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‘स्लीपिंग’ आतंकी मॉड्यूल का खतरनाक पैटर्न, 5-10 साल तक रहते हैं शांत; फिर बनाते हैं बड़े हमले की योजना

sleeping terror modules: भारत में खुद कट्टरपंथ की ओर बढ़ने वाले आतंकी मॉड्यूल के काम करने के तरीके में एक पैटर्न सामने आया है। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, ऐसे मॉड्यूल लंबे समय तक पूरी तरह निष्क्रिय रहते हैं।
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Oct 07, 2026
sleeping terror modules
sleeping terror modules (File Photo-IANS)

नई दिल्ली। भारत में खुद कट्टरपंथ की ओर बढ़ने वाले आतंकी मॉड्यूल के काम करने के तरीके में एक पैटर्न सामने आया है। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, ऐसे मॉड्यूल लंबे समय तक पूरी तरह निष्क्रिय रहते हैं। इसके बाद अचानक बड़े आतंकी हमले को अंजाम देने की कोशिश कर सकते हैं। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को आशंका है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे कई मॉड्यूल सक्रिय हो सकते हैं, जो वर्षों तक शांत रहने के बाद बड़ी आतंकी वारदात को अंजाम देने की तैयारी करते हैं।

IANS के मुताबिक, एक अधिकारी ने बताया कि भारत में ऐसे अधिकांश टेरर मॉड्यूल इस्लामिक स्टेट या अल-कायदा से प्रेरित बताए जाते हैं। अधिकारी ने कहा कि इन मॉड्यूल की सबसे खतरनाक विशेषता उनका लंबे समय तक धैर्य के साथ निष्क्रिय रहना है।

एक-दो युवाओं से शुरू होता है मॉड्यूल

अधिकारियों के मुताबिक, ऐसे मॉड्यूल की शुरुआत एक-दो युवाओं के साथ आने से होती है। उनका मुख्य उद्देश्य कट्टरपंथी प्रचार फैलाने वाला ऐसा मॉड्यूल बनाना होता है, जो अपने स्तर पर काम कर सके। समय के साथ वे नए लोगों को जोड़ते हैं, लेकिन बहुत कम लोगों को ही चुनते हैं। संभावित सदस्यों की अच्छी तरह से जांच-पड़ताल भी करते हैं।

इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के एक अधिकारी ने बताया कि ऐसे मॉड्यूल में अक्सर उच्च शिक्षित और अच्छी आय वाली नौकरियां करने वाले युवाओं को शामिल किया जाता है। अधिकारी के मुताबिक, सबसे पहली बात तो यह है कि ऐसे लोग आसानी से सुरक्षा एजेंसियों के शक के घेरे में नहीं आते। दूसरी बात, उनकी अच्छी सैलरी वाली नौकरियां होती हैं और उससे कमाए गए पैसे का इस्तेमाल खुद चलने वाले मॉड्यूल को चलाने में किया जाता है। इससे वित्तीय लेन-देन का पता नहीं चलता, क्योंकि मॉड्यूल को फंड करने के लिए किसी बाहरी स्रोत पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।

10 साल तक निष्क्रिय रहा पुणे का मॉड्यूल

अधिकारियों के अनुसार, देश में कुछ ऐसे मॉड्यूल वर्ष 2014 के आसपास स्थापित हुए और एक दशक से अधिक समय तक कोई स्पष्ट गतिविधि सामने नहीं आई। पुणे में पकड़ा गया मॉड्यूल भी इसी तरह काम कर रहा था। इसे वर्ष 2015 में स्थापित किया गया था और करीब 10 वर्षों तक इसने कोई खुली गतिविधि नहीं की।

अधिकारी के मुताबिक, ऐसे मॉड्यूल के लिए लंबे समय तक सुरक्षा एजेंसियों की नजर से दूर रहना ही उन्हें खतरनाक बनाता है। इस दौरान वे चुपचाप लोगों को कट्टरपंथ की ओर प्रभावित करने और नए सदस्यों को जोड़ने का काम करते रहते हैं।

अकेले हमले के बजाय लंबा इंतजार

एक अन्य अधिकारी ने बताया कि लंबे समय तक निष्क्रिय रहने वाले स्वयं संचालित मॉड्यूल आम तौर पर अकेले व्यक्ति से हमला कराने की रणनीति पर निर्भर नहीं रहते। अधिकारी के अनुसार, ऐसा हमला कम प्रभावी होने के साथ मॉड्यूल की गतिविधियों को भी उजागर कर सकता है। इसके बजाय ये समूह 5 से 10 साल तक इंतजार कर अपनी क्षमता और नेटवर्क तैयार करने की कोशिश करते हैं। इन मॉड्यूल की पहचान करना इसलिए भी मुश्किल होता है क्योंकि इनके सदस्य स्थानीय समुदाय में पूरी तरह घुल-मिलकर रहते हैं। इससे वे लंबे समय तक निष्क्रिय या बेहद सीमित गतिविधियों में रहने के बावजूद सुरक्षा एजेंसियों की नजर से बच सकते हैं।

एनआईए ने अपनाई सक्रिय कार्रवाई की रणनीति

अधिकारियों के अनुसार, राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने अब ऐसे मॉड्यूल के खिलाफ सक्रिय रूप से कार्रवाई करने की रणनीति अपनाई है। एजेंसी राज्य की जांच और सुरक्षा एजेंसियों के साथ समन्वय कर छापेमारी कर रही है, ताकि ऐसे छिपे हुए मॉड्यूल को पहले ही खत्म किया जा सके। अधिकारियों का कहना है कि यह लगातार चलने वाली कार्रवाई है और सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर ऐसे कई अन्य निष्क्रिय मॉड्यूल भी हैं। एजेंसियां केवल मौजूदा मॉड्यूल का पता लगाने पर ही ध्यान नहीं दे रही हैं, बल्कि नए मॉड्यूल के बनने की संभावनाओं को रोकने पर भी काम कर रही हैं।

पुणे मामला बना उदाहरण

पुणे का मामला इस तरह के निष्क्रिय मॉड्यूल के काम करने का उदाहरण बताया गया है। शुरुआती दौर में इस मॉड्यूल का ध्यान अल-कायदा के भारत के विनाश और 'गजवा-ए-हिंद' से जुड़े प्रचार को आगे बढ़ाने पर था। बाद में जब मॉड्यूल के सदस्यों को लगा कि वे आगे की कार्रवाई के लिए तैयार हैं, तब उन्होंने कोंढवा जैसे इलाकों में आईईडी हमलों की गतिविधियां शुरू कीं। खुफिया आकलन के अनुसार, देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे मॉड्यूल सामने आते रह सकते हैं। अधिकारियों के मुताबिक, इन स्वयं संचालित और लंबे समय तक निष्क्रिय रहने वाले मॉड्यूल से निपटने में खुफिया एजेंसियों की निगरानी अहम भूमिका निभाएगी।

Updated on:
07 Oct 2026 04:51 pm
Published on:
07 Oct 2026 04:51 pm