18 सितंबर 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

‘ब्रांड मोदी’ को कौन से फैक्टर कमजोर कर रहे हैं और इससे निपटने के लिए PM मोदी व BJP क्या कर रही है?

Narendra Modi: ‘ब्रांड मोदी’ की लोकप्रियता पर असर डालने वाले रोजगार, महंगाई और युवाओं से जुड़े मुद्दों को समझें। जानें सरकार और बीजेपी इन चुनौतियों से निपटने के लिए क्या कदम उठा रही हैं।
8 min read
Google source verification

भारत

image

Rahul Yadav

Sep 17, 2026

Modi Popularity

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (फोटो - एआई जनरेटेड)

Narendra Modi Popularity: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता अभी भी भारतीय राजनीति में मजबूत बनी हुई है, लेकिन 2026 के कुछ सर्वे और पिछले चुनावों के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि ‘ब्रांड मोदी’ के सामने अब आर्थिक चिंताएं, रोजगार, महंगाई, युवा मतदाताओं की अपेक्षाएं और लंबे समय की सत्ता-विरोधी भावना जैसी चुनौतियां मौजूद हैं। इसे मोदी की लोकप्रियता खत्म होने के तौर पर देखना सही नहीं होगा। अगस्त 2026 के इंडिया टुडे-सी वोटर मूड ऑफ द नेशन सर्वे में मोदी 48.7 फीसदी के साथ प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे पसंदीदा चेहरा रहे। हालांकि जनवरी 2026 के 54.7 फीसदी के मुकाबले यह करीब 6 प्रतिशत अंक की गिरावट है।

यानी तस्वीर दो हिस्सों में है। एक तरफ मोदी अब भी सबसे आगे हैं। दूसरी तरफ उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता और सरकार के प्रदर्शन को लेकर कुछ वर्गों में सवाल बढ़े हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि दबाव के प्रमुख कारण क्या हैं और सरकार व बीजेपी ने इनके जवाब में कौन से कदम उठाए हैं।

1. रोजगार सबसे बड़ी चुनौती

रोजगार का मुद्दा मोदी सरकार के सामने सबसे महत्वपूर्ण दबावों में से एक बना हुआ है। अगस्त 2026 के मूड ऑफ द नेशन सर्वे में करीब दो-तिहाई लोगों ने बेरोजगारी की स्थिति को गंभीर या बहुत गंभीर बताया। सर्वे में बेरोजगारी को सरकार की बड़ी विफलताओं में शामिल किया गया। युवाओं में यह चिंता और ज्यादा दिखाई दी।

सरकारी आंकड़ों में तस्वीर कुछ अलग है। रॉयटर्स के मुताबिक, अगस्त 2026 में भारत की बेरोजगारी दर 5 फीसदी रही, जो फरवरी के 4.9 फीसदी के बाद छह महीने का निचला स्तर था। शहरी बेरोजगारी 6.8 फीसदी रही। वहीं 15 से 29 साल के युवाओं में बेरोजगारी की दर इससे काफी ज्यादा है। 2024-25 के आंकड़ों में इस आयु वर्ग की बेरोजगारी दर करीब 9.9 फीसदी थी।

यही अंतर राजनीतिक बहस में महत्वपूर्ण है। सरकार रोजगार के आंकड़ों और नई नौकरियों की बात करती है, जबकि युवा अक्सर नौकरी की गुणवत्ता, वेतन और स्थायी रोजगार को ज्यादा अहम मानते हैं।

सरकार क्या कर रही है?

