IMD Alert: मौसम विभाग ने देश के कई हिस्सों में लू चलने का अलर्ट जारी किया है। महाराष्ट्र के अमरावती 40.8 डिग्री तापमान दर्ज किया गया।
IMD heatwave alert: देश के मौसम में मार्च के पहले सप्ताह में ही मई जैसे दिन आ गए हैं। हालांकि मार्च पिछले कुछ सालों में भी गर्म रह चुका है, लेकिन पहले सप्ताह में ही लू का असर शुरू होना असामान्य है और आशंका है कि आगामी दिनों गर्मी के तेवर भीषण हो सकते हैं। बीते दो दिन में राजस्थान समेत कई राज्यों का अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंच गया है। महाराष्ट्र के अमरावती 40.8 डिग्री व मुंबई में 38.9 डिग्री सेल्सियस तक तापमान दर्ज किया गया।
मौसम विभाग (आइएमडी) ने शनिवार को जारी बुलेटिन में देश के कई हिस्सों में उष्ण लहर (लू) चलने और गर्म एवं आर्द्र मौसम रहने की चेतावनी दी है। रविवार को हिमाचल प्रदेश और विदर्भ के छिटपुट इलाकों में सामान्य से भीषण लू चलने की संभावना है। इसी प्रकार से 10 और 11 मार्च को पश्चिम राजस्थान में लू का असर दिखाई देगा। दिल्ली-एनसीआर में 8 से 10 मार्च तक अधिकतम तापमान 34 से 36 डिग्री सेल्सियस रहने और पश्चिमी हिमालय में पश्चिमी विक्षोभ के प्रभाव के कारण 9 से 11 मार्च के दौरान हल्की बारिश/बर्फबारी होने की संभावना है। लेकिन मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ के तापमान में खास बदलाव नहीं होगा।
मौसम विभाग के अनुसार साल 2022 व 2025 में मार्च माह में गर्मी के तेवर तीखे हो गए थे। 2022 का मार्च पिछले 122 साल के रेकॉर्ड में अधिकतम तापमान 33.1 डिग्री सेल्सियस के साथ सबसे ज्यादा गर्म रहा था। 2023 व 2024 के मार्च में भी अर्ली हीटवेव (लू) शुरु हो गई थी। साल 2025 के मार्च के आखिर में तापमान 43 से 45 डिग्री तक पहुंच गया और लू का असर तेज हो गया था।
जलवायु परिवर्तन को लेकर दुनियाभर के वैज्ञानिकों के बीच चल रही बहस पर अब विराम लगता दिख रहा है। एक ताजा शोध में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि साल 2015 के बाद से ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार में जबरदस्त उछाल आया है। वर्तमान में धरती के गर्म होने की दर 1970 के दशक की तुलना में लगभग दोगुनी हो चुकी है। 'जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स' में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, तीन वर्षों में टूटे तापमान के रेकॉर्ड्स ने वैज्ञानिकों को सोचने पर मजबूर किया है कि क्या हम विनाश की तरफ और तेजी से बढ़ रहे हैं।
जर्मनी के पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च के वैज्ञानिक स्टीफन रहमस्टोर्फ और सांख्यिकीविद् ग्रांट फोस्टर ने नासा सहित दुनिया के पांच सबसे विश्वसनीय डेटा सेट्स का विश्लेषण करने के बाद पाया कि तापमान अब लगभग 0.35 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक की दर से बढ़ रहा है। इस अध्ययन में ज्वालामुखी विस्फोट और अल-नीनो जैसी प्राकृतिक घटनाओं के प्रभाव को हटाकर गणना की गई है, जिससे वार्मिंग की एक सटीक और डरावनी तस्वीर सामने आई है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, इस तेजी का एक मुख्य कारण हवा में मौजूद एरोसोल कणों की कमी भी है। अंतरराष्ट्रीय शिपिंग के लिए ईंधन से जुड़े नियमों में बदलाव के बाद हवा में इन सूक्ष्म कणों की मात्रा घट गई है। ये कण पहले सूरज की कुछ रोशनी को अंतरिक्ष में परावर्तित कर देते थे, जिससे धरती तक पहुंचने वाली गर्मी कुछ कम हो जाती थी। लेकिन अब इन कणों के कम होने से आसमान ज्यादा साफ हो गया है और सूरज की गर्मी सीधे धरती तक पहुंचने लगी है।
क्षेत्रीय ‘हॉटस्पॉट’ भी चुनौती