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‘यह धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला’…जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने वंदे मातरम के नए निर्देशों की आलोचना की

केंद्र सरकार द्वारा वंदे मातरम के सभी छह अंतरे गाने के निर्देश पर जमीअत उलेमा ए हिंद ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला बताते हुए विरोध दर्ज कराया है। विवाद ने राजनीतिक बहस को भी तेज कर दिया है।

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Feb 12, 2026
जमीयत उलेमा-ए-हिंद (फोटो- एएनआई)

देश में वंदे मातरम को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। केंद्र सरकार द्वारा जारी नई गाइडलाइन के बाद इस मुद्दे ने राजनीतिक और सामाजिक रंग ले लिया है। जमीअत उलेमा ए हिंद ने केंद्र के निर्देश को धार्मिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला बताते हुए इसका कड़ा विरोध किया है। बात दें कि हाल ही में गृह मंत्रालय ने आदेश जारी करते हुए सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और कॉलेजों में राष्ट्रगान से पहले वंदे मातरम के सभी छह अंतरे गाए जाना अनिवार्य कर दिया था। इस निर्देश की आलोचना करते हुए जमीअत उलेमा ए हिंद ने इसे संविधान और धार्मिक अधिकारों के खिलाफ बताया है।

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संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन

जमीअत उलेमा ए हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि वंदे मातरम के कुछ अंश मातृभूमि को देवी के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जो एकेश्वरवाद में विश्वास रखने वाले लोगों की आस्था के विपरीत है। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को उसकी धार्मिक मान्यता के खिलाफ कुछ गाने के लिए बाध्य करना संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन है। मदनी ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार का यह कदम एकतरफा और दबावपूर्ण निर्णय है। उनके अनुसार, इससे देश में धार्मिक सौहार्द और लोकतांत्रिक मूल्यों को नुकसान पहुंच सकता है। उन्होंने कहा कि देशभक्ति को जबरन थोपना सही नहीं है।

1937 में गीत के कुछ अंश अलग किए गए

गृह मंत्रालय के आदेश में वंदे मातरम के सभी छह अंतरों को अनिवार्य रूप से गाने की बात कही गई है। इससे पहले 1937 में इस गीत के कुछ अंशों को आधिकारिक रूप से अपनाया गया था, जबकि अन्य अंशों को धार्मिक संवेदनशीलता के कारण अलग रखा गया था। इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों के बीच भी बयानबाजी तेज हो गई है। कुछ नेताओं ने इसे राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बताया, जबकि विपक्षी दलों और अल्पसंख्यक संगठनों ने इसे अनावश्यक विवाद करार दिया है।

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गाया गया यह गीत

वंदे मातरम की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत व्यापक रूप से गाया गया। हालांकि, इसके कुछ अंशों को लेकर पहले भी विवाद उठते रहे हैं। जमीअत का कहना है कि देशभक्ति और धार्मिक स्वतंत्रता दोनों का सम्मान होना चाहिए। मौलाना मदनी ने अपने बयान में कहा कि सच्ची देशभक्ति नारों से नहीं, बल्कि चरित्र और त्याग से दिखाई देती है। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे निर्णय मूल मुद्दों से ध्यान भटकाने का प्रयास हैं और इससे समाज में विभाजन की भावना बढ़ सकती है।

Updated on:
12 Feb 2026 04:33 pm
Published on:
12 Feb 2026 04:32 pm
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