तैयार करना है। विभिन्न अस्पताल और शोध संस्थान भी इस पहल से जुड़े हैं।