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19 सितंबर 1960 को हुई थी सिंधु जल संधि, अब भारत के फैसले से पाकिस्तान को क्यों सता रही पानी की चिंता?

Indus Water Treaty: सिंधु जल संधि क्या है और भारत-पाकिस्तान के बीच पानी को लेकर विवाद क्यों बढ़ा? जानें 1960 की संधि, 2025 के फैसले और 2026 के कानूनी विवाद की पूरी कहानी।
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Sep 19, 2026
India Pakistan Indus Water Treaty dispute
सिंधु जल संधि पर भारत के फैसले से पाकिस्तान की बढ़ी चिंता। (फोटो - एआई जनरेटेड)

Indus Waters Treaty Pakistan Crisis: भारत और पाकिस्तान के बीच पानी के बंटवारे के लिए 19 सितंबर 1960 को सिंधु जल संधि हुई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने कराची में इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। विश्व बैंक ने समझौता कराने में अहम भूमिका निभाई थी। इसके बाद सिंधु नदी तंत्र की छह प्रमुख नदियों के पानी के इस्तेमाल के अधिकार दोनों देशों के बीच तय किए गए।

सिंधु जल संधि पर भारत-पाकिस्तान के बीच फिर बढ़ा विवाद।

66 साल बाद यही संधि भारत-पाकिस्तान संबंधों में फिर बड़ा मुद्दा बनी हुई है। अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने संधि को स्थगित रखने का फैसला किया। भारत का कहना है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को समर्थन देना पूरी तरह बंद नहीं करता, तब तक संधि स्थगित रहेगी। 31 अगस्त 2026 को हेग की मध्यस्थता अदालत के फैसले के बाद भी भारत ने अपना यही रुख कायम रखा है। पाकिस्तान इसका विरोध कर रहा है और पानी को लेकर गंभीर चिंता जता रहा है।

लेकिन पाकिस्तान की चिंता की असली वजह क्या है? इसे समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि सिंधु नदी तंत्र का पानी दोनों देशों के बीच कैसे बांटा गया और पाकिस्तान की खेती इससे कितनी जुड़ी हुई है।

सिंधु जल संधि में 6 नदियों का कैसे हुआ बंटवारा?

सिंधु नदी तंत्र में छह प्रमुख नदियां आती हैं। इनमें रावी, ब्यास, सतलुज, सिंधु, झेलम और चिनाब शामिल हैं। संधि के तहत तीन पूर्वी नदियों रावी, ब्यास और सतलुज का पानी मुख्य रूप से भारत के इस्तेमाल के लिए रखा गया। वहीं तीन पश्चिमी नदियों सिंधु, झेलम और चिनाब का पानी मुख्य रूप से पाकिस्तान के लिए तय किया गया। लेकिन पश्चिमी नदियों पर भारत के अधिकार पूरी तरह खत्म नहीं हुए। संधि भारत को तय शर्तों के तहत इन नदियों के पानी का घरेलू इस्तेमाल, कुछ कृषि उपयोग और बिजली उत्पादन जैसी गतिविधियों की अनुमति देती है। पश्चिमी नदियों पर भारत की जलविद्युत परियोजनाओं के डिजाइन और पानी के भंडारण को लेकर संधि में विस्तृत नियम बनाए गए थे। यही नियम बाद में दोनों देशों के बीच कई जल विवादों की वजह भी बने।

सिंधु जल संधि के तहत छह प्रमुख नदियों के पानी के इस्तेमाल के अधिकार भारत और पाकिस्तान के बीच तय किए गए थे।

भारत के लिए कितना और पाकिस्तान के लिए कितना पानी?

