कर्नाटक की सांस्कृतिक विरासत को ध्यान में रखते हुए डॉ. गुब्बी ने इसे सैंडलवुड (चंदन) लेपर्ड नाम देने का सुझाव दिया है।
कर्नाटक में पहली बार तेंदुए का एक अत्यंत दुर्लभ रंग-रूप (कलर मॉर्फ) दर्ज किया गया है। यह खोज प्रसिद्ध वन्यजीव वैज्ञानिक डॉ. संजय गुब्बी और उनकी टीम ने होलेमत्ती नेचर फाउंडेशन (एचएनएफ) के माध्यम से विजयनगर जिले में की है। देश में इससे पहले केवल एक ऐसा तेंदुआ नवंबर 2021 में राजस्थान के रणकपुर क्षेत्र में दर्ज किया गया था। वैश्विक स्तर पर ऐसे तेंदुए दक्षिण अफ्रीका में कुछ और तंजानिया में एक बार देखे गए हैं।
आम तौर पर तेंदुओं का रंग पीला-भूरा होता है, जिस पर काले रोसेट्स (धब्बे) होते हैं। लेकिन यह दुर्लभ मादा तेंदुआ (6-7 वर्ष) हल्के गुलाबी-लाल रंग का है, जो चंदन की लकड़ी के रंग जैसा दिखता है। इसके रोसेट्स हल्के भूरे रंग के हैं।
एचएनएफ की टीम ने कैमरा ट्रैपिंग के जरिए इस तेंदुए का दस्तावेजीकरण किया।अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस तरह के तेंदुओं को स्ट्रॉबेरी लेपर्ड कहा जाता है, लेकिन कर्नाटक की सांस्कृतिक विरासत को ध्यान में रखते हुए डॉ. गुब्बी ने इसे सैंडलवुड (चंदन) लेपर्ड नाम देने का सुझाव दिया है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, इसका असामान्य रंग संभवत: किसी आनुवंशिक कारण से है, जिसमें या तो लाल वर्णक (रेड पिगमेंट) की अधिकता होती है या गहरे वर्णक (डार्क पिगमेंट) की कमी।
डॉ. गुब्बी ने बताया कि सटीक आनुवंशिक कारण जानने के लिए डीएनए आधारित आणविक विश्लेषण आवश्यक है। फिलहाल फोटो और दृश्य लक्षणों के आधार पर इसे वैज्ञानिक रूप से दुर्लभ रंग-रूप (रेयर कलर मॉर्फ) कहना ही उचित होगा।
शोध के मुताबिक कर्नाटक में लगभग 2,500 तेंदुए हैं, जिससे यह राज्य तेंदुओं के संरक्षण के लिहाज से देश के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में शामिल है।