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मद्रास हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: पति की पहली शादी से अनजान महिला पर नहीं चलेगा बिगैमी का केस

Madras High Court: मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी महिला को पुरुष की पहली शादी की जानकारी नहीं है और वह उससे दूसरी शादी करती है, तो उसे मात्र इस आधार पर BNS की धारा 82 के तहत बिगैमी का आरोपी नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने महिला को अग्रिम जमानत देते हुए कहा कि पहली शादी की जानकारी थी या नहीं, यह जांच या ट्रायल में तय होगा।
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Updated: 15 Sep 2026, 5:55 PM IST
Madras High Court
मद्रास हाई कोर्ट (File Photo)

Rajyalakshmi vs State Madras High Court: यदि कोई महिला किसी ऐसे पुरुष से शादी करती है, जिसकी पहली शादी भी कायम है, लेकिन महिला को इस बारे में पता नहीं है। तो उसे भारतीय न्याय संहिता की धारा 82 के तहत बिगैमी यानी द्विविवाह के अपराध में आरोपी नहीं बनाया जा सकता है। यह टिप्पणी मद्रास हाईकोर्ट ने राजलक्ष्मी बनाम राज्य मामले में की है।

राजलक्ष्मी की ओर से अधिवक्ता एस. पार्थिबराजन पेश हुए, जबकि राज्य की ओर से सरकारी अधिवक्ता आर. राजशेखरन ने पक्ष रखा।

जस्टिस एन. रमेश ने मामले में दूसरी आरोपी बनाई गई राजलक्ष्मी को अग्रिम जमानत दी। सुनवाई के दौरान उन्होंने कहा कि धारा 82 के मुताबिक, अपराध का आरोपी वह व्यक्ति है, जिसकी पहले से शादीशुदा पत्नी जीवित है। ऐसी स्थिति में खुद अविवाहित महिला, यदि पहली शादी के बारे में जानकारी के बिना उस पुरुष से विवाह करती है, तो वह अपने आप इस अपराध की दोषी नहीं हो जाती।

पहली शादी छिपाने का आरोप

दरअसल, यह मामला उस पुरुष की पहली पत्नी की शिकायत पर दर्ज किया गया था। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि उसके पति मयाकृष्णन ने पहली शादी के कायम रहते राजलक्ष्मी से दूसरी शादी कर ली।

वहीं, राजलक्ष्मी का कहना था कि मयाकृष्णन ने उससे अपनी पहली शादी की बात छिपाई थी। उसका दावा था कि वह खुद भी उसके धोखे का शिकार हुई है और पति-पत्नी के बीच चल रहे विवाद में उसे अनावश्यक रूप से आरोपी बनाया गया।

अभियोजन पक्ष ठोस दस्तावेज नहीं कर सका पेश

हाईकोर्ट ने कहा कि राजलक्ष्मी को मयाकृष्णन की पहली शादी के बारे में वास्तव में जानकारी थी या नहीं, यह जांच और जरूरत पड़ने पर ट्रायल के दौरान तय किया जा सकता है। हालांकि, अग्रिम जमानत पर सुनवाई के समय अभियोजन पक्ष ऐसा कोई ठोस दस्तावेज पेश नहीं कर सका, जिससे यह प्रथमदृष्टया साबित हो कि राजलक्ष्मी को मयाकृष्णन की पहली शादी के कायम होने की जानकारी थी।

धारा 85 भी प्रथमदृष्टया लागू नहीं

मामले में सुनवाई करते हुए कोर्ट ने पुलिस की ओर से लगाई गई बीएनएस की धारा 85 पर भी सवाल उठाया। दरअसल, यह धारा पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा महिला के साथ क्रूरता से संबंधित है।

कोर्ट ने प्रथमदृष्टया माना कि यदि राजलक्ष्मी को ही मयाकृष्णन ने उसकी पहली शादी के बारे में धोखा दिया था, तो केवल उसके साथ विवाह करने के कारण उसे पहली पत्नी का पति का रिश्तेदार नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के मामले के अनुसार, दोनों महिलाएं एक ही व्यक्ति द्वारा धोखा दी गई और पीड़ित महिलाएं हैं, न कि एक आरोपी और दूसरी उसकी पीड़िता।

कलकत्ता हाईकोर्ट के मार्च 2026 के फैसले का भी जिक्र

मद्रास हाईकोर्ट ने मार्च 2026 में कलकत्ता हाईकोर्ट के एक फैसले का भी जिक्र किया। उस फैसले में कहा गया था कि BNS की धारा 82(2) के तहत पहली शादी छिपाकर दोबारा विवाह करने का अपराध गैर-संज्ञेय (non-cognisable) है। ऐसे मामले में सीधे पुलिस केस दर्ज कर कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती, बल्कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 219 के तहत शिकायत मामले के रूप में प्रक्रिया आगे बढ़नी चाहिए।

हालांकि, मद्रास हाईकोर्ट ने इस मामले में यह तय नहीं किया कि निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं होने के कारण मौजूदा आपराधिक मामला पूरी तरह कायम रह सकता है या नहीं।

कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे को उचित चरण पर विचार के लिए खुला छोड़ा जा रहा है। फिलहाल, यह तथ्य भी इस निष्कर्ष को मजबूत करता है कि राजलक्ष्मी से हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता अभियोजन पक्ष द्वारा नहीं दिखाई गई है।

अग्रिम जमानत मंजूर

हाईकोर्ट ने इन परिस्थितियों को देखते हुए राजलक्ष्मी को कुछ शर्तों के साथ अग्रिम जमानत दे दी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके द्वारा की गई टिप्पणियां केवल अग्रिम जमानत पर फैसला लेने के लिए प्रथमदृष्टया की गई हैं। इन टिप्पणियों को मामले के अंतिम गुण-दोष पर फैसला नहीं माना जाएगा।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आदेश में कही गई कोई भी बात मयाकृष्णन या अन्य सह-आरोपियों के पक्ष में लाभ नहीं देगी और उनके खिलाफ जांच स्वतंत्र रूप से जारी रहेगी।

Updated on:
15 Sep 2026, 5:55 PM IST
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