भारत सरकार के पुराने आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, पूर्वी नदियों का औसत सालाना जल प्रवाह करीब 3.3 करोड़ एकड़-फीट था। यह पानी संधि के तहत भारत के इस्तेमाल के लिए उपलब्ध कराया गया। इसके मुकाबले पश्चिमी नदियों में औसत सालाना जल प्रवाह करीब 13.5 करोड़ एकड़-फीट बताया गया था। इन नदियों का पानी मुख्य रूप से पाकिस्तान के लिए निर्धारित किया गया। यानी संधि के तहत पाकिस्तान को नदी तंत्र के पानी का काफी बड़ा हिस्सा मिला। इसकी बड़ी वजह पाकिस्तान की सिंचाई व्यवस्था का सिंधु नदी तंत्र से गहराई से जुड़ा होना था।

सिंधु जल संधि में भारत-पाकिस्तान के बीच पानी का बंटवारा।

रावी, ब्यास और सतलुज पर भारत ने क्या बनाया?

संधि के बाद भारत ने अपने हिस्से में आई पूर्वी नदियों के पानी के इस्तेमाल के लिए कई बड़ी परियोजनाएं विकसित कीं। सतलुज नदी पर भाखड़ा बांध इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यह सिंचाई और बिजली उत्पादन दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। ब्यास नदी पर पोंग बांध और पंडोह बांध बनाए गए। इसके अलावा ब्यास और सतलुज को जोड़ने वाली व्यवस्था के जरिए पानी के बेहतर इस्तेमाल की व्यवस्था की गई। रावी नदी पर रणजीत सागर यानी थीन बांध बनाया गया। इसके अलावा रावी के पानी के बेहतर इस्तेमाल के लिए शाहपुरकंडी परियोजना को आगे बढ़ाया गया।

पूर्वी नदियों पर भारत की प्रमुख बांध और जल परियोजनाएं।

भारत सरकार ने 2019 में बताया था कि देश पूर्वी नदियों के अपने हिस्से के करीब 95 फीसदी पानी का इस्तेमाल कर रहा था। उस समय करीब 20 लाख एकड़-फीट पानी माधोपुर के नीचे रावी से पाकिस्तान की ओर जाने की बात भी सरकार ने कही थी।

2026 में रावी से जुड़े एक और महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट पर भी काम आगे बढ़ा है। अगस्त 2026 में केंद्र सरकार ने उझ बहुउद्देशीय परियोजना की स्थिति की समीक्षा की। सरकार के मुताबिक, इससे जम्मू-कश्मीर और पंजाब में करीब 90 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई का लाभ मिल सकता है। परियोजना से करीब 186 से 212 मेगावाट बिजली पैदा करने की क्षमता भी बताई गई है।

चिनाब और झेलम पर भारत की कौन सी बड़ी परियोजनाएं?

भारत ने पश्चिमी नदियों पर भी संधि में मिली अनुमति के तहत कई जलविद्युत परियोजनाएं विकसित कीं। चिनाब नदी पर सलाल और बगलिहार जैसी परियोजनाएं हैं। इसी नदी क्षेत्र में रतले, किरो और क्वार जैसी परियोजनाएं भी महत्वपूर्ण हैं। झेलम नदी तंत्र में किशनगंगा जलविद्युत परियोजना है। इसकी बिजली उत्पादन क्षमता 330 मेगावाट है। इन्हीं परियोजनाओं के डिजाइन और पानी के इस्तेमाल को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से विवाद होते रहे हैं। पाकिस्तान ने खास तौर पर किशनगंगा और रतले परियोजनाओं के कुछ तकनीकी पहलुओं पर आपत्ति जताई थी।

पश्चिमी नदियों पर भारत की प्रमुख जलविद्युत परियोजनाएं।

युद्ध हुए, लेकिन सिंधु जल संधि चलती रही

सिंधु जल संधि की एक खास बात यह रही कि भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में गंभीर तनाव के बावजूद यह लंबे समय तक बनी रही। 1965 और 1971 में दोनों देशों के बीच युद्ध हुए। 1999 में करगिल संघर्ष हुआ। इसके अलावा दोनों देशों के रिश्ते कई बार बेहद खराब हुए। फिर भी सिंधु जल संधि के तहत बनी व्यवस्था जारी रही। संधि ने विवाद सुलझाने के लिए भी एक व्यवस्था बनाई थी। दोनों देशों के सिंधु जल आयुक्त नियमित रूप से इससे जुड़े मुद्दों पर बातचीत करते थे। तकनीकी मतभेदों और बड़े विवादों के लिए भी अलग-अलग प्रक्रिया तय की गई थी। लेकिन अप्रैल 2025 के बाद स्थिति बदल गई।

