
Nana Patekar Political Connection: नाना पाटेकरबड़े पर्दे पर राजनीति और राजनेताओं पर तंज कसते नजर आते, लेकिन असल जिंदगी में वह दोनों के ही करीब थे। उन्हें राजनीति में दिलचस्पी थी और कई नेताओं से अच्छे संबंध। हालांकि, उन्होंने अपनी इस दिलचस्पी को कभी खुद पर हावी नहीं होने दिया। वह चाहते थे कि दुनिया अंतिम वक्त तक उन्हें एक कलाकार के रूप में ही देखे और यही हुआ। नाना पाटेकर को कई बार चुनाव लड़ने का ऑफर मिला, मगर उन्होंने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि हम कलाकार ही अच्छे। गौरतलब है कि नाना का गुरुवार सुबह को निधन हो गया। वे 75 वर्ष के थे।
अक्टूबर 2022 में नाना पाटेकर की राजनीति में दिलचस्पी खुलकर सामने आई। ये वो दौर था जब शिवसेना में फूट पड़ी थी और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बीजेपी-शिवसेना ने सरकार बनाई थी। एक कार्यक्रम में पाटेकर ने शिंदे और फडणवीस का इंटरव्यू लिया और महाराष्ट्र में मची राजनीतिक उथल-पुथल के बारे में उनसे कई चुभने वाले सवाल भी पूछे। नाना ने शिंदे से पूछा कि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ बगावत करने में उन्हें ढाई साल क्यों लग गए? उन्होंने यह भी पूछा कि चुनाव खत्म होने के बाद क्या वोटरों की कोई अहमियत रह जाती है? राजनेताओं को उनकी गलतियों के लिए आम नागरिकों की तरह जवाबदेह क्यों नहीं ठहराया जाता?
नाना पाटेकर ने कुछ चुने हुए जन-प्रतिनिधियों की संपत्ति पर भी सवाल उठाए और इसकी तुलना महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्रीवाई.बी. चव्हाण से की। उन्होंने कहा कि जब वाई.बी. चव्हाण की मौत हुई, तो उनके बैंक खाते में केवल 25,000 रुपये थे। आज, एक कॉर्पोरेटर भी सालभर के अंदर करोड़ों कमा लेता है। भ्रष्ट राजनेताओं के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं होती?
इसके बाद नाना पाटेकर ने एक ऐसा सवाल पूछा, जो शिंदे और फडणवीस को शायद असहज कर गया। शिवसेना में फूट की वजह से दो फाड़ हुई पार्टी के बारे में बात करते हुए नाना ने पूछा - आप राजनेता तो फिर से हाथ मिला लेंगे, लेकिन उन परिवारों का क्या जो आपकी वजह से बंट जाते हैं? इसके अलावा,उन्होंने राजनीतिक बातचीत के गिरते स्तर और राजनेताओं द्वारा अभद्र भाषा के इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए।
महाराष्ट्र के नेताओं के साथ नाना पाटेकर का रिश्ता कई दशकों पुराना था। वे शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे को पिता समान मानते थे और 2013 में उन्होंने उद्धव और राज ठाकरे से अपने मतभेद भुलाकर साथ काम करने की अपील की थी। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के संस्थापक शरद पवार के साथ भी उनके करीबी रिश्ते थे। हालांकि, कभी-कभी बाल ठाकरे के साथ उनके मतभेद भी हुए। पाटेकर ने कई बार शिवसेना के संस्थापक की सार्वजनिक रूप से आलोचना की,लेकिन साथ ही उन्हें पिता समान भी माना। इसलिए, राजनीतिक नेताओं के साथ उनके रिश्ते का मतलब हमेशा राजनीतिक वफादारी नहीं था।
मार्च 2024 में नासिक में किसानों को संबोधित करते हुए नाना ने कहा था- मैं राजनीति में शामिल नहीं हो सकता,क्योंकि मैं बेबाक बोलने वाला इंसान हूं। अगर मुझे लगेगा कि नेता कुछ गलत कर रहे हैं,तो मैं यह बात उनके मुंह पर ही कह दूंगा। उनको कई पार्टियों के तरफ से लोकसभा चुनाव लड़ने का ऑफर भी मिला था। 2014 में बीजेपी उनको कान्ग्रेस की कैंडिडेट प्रिया दत्त के खिलाफ उतारना चाहती थी। दस साल बाद यानी 2024 में नाना ने कहा कि शरद पवार ने भी जब उनके नाम का जिक्र राजनैतिक गलियारों में सुना तो उनको फोन किया था। पर नाना अडिग थे कि उनको राजनीति में नहीं आना है।
नाना की राजनीतिक दोस्ती अक्सर पार्टी की सीमाओं से परे होती थी। बालठाकरे, शरद पवार, उद्धव ठाकरे और देवेंद्र फडणवीस उनके अच्छे दोस्त थे। इसके अलावा,वह अमित शाह के भी करीबी रहे। नाना का मानना था कि किसी नेता से दोस्ती का मतलब उस नेता की पार्टी का समर्थन करना नहीं है। दिसंबर 2023 में, उन्होंने नरेंद्र मोदी सरकार की तारीफ की और कहा कि वर्तमान समय में उनका कोई विकल्प नहीं है। कुछ महीनों बाद, नासिक में किसानों से बात करते हुए उन्होंने राजनीतिक पार्टियों कीआलोचना की और वोटरों से अपील की कि वे तय करें कि उन्हें कौन सी सरकार चाहिए। उनकी बातें हमेशा किसी एक राजनीतिक खेमे में फिट नहीं बैठती थीं।
वह मोदी सरकार की तारीफ भी करते थे और साथ ही किसानों, भ्रष्टाचार या राजनीतिक पार्टियों के कामकाज के तरीकों को लेकर सरकार में शामिल नेताओं की सार्वजनिक रूप से आलोचना भी करते।
2015 में, आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों की मदद करते हुए, उन्होंने शरद पवार, नारायण राणे और फडणवीस से सूखे की समस्या पर मिलकर काम करने की अपील की थी। उनका तर्क था कि सूखे की समस्या से कोई एक राजनीतिक पार्टी अकेले नहीं निपट सकती। 2023 के एक इंटरव्यू में पाटेकर ने कहा था कि राजनीति ने मुंबई को बांट दिया है और लोग धर्म और जाति को लेकर बहस में उलझ रहे हैं, जबकि राजनेता इसबंटवारे का लाभ उठा रहे हैं।
नाना राजनीतिक दलों और राजनेताओं क करीब रहे, लेकिन उन्होंने कभी कोई पद नहीं चाहा। पार्टियां उन्हें उम्मीदवार बनाना चाहती थीं, मगर उन्होंने इनकार कर दिया। नेता उनके दोस्त थे, कुछ पक्के वाले,मगर इसके बावजूद वह नेताओं से सार्वजनिक रूप से सवाल करने से हिचकिचाते नहीं थे। नाना चाहते तो किसी पार्टी की टिकट पर विधानसभा या संसद पहुंच सकते थे, लेकिन वो अपनी दुनिया में मस्त थे और राजनीति को उसमें खलल डालने देना नहीं चाहते थे।सही मायनों में नाना पाटेकर राजनीति के करीब होकर भी उससे दूर थे।