राष्ट्रीय

जीने के लिए करते हैं काम और वही ले रहा जान, अकेले सिलिका डस्ट से खतरे में 5 करोड़ मजदूर

मजदूर जिंदा रहने के लिए काम करते हैं, लेकिन वही काम उनकी जान पर आफत भी लाता है और हजारों मजदूरों की जान भी ले लेता है।

3 min read
देश में 90 फीसदी लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। इनमें से करोड़ों की सेहत और जान पर खतरा है। (Photo Source: AI)

उत्तर प्रदेश (यूपी) के नोएडा में हाल ही में मजदूरों का हिंसक आंदोलन हुआ। वे न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने और काम के हालात बेहतर करने की मांग कर रहे थे। आंदोलन हिंसक होने के बाद यूपी सरकार ने न्यूनतम मजदूरी तो बढ़ा दी, लेकिन काम के हालात बेहतर करने का क्या? ये हालात उन्हें बीमार बनाते हैं और हजारों मजदूरों की जान तक ले लेते हैं।

काम से जुड़ा सेहत संबंधी खतरा दुनिया भर में बड़ी समस्या है। भारत में भी यह गंभीर समस्या है। ऐसा इसलिए कि यहां करीब 90 फीसदी लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। इनके लिए काम के दौरान सेहत और जान की सुरक्षा का बहुत ख्याल रखा नहीं जाता। खतरा तो बाकी दस फीसदी को भी झेलना पड़ता है, लेकिन 90 फीसदी की तुलना में कम। उनके लिए राहत की बात यह भी है कि उन्हें 90 फीसदी की तुलना में स्वास्थ्य सुविधा भी ज्यादा मिलती है।

काम के चलते सेहत और ज़िंदगी पर खतरा कई तरह (कैंसर, सांस की बीमारी, आंख-कान की कमजोरी, तनाव से जुड़ी समस्याएं, हड्डी और नस जुड़ी बीमारी आदि) से और कई कारणों से आता है। कई काम ही ऐसे होते हैं और कुछ काम करने के हालात भी खतरा बढ़ाते हैं।

दो कारणों से समस्या ज्यादा गंभीर

समस्या की गंभीरता मुख्य रूप से नियमों का पालन करवाने में सरकार की नाकामी, कॉरपोरेट्स द्वारा जिम्मेदारी नहीं निभाए जाने और स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया नहीं होने के चलते है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के आंकड़ों के मुताबिक 2016 में दुनिया भर में काम से जुड़े खतरों के चलते 18,79,890 मौतें हुई थीं। इनमें से केवल 19 प्रतिशत चोट या हादसों के चलते हुई थी। 81 प्रतिशत मौतें बीमारी की वजह से हुई थी।

डायरेक्टरेट जनरल फैक्ट्री एडवाइस सर्विस एंड लेबर इंस्टीट्यूट (डीजीएफ़एएसएलआई) के मुताबिक 2020 में दुनिया भर में कारखानों में 32413 हादसे हुए। इनमें 1050 लोगों की मौत हुए और 3882 घायल हुए।
यह तो मौत की बात हुई, लेकिन हजारों लोग काम की स्थितियों के चलते धीमी मौत भी मरते हैं। उनके शरीर के अलग-अलग अंगों पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि काम से जुड़े चोट की वजह से दुनिया भर में होने वाली मौतों में भारत का हिस्सा 45 फीसदी है। काम से जुड़ी बीमारियों (Occupational Diseases) से होने वाली मौतों के मामले में यह आंकड़ा 17 फीसदी है। रिपोर्ट कब से कब की है, इसका जिक्र नहीं है।

खेती से जुड़े काम करने वाले 97 फीसदी लोगों को दिक्कत

भारत में करीब 60 फीसदी लोग खेती व इससे जुड़े कामों में लगे हैं। इनमें से 97.5 फीसदी को शारीरिक नुकसान झेलना पड़ता है। 50 फीसदी को मशीन से खतरा रहता है और 19.7 प्रतिशत को जैविक नुकसान (biological hazards) झेलना पड़ता है।
भारत में स्थिति ज्यादा मारक दो कारणों से है। एक तो ज़्यादातर लोगों के असंगठित क्षेत्र में काम करना, और दूसरा, स्वास्थ्य सुविधाओं की बहुत कम पहुंच होना।

ईएसआईसी काम के चलते बीमार या काम पर चोटिल होने की स्थिति में कामगारों को इलाज व आर्थिक मदद देता है, लेकिन यह सुविधा केवल संगठित क्षेत्रों में काम करने वालों के लिए है। विडम्बना है कि 1952 में ईएसआईसी के गठन के बाद से भारत में संगठित क्षेत्र में काम करने वालों का प्रतिशत बढ़ा नहीं है।

दूसरी ओर स्वास्थ्य व्यवस्था का हाल यह है कि जीडीपी के अनुपात में स्वास्थ्य पर सरकार का खर्च नहीं बढ़ा है। मतलब, सरकार ने स्वास्थ्य पर खर्च तो बढ़ाया है, लेकिन आर्थिक विकास के अनुपात में नहीं बढ़ाया। नतीजा, लोगों की जरूरत के हिसाब से यह पर्याप्त नहीं है।

हर तीसरा एमबीबीएस डॉक्टर शहर में

एबीपीएमजेएवाई जैसी योजनाओं का विस्तार तो हुआ है, लेकिन बीमा वाली ज़्यादातर योजनाएं बीमारी बढ़ने (अस्पताल में भर्ती होने) की स्थिति में काम आती हैं। अच्छी नौकरी करने वाले मुट्ठी भर लोगों को निजी क्षेत्र के जरिए अच्छी स्वास्थ्य सेवा मिल जाती है, लेकिन इसे पाना बाकी के वश की बात नहीं।

डॉक्टर-नर्स की संख्या बढ़ी है, लेकिन इनमें से ज़्यादातर प्राइवेट सेक्टर में काम करते हैं। 65 फीसदी एमबीबीएस डॉक्टर, 93 फीसदी आयुष फिजीसियन, 51 फीसदी नर्सें प्राइवेट सेक्टर में काम करती हैं, जहां केवल मुट्ठी भर लोग इलाज करा पाते हैं। अधिकतर लोग गांवों में रहते हैं, लेकिन 73 फीसदी एमबीबीएस डॉक्टर शहरों में हैं।

काम से बीमारियों और मौतों का खतरा इसलिए भी गंभीर समस्या बनती है, क्योंकि सरकार ने इससे संबंधित आंकड़ा जुटाने का कोई ठोस सिस्टम नहीं बना रखा है। अलग-अलग स्रोतों से उपलब्ध आंकड़ों में काफी अंतर देखने को मिलता है। ईएसआईसी की जिस रिपोर्ट के हवाले से ऊपर आंकड़ा दिया गया है, वह किस अवधि का है, यह रिपोर्ट में साफ नहीं किया गया है।

सिलिका डस्ट से खतरा झेलने वालों की संख्या 1999 की आईसीएमआर की एक रिपोर्ट में 30 लाख बताई गई, एक सरकारी रिपोर्ट में 2018 तक इनकी संख्या एक करोड़ और सितंबर 2024 की एक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया कि 2025 तक इनकी संख्या 5.20 करोड़ होगी।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ऑकुपेशनल हेल्थ (एनआईओएच) के मुताबिक 90 से भी ज्यादा ऐसे काम हैं, जहां कामगारों को सिलिका से खतरा हो सकता है।

Updated on:
20 Apr 2026 04:01 pm
Published on:
20 Apr 2026 03:53 pm
Also Read
View All