सिंधु जल संधि की 1960 से 2026 तक की प्रमुख घटनाओं की टाइमलाइन।

अप्रैल 2025 में भारत ने क्यों लिया बड़ा फैसला?

22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ कई कदम उठाए। इनमें सिंधु जल संधि को स्थगित रखना भी शामिल था। इसके बाद भारत ने कहा कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को समर्थन पूरी तरह और भरोसेमंद तरीके से बंद नहीं करता, संधि स्थगित रहेगी। जुलाई 2026 में विदेश मंत्रालय ने भी कहा था कि भारत का रुख पहले जैसा है और संधि स्थगित है। 31 अगस्त 2026 को भारत ने फिर स्पष्ट किया कि उसका फैसला लागू है।

पहलगाम हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि स्थगित की।

पाकिस्तान को सिंधु के पानी की इतनी चिंता क्यों?

इस सवाल का जवाब पाकिस्तान की खेती और उसकी सिंचाई व्यवस्था में छिपा है। सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियां पाकिस्तान के पंजाब और सिंध जैसे बड़े कृषि क्षेत्रों से होकर गुजरती हैं। इन नदियों से निकली नहरों का बड़ा जाल खेतों तक पानी पहुंचाता है। पाकिस्तान में गेहूं, चावल, कपास और गन्ने जैसी प्रमुख फसलों की खेती बड़े पैमाने पर सिंचाई पर निर्भर है। इसलिए सिंधु नदी तंत्र में पानी की उपलब्धता को लेकर लंबे समय की अनिश्चितता पाकिस्तान के लिए कृषि और खाद्य सुरक्षा का सवाल बन सकती है।

सिंधु के पानी पर पाकिस्तान की खेती और सिंचाई व्यवस्था की निर्भरता।

इसी वजह से पाकिस्तान के अधिकारी सिंधु जल संधि को सिर्फ दो देशों के बीच पानी बांटने का समझौता नहीं मानते। उनके मुताबिक, यह पाकिस्तान की खेती, खाद्य सुरक्षा, बिजली और लोगों की रोजी-रोटी से भी जुड़ा है। अगस्त 2026 में पाकिस्तान के योजना मंत्री अहसान इकबाल ने संधि को स्थगित रखने को पानी को दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल करने से जोड़ा और इसे पाकिस्तान के लिए नई सुरक्षा चुनौती बताया। यह पाकिस्तान सरकार का पक्ष है।

80 फीसदी से ज्यादा कृषि भूमि का सवाल

पाकिस्तान की तरफ से जारी आधिकारिक जानकारी में कहा गया है कि 80 फीसदी से ज्यादा कृषि भूमि सिंधु नदी तंत्र पर निर्भर है। फरवरी 2026 में पाकिस्तान की सरकारी समाचार एजेंसी ने भी कहा था कि देश की 80 फीसदी से ज्यादा कृषि व्यवस्था सिंधु बेसिन से मिलने वाली सिंचाई पर निर्भर है।

सिंधु नदी तंत्र पर पाकिस्तान की खेती की निर्भरता।

इस आंकड़े का महत्व समझना जरूरी है। इसका मतलब यह नहीं है कि भारत संधि स्थगित करते ही पाकिस्तान की 80 फीसदी खेती का पानी तत्काल रोक सकता है। नदियों का प्रवाह, मौजूदा बांधों की क्षमता, मौसम, जलाशयों और भौगोलिक परिस्थितियों जैसी कई चीजें वास्तविक पानी की उपलब्धता तय करती हैं। लेकिन यह आंकड़ा बताता है कि पाकिस्तान की कृषि व्यवस्था में सिंधु नदी तंत्र की भूमिका कितनी बड़ी है।

