
Mahua Moitra SIR Post: पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची को लेकर चल रही Special Intensive Revision यानी SIR की बहस अब सिर्फ वोटर के नाम जुड़ने या कटने तक सीमित नहीं रह गई है। टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा के X पोस्ट ने 24 दिसंबर 2025 की उस चिट्ठी को फिर चर्चा में ला दिया है, जिसमें WBCS (Executive) Officers’ Association ने चुनावी प्रक्रिया में ERO की वैधानिक भूमिका को लेकर गंभीर चिंता जताई थी। सवाल अब यह है कि सिस्टम से नाम हटाने की प्रक्रिया में अंतिम जिम्मेदारी किसकी थी?
महुआ मोइत्रा के X पोस्ट में जिस दस्तावेज को सामने रखा गया है, वह पश्चिम बंगाल सिविल सर्विस (Executive) Officers’ Association की ओर से राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को भेजा गया पत्र है। पत्र की तारीख 24 दिसंबर 2025 है। इसमें अधिकारियों के संगठन ने SIR के दौरान मतदाता सूची में हो रहे कथित “System-Driven Deletion” को लेकर अपनी चिंता दर्ज की थी।
समाचार एजेंसी PTI की 27 दिसंबर 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, एसोसिएशन ने कहा था कि ड्राफ्ट मतदाता सूची प्रकाशित होने के समय बड़ी संख्या में ऐसे मतदाताओं के नाम हटे, जिनके Enumeration Forms मृत्यु, पलायन, अनुपस्थिति या डुप्लीकेशन जैसे कारणों से वापस नहीं आए थे।
महुआ मोइत्रा के पोस्ट का नया कोण यही है कि इस पत्र को केवल मतदाता नाम हटाने की शिकायत के रूप में नहीं, बल्कि ERO की संवैधानिक-सांविधिक जिम्मेदारी और केंद्रीकृत तकनीकी व्यवस्था के बीच पैदा हुए तनाव के दस्तावेज के तौर पर देखा जाए।
पत्र में दावा किया गया कि नाम हटाने की प्रक्रिया में ERO की जानकारी या सक्रिय भूमिका के बिना कार्रवाई होने की आशंका थी। अधिकारियों ने कहा कि बाद में प्रभावित मतदाता स्वाभाविक रूप से ERO को ही जिम्मेदार ठहरा सकते हैं, जबकि उनके अनुसार अधिकारी पूरी प्रक्रिया में शामिल नहीं थे।
यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि Representation of the People Act, 1950 की धारा 22 में मतदाता सूची की प्रविष्टि हटाने से पहले उचित सत्यापन और कुछ परिस्थितियों में संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर देने का प्रावधान है। कानून में ERO को प्रविष्टि में सुधार, स्थानांतरण या विलोपन की प्रक्रिया से जोड़ा गया है।
विवाद का दूसरा सिरा SIR के दौरान इस्तेमाल हुए केंद्रीकृत सॉफ्टवेयर तक पहुंचता है। द इंडियन एक्सप्रेस ने दिसंबर 2025 में रिपोर्ट किया था कि पश्चिम बंगाल के अधिकारियों ने आशंका जताई कि ERO की जानकारी के बिना भी सिस्टम के जरिए नामों से संबंधित कार्रवाई हो सकती है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि 16 दिसंबर को प्रकाशित ड्राफ्ट रोल में 58 लाख से अधिक नाम विभिन्न कारणों से हटाए गए थे।
हालांकि, इन घटनाक्रमों से यह निष्कर्ष निकालना अलग बात है कि किसी अधिकारी ने जानबूझकर गैरकानूनी तरीके से मतदाता सूची में बदलाव किया। उपलब्ध रिपोर्टों में लगाए गए आरोप और अधिकारियों की चिंताएं दर्ज हैं, लेकिन किसी व्यक्तिगत अधिकारी द्वारा अवैध हेरफेर किए जाने का स्वतंत्र निष्कर्ष इन दस्तावेजों से अपने आप स्थापित नहीं होता।
यही वजह है कि महुआ मोइत्रा की पोस्ट ने पुराने पत्र को फिर राजनीतिक और चुनावी बहस के केंद्र में ला दिया है सवाल सिर्फ कितने नाम हटे, यह नहीं; सवाल यह भी है कि नाम हटाने की प्रक्रिया में जिम्मेदारी, अधिकार और जवाबदेही की रेखा कहां तय थी।