
Special Story on ManMohan Singh: मनमोहन सिंहकाबलियत को तवज्जो देते थे। अगर सामने वाले में काबलियत है, तो फिर उनके लिए मनमुटाव-मतभेद मायने नहीं रखते थे। अपने कार्यकाल के दौरान डॉ. मनमोहन सिंह एक पत्रकार से काफी नाराज हो गए। नाराजगी वाली वजह भी थी, डॉ. सिंह के बताए संशोधन के बिना उनका आर्टिकल प्रकाशित कर दिया गया। मनमोहन सिंह ने बाकायदा फोन कर नाराजगी जताई और पत्रकार को सफाई का मौका दिए बिना ही फोन काट दिया। हालांकि, बाद में इसी पत्रकार को उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में बड़ी जिम्मेदारी सौंपी। उस पत्रकार का नाम है संजय बारू, जो मनमोहन सिंह के जीवन पर लिखी गई किताब - ‘द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर: द मैकिंग एंड अनमैकिंग ऑफ मनमोहन सिंह’ के लेखक भी हैं।
किताब में बारू ने उस घटना के बारे में विस्तार से बताया है। उन्होंने लिखा है– मार्च 1991 में ‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ अपनी 30वीं सालगिरह मनाने वाला था। बतौर एसोसिएट एडिटर मुझे इस मौके के लिए एक स्पेशल सप्लीमेंट तैयार करने की ज़िम्मेदारी दी गई थी। हमने तय किया कि इसमें उन अर्थशास्त्रियों के इंटरव्यू शामिल होंगे जिन्होंने पिछले 30 सालों में पॉलिसी बनाने में अहम भूमिका निभाई। हमने दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के दिग्गज के.एन. राज को चुना, जिनसे जवाहरलाल नेहरू औरइंदिरा गांधी दोनों सलाह लेते थे, पी.आर. ब्रह्मानंद, जिन्होंने 'बॉम्बे स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स' नाम का एक अलग ग्रुप बनाया था और मनमोहन सिंह। इसी सिलसिले में मनमोहन सिंह से मेरी पहली मुलाकात फरवरी 1991 विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के ऑफिस में हुई, डॉ. सिंह उस समय यूजीसी के अध्यक्ष थे। जब मैं बहादुर शाह जफ़र मार्ग से होते हुए UGC ऑफिस पहुंचा, तो मुझे उम्मीद थी कि मेरी मुलाकात किसी घमंडी अफसर से होगी, जो दिल्ली ‘दरबार' का कोई VIP होगा। लेकिन मनमोहन सिंह से मिलते ही एक बात मेरे दिल को छू गई, वो थी उनका सौम्य और विनम्र व्यवहार।
उन्होंने गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया, अपनी कुर्सी से उठे और सोफे पर बैठने का सुझाव दिया, साथ ही मुझे चाय भी ऑफर की। मैंने अपना टेप रिकॉर्डर चालू किया और सवाल पूछने शुरू किए। इंटरव्यू शुरू होने के कुछ ही मिनटों बाद, टेप रिकॉर्डर ने काम करना बंद कर दिया। मैं थोड़ा घबरा गया, उसे हिलाया-डुलाया, बैटरियां निकालकर दोबारा लगाईं, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। डॉ. सिंह ने धैर्य बनाए रखा, लेकिन धीरे से मुझे याद दिलाया कि उन्हें एक मीटिंग में जाना है और अगले कुछ दिनों तक वे यात्रा पर रहेंगे। उन्होंने सुझाव दिया कि हम इंटरव्यू पूरा करने की कोशिश करें। जब मैं उनके जवाबों को हाथ से लिखने