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में भी खेती का बड़ा हिस्सा

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्व भी उसकी चिंता को समझाता है। पाकिस्तान आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के मुताबिक, देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 23.44 फीसदी थी। रोजगार के लिहाज से भी कृषि बेहद महत्वपूर्ण है। नवीनतम श्रम आंकड़ों के मुताबिक, कृषि, वानिकी और मत्स्य क्षेत्र में पाकिस्तान के 33.1 फीसदी कामगार जुड़े हुए थे। इसलिए सिंचाई पर लंबे समय का दबाव सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रह सकता। इसका असर किसानों की आमदनी, ग्रामीण रोजगार, कृषि से जुड़े उद्योग और खाद्य कीमतों तक पहुंच सकता है।

गेहूं, चावल और गन्ने पर क्यों है ज्यादा जोखिम?

पाकिस्तान की प्रमुख फसलों में गेहूं, चावल, कपास और गन्ना शामिल हैं। इन फसलों के उत्पादन में सिंचाई महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पाकिस्तान आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, देश में गेहूं का उत्पादन करीब 2.96 करोड़ टन रहा। चावल का उत्पादन करीब 1 करोड़ टन और गन्ने का उत्पादन करीब 8.95 करोड़ टन रहा। ऐसे में सिंचाई के पानी की उपलब्धता में लंबे समय तक अनिश्चितता किसानों के लिए मुश्किल पैदा कर सकती है। बुआई और फसल के महत्वपूर्ण समय पर पर्याप्त पानी न मिलने से उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इसका असर खाद्य आपूर्ति और कीमतों पर भी पड़ सकता है। लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि संधि स्थगित होना और पाकिस्तान को तत्काल पानी मिलना बंद हो जाना एक ही बात नहीं है।

क्या भारत तुरंत पाकिस्तान का पानी रोक सकता है?

इस सवाल का जवाब सीधा हां या नहीं में देना सही नहीं होगा। नदी के पानी को बड़े स्तर पर कंट्रोल करने के लिए बांध, जलाशय, नहरें और दूसरी संरचनाएं चाहिए। इन परियोजनाओं को तैयार करने में समय लगता है। नदी का प्राकृतिक प्रवाह भी एक महत्वपूर्ण पहलू है। इसलिए संधि स्थगित होने का मतलब यह नहीं है कि पश्चिमी नदियों का पूरा पानी तुरंत पाकिस्तान पहुंचना बंद हो जाएगा।

क्या भारत तुरंत पाकिस्तान का पानी रोक सकता है?

लेकिन संधि स्थगित रहने से दोनों देशों के बीच पानी से जुड़ी पुरानी व्यवस्था, जानकारी साझा करने की प्रक्रिया और परियोजनाओं को लेकर आपत्तियों के तरीके पर असर पड़ सकता है। भारत भविष्य में अपनी जल और बिजली परियोजनाओं को लेकर पहले से अलग रुख भी अपना सकता है। भारत ने 2026 में पाकिस्तान की कुछ आपत्तियों के जवाब में अपनी परियोजनाओं को संप्रभु अधिकारों से जुड़ा मामला बताया है।

पाकिस्तान के ‘पानी को हथियार’ बनाने के आरोप पर भारत का क्या कहना है?