सरकार ने जून 2026 में प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना (PM-VBRY) के तहत करीब 2,400 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन राशि जारी की। यह राशि योजना के तहत रोजगार को बढ़ावा देने के लिए दी गई। प्लान के तहत पहली बार नौकरी पाने वाले कर्मचारियों को 15,000 रुपये तक का प्रोत्साहन और अतिरिक्त कर्मचारियों की भर्ती करने वाले नियोक्ताओं को हर महीने 3,000 रुपये तक का प्रोत्साहन दिया जा रहा है। सरकार के मुताबिक योजना के तहत 15 लाख लाभार्थियों को रोजगार से जोड़ा जा चुका था।

ग्रामीण रोजगार के लिए 2026 में विकसित भारत-जी राम जी अधिनियम भी लागू किया गया, जिसमें ग्रामीण परिवारों के लिए रोजगार की गारंटी 100 दिन से बढ़ाकर 125 दिन करने का प्रावधान बताया गया है।

2. महंगाई और घरेलू बजट का दबाव

दूसरी बड़ी चिंता महंगाई है। अगस्त 2026 में देश की खुदरा महंगाई 4.82 फीसदी रही। जुलाई में यह 4.45 फीसदी थी। नई CPI सीरीज शुरू होने के बाद अगस्त की महंगाई सबसे ज्यादा रही। अगस्त 2026 में खाद्य महंगाई 5.95 फीसदी रही। ग्रामीण इलाकों में महंगाई 5.23 फीसदी, जबकि शहरी इलाकों में 4.31 फीसदी रही। इसका सीधा असर लोगों के रोजमर्रा के खर्च पर पड़ता है।

मूड ऑफ द नेशन सर्वे में 65 फीसदी लोगों ने कहा कि घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है और उन्हें कर्ज लेने की जरूरत पड़ रही है। जनवरी में यह आंकड़ा 63.2 फीसदी था। यानी कुछ महीनों में घरेलू खर्च को लेकर चिंता बढ़ी है। यहां एक बात समझना जरूरी है। सरकारी महंगाई का आंकड़ा औसत कीमतों के आधार पर तैयार होता है। लेकिन किसी परिवार पर महंगाई का असर उसकी जरूरतों और खर्च के हिसाब से अलग हो सकता है। दूध, सब्जी, खाद्य तेल, पेट्रोल और शिक्षा जैसी चीजों के दाम बढ़ने से घर का बजट सीधे प्रभावित होता है।

खाद्य तेल की कीमत भी चिंता बढ़ा रही है। रॉयटर्स के मुताबिक, भारत अपनी जरूरत का करीब दो-तिहाई खाद्य तेल आयात करता है। पिछले एक साल में खाद्य तेल की कीमत करीब 20 फीसदी बढ़ी है। बढ़ती कीमतों को देखते हुए सरकार आयात शुल्क में कटौती के विकल्प पर विचार कर रही है। यानी महंगाई की तस्वीर सिर्फ 4.82 फीसदी खुदरा महंगाई तक सीमित नहीं है। खाद्य महंगाई 5.95 फीसदी और घरेलू खर्च को लेकर 65 फीसदी लोगों की चिंता बताती है कि महंगाई आम परिवारों के लिए एक बड़ा मुद्दा बनी हुई है।

3. युवा और Gen Z की बदलती प्राथमिकताएं

2026 में Gen Z यानी युवा मतदाता भी एक नई चुनौती के रूप में सामने आए हैं। मूड ऑफ द नेशन सर्वे में युवाओं के बीच नौकरी, शिक्षा, परीक्षा व्यवस्था और भविष्य को लेकर चिंता दिखाई दी। सर्वे के मुताबिक, 43.9 फीसदी Gen Z युवाओं ने नरेंद्र मोदी को अगले प्रधानमंत्री के लिए सबसे उपयुक्त माना। सभी आयु वर्गों में यह आंकड़ा 48.7 फीसदी था। वहीं, मोदी के कामकाज को बेहतरीन बताने वाले Gen Z युवाओं की संख्या भी कुल आबादी के मुकाबले कम रही।

2026 में पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था को लेकर छात्रों की नाराजगी भी चर्चा में रही। इसके बाद बीजेपी और केंद्र सरकार ने युवाओं तक अपनी पहुंच बढ़ाने और उनसे सीधे संवाद करने पर ज्यादा ध्यान देना शुरू किया।

