ग्लेशियर के पिघलने से हिमालय क्षेत्र में नई झीलों का निर्माण होता है और मौजूदा झीलों का विस्तार होता है। ग्लेशियरों के पिघलने से बनी ये बर्फीली झीलें हिमालय क्षेत्र में मीठे पानी के स्रोत के रूप में देखी जाती हैं। लेकिन, इनका विस्तार जोखिम भरा है।
भारतीय हिमालय क्षेत्र में हिमनद झीलों (बर्फीले झीलों) का आकार खतरनाक ढंग से बढ़ रहा है। यह वैश्विक जलवायु परिवर्तन को प्रभावित करने वाला अति संवदेनशील क्षेत्र है।भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने कहा है कि, उपग्रहों से प्राप्त आंकड़ों और दुनिया भर में किए गए शोधों से पता चला है कि, 18 वीं शताब्दी में औद्योगिक क्रांति की शुरुआत के बाद से ही ग्लेशियर अभूतपूर्व दर से पतले होते जा रहे हैं। ग्लेशियर के पिघलने से हिमालय क्षेत्र में नई झीलों का निर्माण होता है और मौजूदा झीलों का विस्तार होता है।
ग्लेशियरों के पिघलने से बनी ये बर्फीली झीलें हिमालय क्षेत्र में मीठे पानी के स्रोत के रूप में देखी जाती हैं। लेकिन, इनका विस्तार जोखिम भरा है। क्योंकि, ग्लेशियल लेक आउटबस्र्ट फ्लड (जीएलओएफ), के कारण निचले इलाकों में बाढ़ आ सकती है और उसके विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं। इनकी निगरानी करना भी काफी मुश्किल है।
इसरो ने 1984 से 2023 तक उपग्रह से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण कर कहा है कि, 2016-17 में 10 हेक्टेयर बड़े 2341 बर्फीले झीलों की पहचान की गई थी। इनमें से 676 हिमनद झीलों का आकार 1984 की तुलना में अप्रत्याशित रूप से बढ़ा है। इनमें से 130 झीलें भारतीय क्षेत्र में हैं। सिंधु बेसिन में 65, गंगा बेसिन में 7 और ब्रह्मपुत्र बेसिन में 58 झीलें शामिल हैं। झीलों के आकार में परिवर्तन बड़े पैमाने पर हुए हैं और 601 झीलों के आकार लगभग दोगुने हो गए हैं।
दस झीलों के आकार डेढ़ से दोगुना बढ़े हैं। वहीं, शेष 65 झीलों के आकार डेढ़ गुणा बढ़े हैं। इसरो ने कहा है कि, ग्लेशियरों का पिघलना बड़े पैमाने पर जलवायु परिवर्तन का संकेत हैं। इससे निचले पर्वतीय क्षेत्रों में विनाशकारी बाढ़ आ सकती है।