पाकिस्तान के नेताओं ने भारत के कदमों को लेकर कड़ी आपत्ति जताई है। पाकिस्तान की तरफ से पानी को दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल करने के आरोप भी लगाए गए हैं। अगस्त 2026 में पाकिस्तान के योजना मंत्री अहसान इकबाल ने भी भारत के कदम को पानी के इस्तेमाल को दबाव के साधन के रूप में बदलने से जोड़ा था। भारत ने इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया है। भारत का आधिकारिक रुख है कि संधि को स्थगित रखने का फैसला पाकिस्तान की तरफ से सीमा पार आतंकवाद को जारी समर्थन के जवाब में लिया गया है। भारत ने कहा है कि स्थिति पर दोबारा विचार करने के लिए पाकिस्तान को आतंकवाद को समर्थन पूरी तरह छोड़ना होगा। इसलिए 'भारत ने पानी को हथियार बना लिया' को तथ्य के रूप में लिखना सही नहीं होगा। यह पाकिस्तान की ओर से लगाया गया आरोप है।

कानूनी लड़ाई भी जारी

सिंधु जल संधि से जुड़ा विवाद अंतरराष्ट्रीय कानूनी प्रक्रिया तक भी पहुंच चुका है। भारत और पाकिस्तान के बीच पश्चिमी नदियों पर जलविद्युत परियोजनाओं के डिजाइन को लेकर पहले से मतभेद रहे हैं। मध्यस्थता की प्रक्रिया को लेकर भी दोनों देशों का रुख अलग है। 31 अगस्त 2026 को हेग की स्थायी मध्यस्थता अदालत ने कहा कि सिंधु जल संधि लागू है और भारत एकतरफा तौर पर इसे स्थगित नहीं कर सकता। अदालत ने रतले जलविद्युत परियोजना के कुछ निर्माण कार्यों पर अंतरिम रोक से जुड़े निर्देश भी दिए।

सिंधु जल संधि विवाद अब अंतरराष्ट्रीय कानूनी प्रक्रिया तक पहुंच चुका है।

भारत ने उसी दिन इस फैसले को खारिज कर दिया। विदेश मंत्रालय ने कहा कि वह इस अदालत को मान्यता नहीं देता और उसके फैसले का भारत की परियोजनाओं पर कोई असर नहीं पड़ेगा। भारत ने दोहराया कि सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का उसका फैसला लागू है।

इसलिए मौजूदा विवाद सिर्फ नदी के पानी तक सीमित नहीं है। इसमें संधि की कानूनी स्थिति, भारत की जलविद्युत परियोजनाएं, पाकिस्तान की आपत्तियां और विवाद निपटाने की प्रक्रिया भी शामिल हैं।

आखिर पाकिस्तान की चिंता कितनी बड़ी है?

पाकिस्तान की चिंता के पीछे तीन बड़ी वजहें हैं। पहला, उसकी बड़ी सिंचाई व्यवस्था सिंधु नदी तंत्र से जुड़ी है। पाकिस्तान के 2025-26 आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, सिंधु बेसिन सिंचाई व्यवस्था करीब 4.7 करोड़ एकड़ जमीन तक फैली है। दूसरा, कृषि का उसकी अर्थव्यवस्था और रोजगार में बड़ा हिस्सा है। तीसरा, गेहूं, चावल, कपास और गन्ने जैसी प्रमुख फसलें सिंचाई पर निर्भर हैं। इसलिए लंबे समय तक पानी की उपलब्धता को लेकर अनिश्चितता पाकिस्तान के लिए कृषि, रोजगार और खाद्य सुरक्षा की चिंता बढ़ा सकती है।

लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि भारत संधि स्थगित रखते ही पाकिस्तान का पूरा पानी तत्काल रोक सकता है। वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि नदियों में कितना पानी है, भारत के पास कितनी भंडारण और जल प्रबंधन क्षमता है और आने वाले सालों में कौन सी परियोजनाएं पूरी होती हैं। 19 सितंबर 1960 को हुई सिंधु जल संधि इसलिए आज भी अहम है। छह नदियों के पानी का बंटवारा करने वाला यह समझौता अब भारत-पाकिस्तान के बीच सुरक्षा, कूटनीति, खेती और पानी, चारों से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है।

Updated on:
19 Sept 2026 11:29 am
Published on:
19 Sept 2026 11:29 am