अमेरिका अपना प्रण तभी पूरा कर सकता है जब तक वह बिना चुनौती शक्तिशाली देश है; शक्ति ही क्षमता ला सकती है।
अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उसकी पत्नी सहित सैनिक कार्यवाही कर उठा लाना पूरे विश्व को हतप्रभ करता है, लेकिन मैं कतई अचंभित नहीं हूं। अधिकांश लोग यही मानते हैं कि यह किसी देश की संप्रभुता पर हमला है। अपने को प्रजातंत्र का हामी बताने वाला देश, यहां तक कि जिस देश की स्वतंत्रता की घोषणा हो, जब तक पूरे विश्व में एक भी देश परतंत्र रहता है, तानाशाह रहता है, अमेरिका की स्वतंत्रता पूरी नहीं होगी, ऐसा प्रण लेने वाला देश किसी दूसरे देश की संप्रभुता पर हमला कैसे कर सकता है? हतप्रभ अवश्य लगता है।
यहां यह समझना आवश्यक है कि अमेरिका अपना प्रण तभी पूरा कर सकता है जब तक वह बिना चुनौती शक्तिशाली देश है; शक्ति ही क्षमता ला सकती है। अमेरिका की आंतरिक स्थिति को भी अति मानवाधिकार, अति प्रजातंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और फ्री थिंकिंग के नाम पर चुनौती उसके ही प्रण से मिल रही है, और उसी के बनाए गए या फिर तकनीक और आर्थिक सहायता से खड़े छोटे-छोटे देश उसे चुनौती देने लगे हैं। मादुरो ने तो हद कर रखी थी; वह लगातार चुनौती दे रहा था, 'मुझे हाथ लगाकर तो देखो।'
पूरा लैटिन और दक्षिणी अमेरिका, उत्तरी अमेरिका की बेबी हैं। जब कोलंबिया ने अटलांटिक और पैसिफिक को जोड़ने वाली लेक बनाने का विरोध किया, तो तोड़कर पनामा नया देश बना कर मानव का आश्चर्य पनामा लेक बना दी और पनामा के हवाले सौंप दी। कल्पना कीजिए कल पनामा अमेरिका के हितों को चोट पहुंचाने लगे या अमेरिका को चुनौती देने लगे तो यह कैसे स्वीकार्य हो सकता है।
चीन और रूस अमेरिका को उसी के घर में चुनौती देने में लगे हैं। चीन ने वेनेजुएला में बड़ा निवेश किया है और तेल युआन में ख़रीद रहा है। अमेरिका किसी भी स्थिति में डॉलर की क्षमता को कम नहीं होने देना चाहता, क्योंकि उसकी पूरी शक्ति डॉलर में व्यापार है। कह सकते हैं कि यह कुबेर की मुद्रा है।
इसी मुद्रा के बूते हर देश को ऋण देता है, नाटो को फंड करता है, और यूएनओ को फंड करता है। यूएस डॉलर की शक्ति गई तो अमेरिका की शक्ति क्षीण होती है। यही कारण है कि भारत के साथ संबंध खराब हो रहे हैं। भारत रूस से तेल रुपये में खरीद रहा है और डॉलर में बेच रहा है, और भारत जो फ्री ट्रेड एग्रीमेंट विभिन्न देशों के साथ वन टू वन कर रहा है, वह भी देर-सबेर डॉलर को कमजोर कर रहा है। ब्रिक्स देशों से भी दूरी यही कारण है कि यूएस डॉलर को चुनौती मिल रही है।
अमेरिका एक बड़ी शक्ति है; तेल व्यापार यूएस डॉलर में है। खाड़ी देशों के साथ भी यही संधि है। इसी आधार पर अमेरिका ने तेल तकनीक और शोधन खाड़ी देशों को दी है।
भारत भी इसी स्थिति से गुजर रहा है। भारत की शत प्रतिशत शक्ति से बना बांग्लादेश भारत को चुनौती दे रहा है। श्रीलंका और नेपाल जैसे भारत की कृपा पर चलने वाले पड़ोसी देश चीन की शह पर भारत को यदा-कदा चुनौती देते दिखते हैं। जब कभी बात सीमा से बाहर जाएगी, भारत को भी ऐसी कार्यवाही करने को मजबूर होना पड़ सकता है।
कुल मिलाकर यह मानना अभी जल्दबाजी होगी कि अमेरिका का वर्चस्व कम हो रहा है; अमेरिका का पीक अभी बाकी है। भारत विश्व गुरु की भूमिका आध्यात्मिक (intangible) तो है, अभी भौतिक शक्ति (tangible strength) दूर की कौड़ी है।