
Manmohan Singh Quits UNCTAD Job: ‘तुम बेवकूफी कर रहे हो, लेकिन कभी-कभी ज़िंदगी में नासमझ बनना ही समझदारी होती है।‘ ये वो शब्द थे जो डॉ. मनमोहन सिंह को तब सुनने को मिले, जब उन्होंने यूनाइटेड नेशंस कॉन्फ्रेंस ऑन ट्रेड एंड डेवलपमेंट (UNCTAD) की नौकरी छोड़कर भारत वापस लौटने का फैसला लिया। डॉ. सिंह चलता-फिरता इनसाइक्लोपीडिया थे, उनका ज्ञान समुंदर जितना गहरा था। पंजाब यूनिवर्सिटी में इकोनॉमिक्स की पढ़ाई करने के बाद, मनमोहन सिंह ने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटीसे इकोनॉमिक्स में ऑनर्स किया और कुछ साल बाद ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटीसे डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की। उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी में इकोनॉमिक्स भी पढ़ाया। 1966 में मनमोहन सिंह UNCTAD का हिस्सा बने। यहां तक उनके मन में वापसी का कोई ख्याल नहीं था। सबकुछ बढ़िया चल रहा था, डॉ. सिंह अपने काम से खुश थे, UNCTAD उनके काम से। फिर एक दिन भारत से एक बुलावा आया और मनमोहन सिंह सबकुछ छोड़कर जाने को तैयार हो गए। कौन थे वो शख्स जिसके बुलावे पर डॉ. सिंह हंसते-हंसते विदेश की प्रतिष्ठित नौकरी छोड़कर जाने को राजी हो गए?
पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के जीवन पर आधारित संजय बारू द्वारा लिखित किताब ‘द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर: द मैकिंग एंड अनमैकिंग ऑफ मनमोहन सिंह’ (The Accidental Prime Minister: The Making and Unmaking of Manmohan Singh) में डॉ. सिंह की वतन वापसी से जुड़े किस्से का भी जिक्र है। अमृतसर में मनमोहन सिंह के पड़ोसी थे लेखक मुल्क राज आनंद। 1960 के दशक की शुरुआत में आनंद उन्हें दिल्ली लेकर आए और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मिलवाया।
नेहरू मनमोहन सिंह की प्रतिभा से वाकिफ थे और उन्होंने तपाक से इस होनहार युवा अर्थशास्त्री को अपनी सरकार में शामिल होने का न्योता दे डाला। हालांकि डॉ. सिंह ने विनम्रतापूर्वक इनकार कर दिया। ऐसा नहीं था कि वे सरकार का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे, लेकिन उनके लिए इस अवसर से ज्यादा कीमत अपनी जुबां की थी। दरअसल, मनमोहन सिंह ने अपने कॉलेज के साथ एक कॉन्ट्रैक्ट किया था ईकनामिक्स पढ़ाने का, क्योंकि कॉलेज ने उनकी विदेश में पढ़ाई का खर्च उठाया था। इसलिए वह कॉन्ट्रैक्ट तोड़कर सरकार का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे।
डॉ. सिंह ने भारत के एक्सपोर्ट ट्रेंड और संभावनाओं पर अपनी डॉक्टरेट थीसिस लिखी, जिसे खूब सराहा गया। 1966 में वह जिनेवा में यूनाइटेड नेशंस कॉन्फ्रेंस ऑन ट्रेड एंड डेवलपमेंट (UNCTAD) का हिस्सा बने। हालांकि, तीन साल बाद, भारत से आए एक बुलावे पर डॉ. सिंह घर लौट आए। दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर के.एन. राज ने उन्हें भारत आने और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से बतौर फैकल्टी जुड़ने का ऑफर दिया। के.एन. राज के नेतृत्व में दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स को ग्लोबल पहचान मिली थी।
इकोनॉमिक्स के दिग्गज के.एन. राज से जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी भी सलाह लेते थे। मनमोहन सिंह ने बिना ज्यादा सोचे-विचारे ऑफर एक्सेप्ट कर लिया। जब UNCTAD के प्रमुख राउल प्रेबिश को डॉ. सिंह के इस फैसले का पता चला, तो वह हैरान रह गए। उन्होंने मनमोहन सिंह को वापस न जाने की सलाह दी, लेकिन मनमोहन सिंह पहले ही वापसी का मन बना चुके थे। मनमोहन ने प्रेबिश को समझाया कि दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एक बेहद प्रतिष्ठित संस्थान है और वे प्रोफेसर राज के निमंत्रण को ठुकराना नहीं चाहते।
इस पर प्रेबिश ने मनमोहन से कहा - तुम बेवकूफी कर रहे हो, लेकिन कुछ देर रुककर बोले – लेकिन कभी-कभी ज़िंदगी में नासमझ बनना ही समझदारी होती है। प्रेबिश की यह बात मनमोहन सिंह के दिल को छू गई, भविष्य में कई मौकों पर उन्होंने इसका इस्तेमाल भी किया।
‘द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर….’ के लेखक संजय बारू ने लिखा है- राउल प्रेबिश के वो शब्द मैंने कई साल बाद डॉ. सिंह के उस साधारण से ऑफिस में सुने, जो नई दिल्ली के रेस कोर्स रोड पर प्रधानमंत्री के सरकारी आवास में था। यह एक छोटा सा कमरा था जिसमें बस एक मेज़ और दो कुर्सियां आ सकती थीं, लेकिन यहां से एक सुंदर लॉन दिखता था, जहां मोर घूमते रहते थे। अमेरिका के साथ सिविल न्यूक्लियर एनर्जी सहयोग समझौते को लेकर मनमोहन सिंह पर काफी दबाव था। उन्हें लगातार डील पर आगे न बढ़ने की सलाह मिल रही थी, करीबी सहयोगी भी यही चाहते थे कि मनमोहन डील सील न करें, लेकिन उन्होंने ऐसी सभी सलाहों को नजरंदाज कर दिया। उस समय डॉ. सिंह ने मुझसे मुस्कुराते हुए कहा था - अब फिर से बेवकूफ बनने का समय आ गया है।