के बारे में सोच रहा था, तभी मुझे ET के स्टेनोटाइपिस्ट मिस्टर आनंद का ख्याल आया। मैंने उन्हें बुलाया और वे तुरंत आ गए। उन्होंने डॉ. सिंह के जवाब शॉर्टहैंड में लिख लिए। इंटरव्यू के आखिर में, डॉ. सिंह ने कहा कि प्रिंट में जाने से पहले मैं उन्हें टाइप किया हुआ ड्राफ्ट दिखा दूं। चूंकि मनमोहन सिंह यात्रा पर थे, इसलिए मैं उन्हें ड्राफ्ट एक हफ्ते बाद ही दिखा पाया। उन्होंने बॉलपेन से कई बदलाव करके उसे तुरंत लौटा दिया; उनकी लिखावट साफ-सुथरी, पढ़ने में आसान और सलीके वाली थी। मैंने मिस्टर आनंद से डॉ. सिंह के बताए बदलावों को शामिल करने और फाइल को मेरे उस सहयोगी को भेजने के लिए कहा, जो स्पेशल पेजों के प्रोडक्शन का काम देख रहा था, मैं दूसरे काम के सिलसिले में दिल्ली से बाहर चला गया।
5 मार्च की सुबह ET का स्पेशल एडिशन मेरे दरवाजे पर पहुंचा, लेकिन इससे पहले कि मैं उसे खोल पाता, फोन की घंटी बजी। लाइन पर मनमोहन सिंह थे। उनकी आवाज शांत थी, लेकिन नाराज़गी साफ झलक रही थी। उन्होंने कहा– ‘आपने वे सभी करेक्शन नहीं किए जो मैंने करने को कहा था। मैंने एक पूरा पैराग्राफ जोड़ा था जो मुझे प्रकाशित कॉपी में नहीं मिला। मैं एक ज़रूरी बात कह रहा था। यह बहुत गैर-ज़िम्मेदाराना है। मुझे उम्मीद नहीं थी कि आप इतने लापरवाह होंगे’। इतना कहते ही उन्होंने फोन काट दिया। जबकि मैं कहता रहा, माफ कीजिए सर, मैंने अभी तक अखबार नहीं देखा है। मिस्टर आनंद ने तो अपना काम ठीक से किया था, लेकिन पेज बनाने वाले व्यक्ति ने गलती से पुरानी कॉपी लगा दी। अब मैं यह जानने के लिए उत्सुक था कि उस अतिरिक्त पैराग्राफ में क्या था, जिसे डॉ. सिंह ने ड्राफ़्ट पर लिखा था और जिसके न छपने से वे इतने नाराज़ हो गए। पता चला कि वह दक्षिण कोरिया की उनकी हालिया यात्रा और भारत को दक्षिण कोरिया के विकास मॉडल से जो ज़रूरी सबक सीखने चाहिए, उनके बारे में था। उन्होंने बताया था कि दक्षिण कोरिया ने शिक्षा में निवेश किया था और उसकी अर्थव्यवस्था खुली थी, और भारत को भी ऐसा ही करना चाहिए। कई सालों बाद ही मुझे पूरी तरह समझ आया कि डॉ. सिंह इस चूक से इतने नाराज़ क्यों थे। वे अपने विचारों की अहमियत बता रहे थे, वे विचार जो उन्होंने दशकों पहले अपनी डॉक्टरेट थीसिस में व्यक्त किए थे - भारत के विकास में विदेशी व्यापार और विश्व अर्थव्यवस्था के प्रति ज्यादा खुलापन रखने के महत्व के बारे में।
संजय बारू ने आगे लिखा है- जून 1991 में जब डॉ. सिंह भारत के वित्त मंत्री (FM) बने, उससे पहले तक उनसे मेरी कोई बातचीत नहीं हुई थी। जिस दिन डॉ. सिंह ने पद संभाला, मैंने उनके घर फोन किया और उन्हें बधाई देते हुए एक मैसेज छोड़ा। उस रात, जब मैंने डिनर खत्म ही किया था, फोन की घंटी बजी। नए वित्त मंत्री ने कहा, 'संजय, मैं मनमोहन बोल रहा हूं। मुझे आपकी शुभकामनाएं मिलीं। धन्यवाद। जल्द ही मिलते हैं।' मुझे राहत मिली कि या तो वे ET के स्पेशल-एडिशन वाली गड़बड़ी को भूल गए थे या फिर उस गलती के लिए मुझे माफ करने को तैयार थे। इसके बाद उनके साथ मेरे अच्छे संबंध रहे।
