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भारत की ग्रीन एनर्जी का दुनिया में डंका, IEA चीफ बोले- दूसरे देश भी सीखें

IEA प्रमुख फतिह बिरोल ने भारत के रिन्यूएबल एनर्जी विस्तार को ऊर्जा सुरक्षा के लिए अहम बताया। रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक 240 अरब डॉलर की बचत संभव।
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Updated: 8 Nov 2026, 11:16 AM IST
India power demand
अक्षय ऊर्जा (फोटो सोर्स: ANI)

रूस-यूक्रेन युद्ध और ईरान-अमेरिका युद्ध की वजह से दुनिया भर में ऊर्जा संकट की स्थिति बन गई है। भारत भी इससे अछूता नहीं है, लेकिन बीते कुछ सालों से भारत रिन्युवल एनर्जी के क्षेत्र में खुद को मजबूत कर रहा है। साथ ही, अन्य देशों के लिए भी नजीर बन रहा है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के कार्यकारी निदेशक फतिह बिरोल ने कहा कि भारत का अनुभव दिखाता है कि निरंतर नीतियां किस तरह रिन्युवल एनर्जी की लागत घटाने और निवेश आकर्षित करने में मदद कर सकती हैं। उन्होंने आयातित जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोल जैसे पदार्थ) पर निर्भरता घटाने में स्वच्छ ऊर्जा की भूमिका को भी रेखांकित किया। बिरोल ने कहा कि वैश्विक ऊर्जा बाजारों में बढ़ी अनिश्चितता के बीच भारत में अक्षय ऊर्जा का विस्तार ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से बड़े फायदे दे रहा है।

विदेशी मुद्रा बचाकर भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिति को मजूबत

दरअसल, केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने भारत के अक्षय ऊर्जा बदलाव के संभावित आर्थिक लाभों को सामने रखा था। जोशी ने अपनी पोस्ट में कहा कि यह बदलाव न सिर्फ सततता को आगे बढ़ा रहा है, बल्कि आयात पर निर्भरता घटाकर और विदेशी मुद्रा बचाकर भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिति को मजूबत कर रहा है।

मंत्री जोशी ने इंडिया रिन्यूएबल एनर्जी मार्केट रिपोर्ट 2026 साझा की

मंत्री ने IEA की "इंडिया रिन्यूएबल एनर्जी मार्केट रिपोर्ट 2026" पर ANI की एक रिपोर्ट साझा की थी। इस रिपोर्ट के अनुमान के मुताबिक, यदि ईंधन की कीमतें 2024-25 के औसत स्तर के आसपास बनी रहती हैं, तो 2030 तक कोयले और प्राकृतिक गैस के आयात पर कुल बचत लगभग 240 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच सकती है।

जीवाश्म ईंधन के आयात पर सालाना लगभग 35 अरब डॉलर की बचत

रिपोर्ट में यह भी अनुमान लगाया गया है कि 2030 तक जीवाश्म ईंधन के आयात पर सालाना लगभग 35 अरब डॉलर की बचत होगी, जो वित्त वर्ष 2024-25 में भारत के गैर-कोकिंग कोयले और प्राकृतिक गैस के वास्तविक आयात बिल से भी ज्यादा है। कुल अनुमानित बचत में सौर फोटोवोल्टिक बिजली की हिस्सेदारी लगभग 60 प्रतिशत रहने की उम्मीद है, जबकि पवन ऊर्जा का योगदान करीब 30 प्रतिशत हो सकता है।

IEA के अनुमानों के अनुसार, 2030 तक भारत की अक्षय बिजली क्षमता लगभग 530 गीगावाट तक पहुंच सकती है, जिसमें 350 गीगावाट से अधिक क्षमता सौर ऊर्जा की होगी। हालांकि, एजेंसी ने रेखांकित किया है कि बढ़ती रिन्युवल बिजली को समायोजित करने के लिए ट्रांसमिशन ढांचे, ऊर्जा भंडारण और बिजली प्रणाली की लचीलेपन में लगातार निवेश की जरूरत है।

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8 Nov 2026, 11:16 AM IST
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