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लोकतंत्र में सवाल करना अधिकार है- छात्रों के विरोध के बीच बोले सुप्रीम कोर्ट जस्टिस उज्जल भुइयां

Justice Ujjal Bhuyan: जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा कि लोकतंत्र में सवाल पूछना अवज्ञा नहीं है। छात्रों को अलग राय रखने पर धमकाना या सजा देना संविधान के खिलाफ है।
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Aug 30, 2026
Supreme Court Justice Ujjal Bhuyan
जस्टिस उज्जल भुइयां का बड़ा बयान (इमेज सोर्स: एक्स अकाउंट Bar and Bench)

Supreme Court Justice Ujjal Bhuyan: लोकतंत्र में सवाल करना कोई गुनाह नहीं है और अपनी अलग राय रखना अवज्ञा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने छात्रों के अधिकारों को लेकर बेहद अहम बात कही है। दिल्ली में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के एक कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने कहा कि अगर कोई छात्र किसी मुद्दे पर अलग नजरिया रखता है या सवाल करता है, तो उसे डराया या सजा की धमकी नहीं दी जा सकती।

चीफ गेस्ट के चयन को लेकर छात्रों का विरोध

जस्टिस भुइयां का यह बयान ऐसे समय आया है, जब बेंगलुरु की ‘नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी’ में चीफ गेस्ट के चयन को लेकर छात्रों के विरोध के बाद कॉन्वोकेशन रद्द किया गया। जस्टिस भुइयां ने साफ कहा कि सवाल करने का अधिकार लोकतंत्र, आजादी और संवैधानिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। उन्होंने यह भी कहा कि हमारा संविधान विचारों में एकरूपता नहीं, बल्कि अलग-अलग विचारों का सम्मान चाहता है।

छात्रों का क्या है कहना?

सोशल मीडिया पर चीफ गेस्ट के चयन को लेकर छात्रों ने प्रतिक्रिया दी है। एक्स पर एक ने लिखा- ‘ये लोग अपने काम से समय निकालकर इन फोरम पर कैसे जाते हैं? लाखों केस पेंडिंग हैं, फिर भी कोई जिम्मेदारी नहीं।’

दूसरे ने लिखा- ‘मुझे सुप्रीम कोर्ट कैंपस में कॉलेजियम सिस्टम, ज्यूडिशियरी में भाई-भतीजावाद और लाखों पेंडिंग केस के खिलाफ प्रदर्शन करने की परमिशन दीजिए।’

एक और ने लिखा- मेरा मानना ​​है कि जस्टिस उज्जल भुइयां और बीवी नागरत्ना अकेले ऐसे ज्यूरिस्ट हैं जो बिना तोड़ मरोड़ के अपने फैसले साफ-साफ सुनाते हैं।

जस्टिस उज्जल भुइयां छात्रों के हित में की थी बात

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां पहले भी छात्रों के अधिकारों और शांतिपूर्ण प्रदर्शन को लेकर अपनी बात रख चुके हैं। करीब एक महीने पहले CJP प्रोटेस्ट के दौरान उन्होंने कहा था कि छात्रों को अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने पर जेल भेजा जा रहा है।

उन्होंने कहा कि कई मामलों में छात्रों को 30 से 40 दिन तक जमानत नहीं मिलती। जस्टिस भुइयां ने सवाल उठाया कि क्या लोकतंत्र में असहमति जताना अब अपराध माना जाने लगा है?

उन्होंने कहा कि बहस और असहमति लोकतंत्र की आत्मा हैं। शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का मौलिक अधिकार है। इसके बावजूद कई बार प्रदर्शनकारियों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया जाता है। पर्यावरण जैसे अहम मुद्दों पर आवाज उठाने वालों को भी गिरफ्तार किया जाता है। छात्रों को निलंबित कर दिया जाता है। इसके बाद उन्हें राहत के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ता है।

बिरयानी खाना अपराध नहीं- गिरफ्तारी पर उठाया सवाल

एक और सार्वजनिक कार्यक्रम में जस्टिस भुइयां ने एक मामले का जिक्र किया था। उन्होंने बताया कि गंगा में नाव पर इफ्तार के दौरान चिकन बिरयानी खाने वाले कुछ युवाओं को गिरफ्तार किया गया। उन्होंने सवाल किया कि जब चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं है, तो इसके आधार पर किसी को गिरफ्तार कैसे किया जा सकता है? उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि ऐसे लोगों को तीन महीने तक जमानत से वंचित रखना कितना उचित है।

जस्टिस भुइयां ने कहा कि नागरिक इन घटनाओं को देख रहे हैं। उनके मुताबिक, लोकतंत्र में कानून के साथ-साथ असहमति और नागरिक अधिकारों का सम्मान भी जरूरी है।

Updated on:
30 Aug 2026 02:32 pm
Published on:
30 Aug 2026 02:32 pm
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