
Independence Day 2026: 15 अगस्त 1947 को देश ने करीब 2 शताब्दियों की अंग्रेजी हुकूमत से स्वतंत्रता हासिल की। इस आजादी के पीछे अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों का संघर्ष, त्याग और बलिदान छिपा है। किसी ने जेल की यातनाएं सहीं तो किसी ने अंग्रेजों की गोलियां झेलीं। कई ऐसे युवा भी थे, जिन्होंने उस उम्र में देश के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया, जब आमतौर पर लोग अपने भविष्य और परिवार के सपने देखते हैं।
आजादी की लड़ाई में ऐसे कई नौजवान शामिल हुए, जिन्होंने बेहद कम उम्र में अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी। इनमें से कुछ को फांसी दी गई तो कुछ ने आखिरी सांस तक अंग्रेजों का मुकाबला किया। आपको बताते हैं ऐसे ही 4 युवा स्वतंत्रता सेनानियों की कहानी, जिनका बलिदान भारतीय इतिहास में हमेशा याद किया जाएगा।
भगत सिंह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे लोकप्रिय युवा क्रांतिकारियों में से एक रहे हैं। उनका जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब के लायलपुर जिले के बंगा में हुआ था। उनके पिता किशन सिंह और माता विद्यावती थीं।
जलियांवाला बाग हत्याकांड का भगत सिंह के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। कम उम्र में ही उनके मन में अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह की भावना मजबूत हो गई। उन्होंने पढ़ाई के साथ-साथ देश की आजादी के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी। भगत सिंह नौजवान भारत सभा से जुड़े और बाद में चंद्रशेखर आजाद समेत अन्य क्रांतिकारियों के साथ काम किया। उन्होंने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन को आगे बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसे बाद में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के रूप में संगठित किया गया।
1928 में लाला लाजपत राय की मौत के बाद अंग्रेज अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या की योजना में भगत सिंह और राजगुरु शामिल हुए। इसके बाद 1929 में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की केंद्रीय विधानसभा में बम फेंका। उनका उद्देश्य किसी की हत्या करना नहीं, बल्कि अंग्रेजी सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाना था। घटना के बाद दोनों ने गिरफ्तारी दी। भगत सिंह पर लाहौर षड्यंत्र केस में मुकदमा चला। अंततः 23 मार्च 1931 को भगत सिंह को फांसी दे दी गई। उस समय भगत सिंह की उम्र महज 23 साल थी। उनका नाम आज भी देश के सबसे लोकप्रिय युवा क्रांतिकारियों में लिया जाता है।
चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के अलीराजपुर क्षेत्र के भाबरा गांव में हुआ था। उनका वास्तविक नाम चंद्रशेखर तिवारी था। उनके पिता का नाम सीताराम तिवारी और मां का नाम जगरानी देवी था।
महज 14 साल की उम्र में वह बनारस पहुंचे। इसी दौरान वह महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से जुड़े और ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलन में हिस्सा लिया। गिरफ्तारी के बाद अदालत में जब उनसे नाम पूछा गया तो उन्होंने अपना नाम 'आजाद', पिता का नाम 'स्वतंत्रता' और निवास 'जेल' बताया। इसके बाद चंद्रशेखर तिवारी को 'आजाद' के नाम से जाना जाने लगा।
बाद में उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई। काकोरी कांड के बाद क्रांतिकारी संगठन को मजबूत करने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। वह भगत सिंह समेत कई युवा क्रांतिकारियों के मार्गदर्शक भी बने। 27 फरवरी 1931 को प्रयागराज के अल्फ्रेड पार्क में पुलिस ने उन्हें घेर लिया। आजाद ने काफी देर तक पुलिस का मुकाबला किया। जब उनके पास आखिरी गोली बची तो उन्होंने अंग्रेजों के हाथों गिरफ्तार होने के बजाय खुद को गोली मार ली। इस तरह चंद्रशेखर आजाद ने अपना संकल्प पूरा किया कि वह कभी अंग्रेजों के हाथों गिरफ्तार होकर जीवित नहीं पकड़े जाएंगे। शहादत के समय उनकी उम्र केवल 24-25 साल के आसपास थी।
शिवराम हरि राजगुरु भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख युवा क्रांतिकारियों में शामिल थे। उनका जन्म 24 अगस्त 1908 को महाराष्ट्र के पुणे जिले के खेड़ गांव में हुआ था। बचपन में ही पिता के निधन के बाद उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा। राजगुरु संस्कृत और भारतीय संस्कृति की शिक्षा हासिल करने के लिए वाराणसी पहुंचे। इसी दौरान उनका संपर्क क्रांतिकारी गतिविधियों से हुआ और वह चंद्रशेखर आजाद के संगठन हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़ गए।
राजगुरु निशानेबाजी में माहिर थे। लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए अंग्रेज अधिकारी जॉन सॉन्डर्स को निशाना बनाने की कार्रवाई में उन्होंने भगत सिंह के साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव पर मुकदमा चलाया। तीनों को लाहौर षड्यंत्र मामले में मौत की सजा सुनाई गई।
23 मार्च 1931 को राजगुरु को भगत सिंह और सुखदेव के साथ फांसी दे दी गई। उस समय उनकी उम्र महज 22 साल थी। बेहद कम उम्र में दिया गया उनका बलिदान आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा माना जाता है।
सुखदेव थापर का जन्म 15 मई 1907 को पंजाब के लुधियाना में हुआ था। उनके पिता का निधन उनके जन्म से पहले ही हो गया था। इसके बाद उनका पालन-पोषण उनके परिवार ने किया। सुखदेव पर लाला लाजपत राय के विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा। बाद में वह चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह के क्रांतिकारी संगठन से जुड़े। उन्होंने युवाओं को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने और क्रांतिकारी गतिविधियों को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए अंग्रेज अधिकारी सॉन्डर्स के खिलाफ की गई कार्रवाई में सुखदेव भी शामिल थे। इसके अलावा जेल में रहते हुए उन्होंने राजनीतिक बंदियों के साथ किए जा रहे व्यवहार का विरोध किया और उनके अधिकारों के लिए आवाज उठाई। सुखदेव पर भगत सिंह और राजगुरु के साथ लाहौर षड्यंत्र मामले में मुकदमा चला। 23 मार्च 1931 को भगत सिंह और राजगुरु के साथ सुखदेव को भी फांसी दे दी गई। उस समय उनकी उम्र केवल 23 साल थी।
भारत की आजादी का इतिहास केवल बड़े आंदोलनों और राजनीतिक नेताओं तक सीमित नहीं है। इसके पीछे हजारों ऐसे युवाओं का त्याग भी शामिल है, जिन्होंने अपनी जिंदगी देश के नाम कर दी। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु और सुखदेव तक, इन क्रांतिकारियों ने कम उम्र में अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी। इनमें से कई अपने जीवन का बड़ा हिस्सा भी नहीं देख पाए, लेकिन उनका साहस और बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल बन गया। आजादी के 78 साल बाद भी इन युवा स्वतंत्रता सेनानियों की कहानियां देशभक्ति, साहस और राष्ट्र के प्रति समर्पण की प्रेरणा देती हैं।