
Nandan Nilekani SIR: इंफोसिस के को-फाउंडर नंदन नीलेकणि और उनके परिवार के सदस्यों के नाम 2002 की मतदाता सूची में नहीं मिलने का मामला सामने आया है। बेंगलुरु साउथ सिटी कॉरपोरेशन के अधिकारियों के मुताबिक, उनके नाम ‘नो-मैपिंग’ श्रेणी में आए हैं। इसके बाद चुनाव आयोग की ओर से नोटिस जनरेट किए गए हैं।
हालांकि, अभी यह साफ नहीं है कि ये नोटिस नंदन नीलेकणि या उनके परिवार के सदस्यों को वास्तव में भेजे गए हैं या नहीं। अधिकारियों ने भी कहा है कि वह रिकॉर्ड की जांच करने के बाद ही इस बारे में स्थिति स्पष्ट कर पाएंगे।
अधिकारियों के मुताबिक, यह मामला मतदाता विवरण की जांच से जुड़ी चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा है। इस प्रक्रिया के तहत मौजूदा मतदाता रिकॉर्ड को पुराने रिकॉर्ड से मिलाया जा रहा है। इसी जांच के दौरान कुछ मतदाताओं के नाम 2002 की मतदाता सूची में नहीं मिले। ऐसे मामलों को ‘नो-मैपिंग’ श्रेणी में रखा गया है। नंदन नीलेकणि और उनके परिवार के नाम भी इसी श्रेणी में पाए गए।
इसके बाद उनके नाम से चुनाव आयोग के नोटिस जनरेट हुए हैं। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। अधिकारियों का कहना है कि रिकॉर्ड की जांच के बाद अगर किसी तरह की गड़बड़ी मिलती है तो उसे ठीक किया जाएगा।
बेंगलुरु साउथ सिटी कॉरपोरेशन के आयुक्त रमेश केएन ने कहा कि उन्हें फिलहाल नंदन नीलेकणि के नाम पर जनरेट हुए नोटिस की स्थिति की जानकारी नहीं है। उन्होंने कहा कि वह पूरे मामले की जानकारी लेकर रिकॉर्ड की जांच करेंगे। अधिकारियों के मुताबिक, जहां जरूरी होगा वहां रिकॉर्ड में मौजूद किसी भी अंतर या गलती को ठीक किया जाएगा। ऐसे मामलों में बिना जरूरत नोटिस जारी नहीं किया जाएगा।
इससे साफ है कि फिलहाल यह मामला मतदाता रिकॉर्ड के सत्यापन से जुड़ा है। नोटिस जनरेट होने को लेकर जानकारी सामने आई है लेकिन उनके वास्तव में नीलेकणि या उनके परिवार तक पहुंचने की पुष्टि अभी नहीं हुई है।
नंदन नीलेकणि की उम्र 71 साल है। वह बेंगलुरु स्थित इंफोसिस के को-फाउंडर और चेयरमैन हैं। उन्होंने देश की डिजिटल व्यवस्था से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट में भी काम किया है। नीलेकणि भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण यानी यूआईडीएआई के संस्थापक चेयरमैन भी रह चुके हैं। उनके कार्यकाल के दौरान आधार से जुड़ा काम आगे बढ़ा। उन्होंने 2009 से 2014 तक कांग्रेस नेतृत्व वाली केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री के दर्जे के साथ यूआईडीएआई का नेतृत्व किया था।
नीलेकणि का जन्म बेंगलुरु में हुआ था। उन्होंने 1978 में आईआईटी बॉम्बे से पढ़ाई पूरी की। उन्हें साल 2006 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।
नंदन नीलेकणि को हाल ही में परीक्षा सुधार से जुड़ी एक उच्चस्तरीय टास्क फोर्स की जिम्मेदारी भी दी गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जुलाई में इसकी घोषणा की थी।प्रधानमंत्री मोदी ने एक वीडियो संदेश में कहा था कि नंदन नीलेकणि के नेतृत्व में परीक्षा सुधार के लिए एक उच्चस्तरीय टास्क फोर्स बनाई गई है। इस टास्क फोर्स का मकसद परीक्षा व्यवस्था में सुधार और उससे जुड़ी समस्याओं को दूर करने के लिए सुझाव देना है। ऐसे समय में जब नीलेकणि केंद्र सरकार से जुड़ी इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, उनके और उनके परिवार के नाम मतदाता सूची की जांच के दौरान सामने आना चर्चा का विषय बना है।
‘नो-मैपिंग’ का मतलब ऐसे मतदाता रिकॉर्ड से है जिनके मौजूदा विवरण को पुराने मतदाता रिकॉर्ड से जोड़ा या मिलाया नहीं जा सका है। इस मामले में नीलेकणि और उनके परिवार के सदस्यों के नाम 2002 की मतदाता सूची में नहीं पाए गए। इस आधार पर उनके नाम से नोटिस जनरेट हुए हैं। लेकिन अभी इसे मतदाता सूची में किसी तरह की अनियमितता या नाम हटाने की कार्रवाई के तौर पर नहीं देखा जा सकता है।
अधिकारियों ने साफ किया है कि पहले रिकॉर्ड की जांच की जाएगी। अगर किसी तरह की गलती या अंतर मिलता है तो उसे ठीक किया जाएगा। जरूरत पड़ने पर ही आगे की प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
SIR की प्रक्रिया के दौरान नंदन नीलेकणि के अलावा कई अन्य चर्चित लोगों के मतदाता रिकॉर्ड में भी अंतर सामने आया है। इनमें कन्नड़ अभिनेता शिवराजकुमार, जेरोधा के संस्थापक निखिल कामथ और नितिन कामथ, भारत रत्न से सम्मानित वैज्ञानिक सीएनआर राव और पद्मश्री से सम्मानित हरेकला हजब्बा के नाम शामिल हैं। कुछ मामलों में पुराने मतदाता रिकॉर्ड से नाम का मिलान नहीं हो पाया, जबकि कुछ रिकॉर्ड में नाम या अन्य विवरण में अंतर मिला। अधिकारियों ने जांच और सत्यापन के बाद ऐसे मामलों को ठीक करने की प्रक्रिया शुरू की है। सीएनआर राव के मामले में अधिकारियों ने स्पष्ट किया था कि उन्हें औपचारिक नोटिस जारी नहीं किया गया था।