BJP और सरकार की रणनीति

बीजेपी ने Gen Z यानी युवा वर्ग से जुड़ने के लिए एक अलग टीम बनाई है। पार्टी Instagram, Snapchat और Reddit जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपनी मौजूदगी बढ़ा रही है। युवाओं तक सिर्फ संदेश पहुंचाने के बजाय उनसे सीधे बातचीत करने पर भी जोर दिया जा रहा है। केंद्र सरकार ने भी मंत्रियों को विश्वविद्यालयों में जाकर छात्रों से बातचीत करने के निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही मंत्रियों की सोशल मीडिया पर पहुंच और युवाओं के साथ उनकी बातचीत का भी आकलन किया जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इंस्टाग्राम पर युवाओं से जुड़े और ज्यादा अनौपचारिक वीडियो पोस्ट कर रहे हैं। रॉयटर्स ने इसे Gen Z तक पहुंच बनाने की कोशिश के तौर पर रिपोर्ट किया है। हालांकि, इन कोशिशों का राजनीतिक असर कितना होगा, यह अभी कहना जल्दबाजी होगी।

4. 2024 के लोकसभा चुनाव ने बढ़ाई BJP की चुनौती

‘ब्रांड मोदी’ पर चर्चा में 2024 का लोकसभा चुनाव सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है। बीजेपी ने 2019 में 303 सीटें जीती थीं, लेकिन 2024 में उसकी संख्या घटकर 240 रह गई। यानी पार्टी अपने दम पर 272 के बहुमत के आंकड़े से 32 सीट पीछे रह गई। NDA ने 293 सीटों के साथ सरकार बनाई और बीजेपी को सरकार चलाने के लिए सहयोगी दलों पर निर्भर होना पड़ा।

इस चुनाव में उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में बीजेपी के प्रदर्शन ने भी राजनीतिक विश्लेषण को प्रभावित किया। 2024 के बाद कई विश्लेषकों ने यह सवाल उठाया कि क्या हर चुनाव को सिर्फ मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता के आधार पर देखा जा सकता है। लेकिन इसके बाद की तस्वीर भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

5. विधानसभा चुनावों में BJP की वापसी

2024 के लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी ने कई विधानसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया। 2026 के पश्चिम बंगाल चुनाव में बड़ी जीत के बाद पार्टी की पूर्वी भारत में भी पकड़ मजबूत हुई। इसके अलावा बिहार, महाराष्ट्र, असम, हरियाणा और दिल्ली के विधानसभा चुनावों में भी बीजेपी या उसके सहयोगी दलों ने अच्छा प्रदर्शन किया।

इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि 2024 के बाद ‘ब्रांड मोदी’ लगातार कमजोर ही हुआ है। 2026 के सर्वे में भी मोदी सबसे पसंदीदा प्रधानमंत्री पद के चेहरे बने हुए हैं। अगस्त के सर्वे में उनका समर्थन 48.7 फीसदी था।

6. आर्थिक विकास और आमदनी के बीच अंतर

भारत की अर्थव्यवस्था तेज गति से बढ़ रही है लेकिन इसका फायदा सभी वर्गों तक समान रूप से पहुंचने को लेकर सवाल हैं। मूड ऑफ द नेशन सर्वे में 43.7 फीसदी लोगों ने कहा कि मोदी सरकार की नीतियों से सबसे ज्यादा फायदा अमीरों को हुआ। वहीं 55.7 फीसदी लोगों का मानना था कि आर्थिक नीतियों का सबसे ज्यादा फायदा बड़े कारोबार को मिला।

यही वजह है कि सरकार के लिए सिर्फ जीडीपी ग्रोथ या बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पर्याप्त राजनीतिक संदेश नहीं बन रहे हैं। सर्वे में लोगों ने रोजगार, आय, महंगाई और आर्थिक सुरक्षा को ज्यादा अहम माना। सरकार दूसरी तरफ डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT), मुफ्त राशन, आवास, ग्रामीण रोजगार और दूसरी कल्याणकारी योजनाओं के जरिए सीधे लाभ पहुंचाने पर जोर दे रही है। वित्त वर्ष 2026-27 में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के जरिए अब तक 2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि ट्रांसफर होने की रिपोर्ट है।

