
Jairam Ramesh ECINet: मतदाता सूची में नाम होना लोकतंत्र की पहली सीढ़ी है, लेकिन अगर किसी तकनीकी सिस्टम की वजह से अधिकारी की मंजूरी के बावजूद नाम वापस न जोड़ा जा सके, तो सवाल सिर्फ एक राज्य तक सीमित नहीं रहता। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने अपने ताजा X पोस्ट में गोवा का उदाहरण सामने रखते हुए ECINet की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनके मुताबिक, सात दिनों में आठ बार अनुरोध किए जाने के बावजूद वैध मतदाताओं के नाम नहीं जुड़ सके। यही मामला अब SIR की प्रक्रिया में तकनीक की भूमिका को लेकर बहस तेज कर रहा है।
जयराम रमेश ने अपने X पोस्ट में कहा है कि गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) कार्यालय ने महज एक सप्ताह में आठ बार निर्वाचन आयोग से संपर्क किया था। मुद्दा उन मतदाताओं के नाम वापस शामिल करने का था, जिन्हें संबंधित Electoral Registration Officers (EROs) ने जांच के बाद वैध माना था। उनके मुताबिक, सॉफ्टवेयर में जरूरी बदलाव या रोलबैक सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण इन नामों को अंतिम सूची में शामिल नहीं किया जा सका।
इस मामले की स्वतंत्र रिपोर्टिंग में भी गोवा के 97 मतदाताओं का उल्लेख सामने आया है। The Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, EROs द्वारा मंजूरी दिए जाने के बाद भी अंतिम मतदाता सूची में इन नामों को शामिल नहीं किया जा सका। गोवा CEO कार्यालय ने 11 से 17 फरवरी के बीच इस तकनीकी समस्या को दूर करने के लिए लगातार संपर्क किया था।
यहीं से जयराम रमेश ने बहस को एक बड़े सवाल की ओर मोड़ दिया है क्या मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया में तकनीकी सिस्टम की भूमिका इतनी बढ़ गई है कि जमीन पर निर्णय लेने वाले वैधानिक अधिकारी भी उसके सामने सीमित हो जाएं?
रमेश का अगला आरोप ECINet के केंद्रीकरण को लेकर है। उनका कहना है कि EROs की सॉफ्टवेयर तक पहुंच सीमित किए जाने से मतदाता सूची पर उनके वैधानिक अधिकार प्रभावित हो रहे हैं। यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि Electoral Registration Officer मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़ा वैधानिक अधिकारी होता है।
जयराम रमेश ने अपने पोस्ट में दावा किया कि SIR की तीसरी प्रक्रिया में ECINet सॉफ्टवेयर की भूमिका बेहद व्यापक हो गई है और उनके अनुसार दिल्ली में 54 प्रतिशत तथा देशभर में करीब 12 करोड़ मतदाता प्रभावित हुए हैं। इन आंकड़ों और दावों की राजनीतिक व्याख्या पर विवाद है। चुनाव आयोग की ओर से SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाना और अपात्र, डुप्लीकेट या स्थानांतरित मतदाताओं की पहचान करना बताया गया है।
कांग्रेस इससे अलग रुख अपनाते हुए आरोप लगा रही है कि प्रक्रिया में वैध मतदाताओं के नाम हटने का खतरा पैदा हुआ है। इससे पहले भी पार्टी ने SIR को लेकर बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने और अतिरिक्त दस्तावेज मांगने का मुद्दा उठाया था।
रमेश ने नए मतदाताओं के लिए Form 6 के जरिए नाम जोड़ने की प्रक्रिया को कथित तौर पर कठिन बनाए जाने का आरोप लगाते हुए कहा कि इसका असर युवा मतदाताओं पर पड़ सकता है। हालांकि, इस दावे पर अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले निर्वाचन आयोग की ओर से प्रक्रिया और उसके तकनीकी बदलावों की आधिकारिक स्थिति देखना जरूरी होगा।
इस पूरे विवाद में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल किसी एक राज्य के मतदाता नहीं, बल्कि वोटर लिस्ट के फैसले में तकनीक और वैधानिक अधिकारी के अधिकार के बीच संतुलन का है। गोवा की 97 नामों वाली घटना ने इसी बहस को राष्ट्रीय स्तर पर फिर सामने ला दिया है।