
Energy Innovationg: अक्सर लैपटॉप पर काम करते समय उसकी निचली सतह गर्म हो जाती है, गाड़ियों के इंजन से तपिश निकलती है और कारखानों की चिमनियों से बेहिसाब गर्मी हवा में उड़ जाती है। वैज्ञानिक लंबे समय से इस बेकार जाती ऊष्मा को सीधे बिजली में बदलने की कोशिशों में जुटे थे।
अब बेंगलूरु के जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च और भारतीय विज्ञान संस्थान ने सिडनी विश्वविद्यालय के साथ मिलकर यह उपलब्धि हासिल करते हुए एक सदी पुरानी सीमा तोड़ने का दावा किया है। साइंस जर्नल में प्रकाशित इस खोज की असली अहमियत यही है कि बिजली पैदा करने के लिए हमेशा नया ईंधन जरूरी नहीं होगा।
इस तकनीक की बुनियाद सीबेक प्रभाव पर है। इसका मतलब है कि जब किसी पदार्थ के एक सिरे को गर्म और दूसरे को ठंडा रखा जाता है, तो उसके भीतर के इलेक्ट्रॉन्स ठंडे सिरे की ओर भागते हैं। इस बहाव से वोल्टेज (बिजली) पैदा होता है। 1920 के दशक से ही वैज्ञानिक मानते आए थे कि किसी ठोस क्रिस्टल या सेमीकंडक्टर से प्रति डिग्री तापमान के अंतर पर सिर्फ कुछ माइक्रोवोल्ट या मिलीवोल्ट बिजली ही बनाई जा सकती है।
ज्यादा के लिए तरल रसायन का इस्तेमाल करना पड़ता था, लेकिन उनके रिसाव और जल्दी खराब होने का खतरा रहता है। अब भारतीय वैज्ञानिकों ने ठोस अवस्था में ही इस सीमा को पार करके दिखाया है।
वैज्ञानिकों ने स्कैंडियम नाइट्राइड नाम के पदार्थ की करीब 200 नैनोमीटर यानी बाल से भी सैकड़ों गुना पतली परत बनाई। इसमें नियंत्रित मात्रा में मैग्नीशियम मिलाकर परमाणुओं के स्तर पर ऐसा ढांचा तैयार किया, जिससे इलेक्ट्रॉन्स का प्रवाह कई गुना तेज हो गया। प्रयोग में इस पदार्थ ने 124.6 मिलीवॉट प्रति किलोएम्पीयर का वोल्टेज पैदा किया। यह ठोस पदार्थों के लिए मानी गई पुरानी सीमा से करीब 100 गुना अधिक है।