मनमोहन सिंह ने जब प्रधानमंत्री का पद संभाला, तो उन्होंने संजय बारू को PMO में एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपी। ये स्पष्ट संकेत था कि डॉ. सिंह संजय की पुरानी गलती को पूरी तरह भुला चुके हैं। 30 मई, 2004 को संजय बारू प्रधानमंत्री से मिलने उनके आधिकारिक निवास 7 रेसकोर्स यानी 7 RCR पहुंचे। ‘द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर...’ में संजय ने लिखा है– डॉ. सिंह ने मुस्कुराकर मेरा स्वागत किया। मैं उनके पास गया और उनकी बाईं ओर रखी कुर्सी पर बैठ गया। उन्होंने स्वीकार किया कि वह इस नई भूमिका (प्रधानमंत्री) के लिए तैयार नहीं थे। यह एक नया अनुभव है और यह आसान नहीं होगा। उन्होंने कहा कि हमारी सरकार अल्पमत में है। वामपंथी दलों ने केवल बाहर से समर्थन देने पर सहमति जताई है। कांग्रेस पार्टी ने कभी गठबंधन सरकार नहीं चलाई है। मुझे इसे सफल बनाना होगा। मुझे एक प्रेस सेक्रेटरी की ज़रूरत है। मैं आपको जानता हूं, इसलिए अगर आप यहां काम करने के लिए सहमत हों तो मुझे खुशी होगी। मुझे पता है कि इससे आपको आर्थिक नुकसान होगा, लेकिन आपको इसे देश की सेवा करने के अवसर के रूप में देखना होगा। मैंने तुरंत उनका निमंत्रण स्वीकार कर लिया। लेकिन अपने मन की बात भी बताई। मैंने बताया कि पिछले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के PMO में दो लोगों ने मीडिया का काम संभाला था, और दोनों को 'ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी' (OSD) कहा जाता था। इसी तरह, जब दूसरे संपादकों ने अतीत में यही काम संभाला था, तो उन्हें PM का सूचना सलाहकार कहा गया। मैंने कहा कि मैं प्रेस सेक्रेटरी के बजाए 'मीडिया सलाहकार' कहलाना पसंद करूंगा, और समझाया कि न्यूज़ टेलीविज़न के आने के बाद 'मीडिया' शब्द ने 'प्रेस' की जगह ले ली है, और 'सूचना' शब्द पुराना लगता है। वे सहमत हो गए।
अंत में मैंने उनसे पूछा कि वे मुझसे क्या उम्मीद करते हैं। उन्होंने एक पल सोचा, फिर कहा – ‘यहां बैठकर, मुझे पता है कि मैं बाहरी दुनिया से कट जाऊंगा। मैं चाहता हूं कि आप मेरी आंखे और कान बनें। मुझे बिना किसी डर या पक्षपात के वह सब बताएं जो मुझे जानना चाहिए।' संजय आगे लिखते हैं कि वे शब्द मेरे मन में बस गए और उन चार वर्षों में जब भी मुझे कोई अप्रिय सच या शर्मनाक बात बताने में हिचकिचाहट हुई, तो मुझे वे शब्द याद आए और हिम्मत मिली। PMO छोड़ने के बाद भी, मुझे मिले उस अधिकार का इस्तेमाल करके मैंने उन्हें निष्पक्ष रूप से वह सब बताया जो मुझे लगा कि उन्हें जानना चाहिए।
तो इस तरह मनमोहन सिंह ने संजय बारू की उस गलती को माफ करते हुए उन्हें PMO में बड़ी जिम्मेदारी सौंपकर यह दर्शाया कि उनके लिए केवल काबलियत मायने रखती है।