7. 12 साल की सत्ता के बाद बढ़ी चुनौतियां

नरेंद्र मोदी मई 2014 से प्रधानमंत्री हैं। 2026 में केंद्र की सत्ता में बीजेपी के 12 साल पूरे हो चुके हैं। इतने लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद सरकार के खिलाफ स्थानीय या राष्ट्रीय स्तर पर असंतोष के मुद्दे उठना स्वाभाविक राजनीतिक प्रक्रिया है।

अगस्त 2026 के सर्वे में 51.3 फीसदी लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कामकाज को ‘अच्छा’ से ‘बेहतरीन’ माना। जनवरी में यह आंकड़ा 57 फीसदी था। यानी कुछ महीनों में मोदी के कामकाज को अच्छा मानने वालों की संख्या में कमी आई। हालांकि, अगस्त में भी आधे से ज्यादा लोगों ने उनके कामकाज को अच्छा या बेहतरीन माना।

यानी समस्या यह नहीं है कि मोदी की लोकप्रियता खत्म हो गई है। ज्यादा सटीक निष्कर्ष यह है कि उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता और सरकार के प्रदर्शन के बीच अंतर बढ़ रहा है।

8. BJP के सामने अब क्या तस्वीर है?

अगस्त 2026 के मूड ऑफ द नेशन सर्वे में मोदी के समर्थन में कुछ कमी दिखी। इसके बावजूद, अगर उस समय लोकसभा चुनाव होते तो सर्वे के मुताबिक NDA को 326 सीटें मिल सकती थीं। यह सिर्फ सर्वे का अनुमान था, किसी वास्तविक चुनाव का नतीजा नहीं।

इसी सर्वे में यह भी सामने आया कि मोदी की लोकप्रियता में गिरावट का सीधा फायदा विपक्ष को नहीं मिला। राहुल गांधी का समर्थन 26.6 फीसदी से बढ़कर सिर्फ 27.1 फीसदी हुआ। इससे संकेत मिलता है कि सरकार से असंतुष्ट हर मतदाता जरूरी नहीं कि एक ही विपक्षी विकल्प की तरफ जा रहा हो।

तो क्या कमजोर पड़ रहा है ‘ब्रांड मोदी’?

2026 में ‘ब्रांड मोदी’ के सामने सबसे बड़े सवाल रोजगार, महंगाई, आय, युवा अपेक्षाएं, परीक्षा व्यवस्था और लंबे समय की सत्ता से पैदा होने वाला असंतोष हैं। वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक स्थिरता, कल्याणकारी योजनाएं, इंफ्रास्ट्रक्चर, राम मंदिर, राष्ट्रीय सुरक्षा और मोदी की व्यक्तिगत नेतृत्व छवि अब भी उनकी राजनीतिक ताकत बने हुए हैं।

मौजूदा स्थिति को ‘ब्रांड मोदी खत्म हो रहा है’ कहना सही नहीं होगा। सर्वे और चुनावी आंकड़े इससे अलग तस्वीर दिखाते हैं। मोदी की लोकप्रियता अभी भी मजबूत है, लेकिन रोजगार, महंगाई और युवाओं से जुड़े मुद्दों का दबाव बढ़ा है।

सरकार और बीजेपी ने इन चुनौतियों से निपटने के लिए रोजगार योजनाओं, कल्याणकारी योजनाओं और युवाओं से सीधे संवाद पर जोर बढ़ाया है। इन कोशिशों का लोगों की सोच पर कितना असर पड़ेगा, यह आने वाले चुनाव और नए सर्वे से ही साफ होगा।

बड़ी खबरें

View All

राष्ट्रीय

ट्रेंडिंग