
Delimitation Bill 2029: केंद्र सरकार साल 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण लागू करने की तैयारी में है। संभावना है कि मोदी सरकार इसे लेकर संसद का विशेष सत्र बुला सकती है और परिसीमन बिल को सदन के पटल पर दोबारा पेश कर सकती है। अप्रैल के विशेष सत्र में संसद में दो तिहाई बहुमत नहीं होने के कारण बिल पारित नहीं हो सका था। इस विधेयक के पास होते ही लोकसभा में सीटों की संख्या 543 से बढ़कर 816 हो जाएगी। परिसीमन में बदलाव और सीटों की संख्या में इजाफे का दक्षिण भारत की पार्टियां विरोध करती आई हैं। उनका मानना है कि जनसंख्या के आधार पर परिसीमन में बदलाव और सीटों के संख्या में इजाफा से उनके क्षेत्रों में उत्तर भारत के राज्यों के मुकाबले कम होगी। इससे केंद्रीय राजनीति में दक्षिण भारत का प्रभाव घट जाएगा। इसके कारण केंद्र में बनने वाली कोई भी सरकार उन पर ध्यान नहीं देंगी। इस मामले पर ICSSR के पूर्व डायरेक्टर जेके बजाज ने इंडियन एक्सप्रेस को इंटरव्यू दिया है। उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति एक वोट से कहीं ज्यादा संघीय संतुलन जरूरी है।
इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR) के पूर्व अध्यक्ष जे.के. बजाज, जोकि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के उप-वर्गीकरण के लिए गठित जस्टिस जी. रोहिणी आयोग के सदस्य भी रहे हैं कहते हैं कि परिसीमन को अगले 25 सालों के लिए स्थगित कर देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि अगले तीन चार दशकों में सभी राज्यों की जनसंख्या स्थिर नहीं हो जाती तब तक संघीय सिद्धांत को एक व्यक्ति एक वोट एक मूल्य के सिद्दांत से अधिक महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि तीन-चार दशकों के बाद सभी राज्यों की जनसंख्या स्थिर होने की उम्मीद है। तब संसद में विभिन्न राज्यों के सापेक्ष हिस्से को फिर से निर्धारित करना उचित होगा। वे हिस्से आज के मुकाबले कुछ अलग होंगे, लेकिन स्थिर जनसंख्या पर आधारित परिसीमन का तर्क उस समय करने से कहीं अधिक मजबूत है जब विभिन्न राज्य जनसांख्यिकीय संक्रमण के अलग-अलग चरणों में हों।
जेके बजाज ने आगे कहा कि विभिन्न राज्यों में जनसांख्यिकीय संक्रमण के अलग-अलग पैटर्न सीधे उनके आर्थिक और सामाजिक प्रदर्शन से जुड़े हैं। राज्यों के हिस्से को अपरिवर्तित रखना विभिन्न सामाजिक-आर्थिक प्रदर्शन को मान्यता देने का एक स्पष्ट और सरल तरीका है, जिससे जनसंख्या वृद्धि दर भी अलग-अलग होती है।
उन्होंने कहा कि पंजाब आज हरियाणा की तुलना में कहीं कम समृद्ध है, लेकिन 2011 की जनगणना के आंकड़ों पर आधारित परिसीमन हरियाणा की सीटें बढ़ाएगा और पंजाब की घटाएगा। विभिन्न राज्यों के हिस्से को स्थिर रखने का निर्णय पुरस्कार या दंड देने का नहीं है। यह संघीय समझौते को अपरिवर्तित रखने का मामला है, जब तक कि सभी राज्य अपना-अपना जनसांख्यिकीय संक्रमण पूरा न कर लें।
उन्होंने कहा कि यदि नया परिसीमन होता है तो दक्षिणी राज्यों और कई अन्य राज्यों को इतना बड़ा नुकसान होगा कि वह सदन में अपनी आवाज खो देंगे। इस डर को कुछ भी शांत नहीं कर सकता है। उन्होंने कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का आश्वासन कि बड़े लोकसभा में किसी भी राज्य की सीटें उसकी वर्तमान सीटों से कम नहीं होंगी, ज्यादा मायने नहीं रखता, क्योंकि महत्वपूर्ण है विभिन्न राज्यों का सापेक्ष हिस्सा, न कि सीटों की पूर्ण संख्या।
संसद ने अपनी बुद्धिमत्ता और विवेक से 1976 में और फिर 2001 में ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के सिद्धांत को दरकिनार कर दिया। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि उस समय के संसदीय नेता इस बात पर सहमत थे कि संघीय संतुलन बनाए रखना इस सिद्धांत से अधिक महत्वपूर्ण है। उन्होंने इस संवैधानिक आवश्यकता को ओवरराइड करने के लिए संविधान में संशोधन किया। ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ सिद्धांत राज्य के अंदर लागू रह सकता है। किसी राज्य के अंदर वर्तमान में आवंटित सीटों का परिसीमन ऐतिहासिक जनसंख्या के बजाय उनकी वर्तमान जनसंख्या के अनुसार किया जा सकता है। इससे संघीय सिद्धांत और ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ दोनों सिद्धांत सुरक्षित रहते हैं।