
Kapil Sibal One Nation One Election:‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ यानी देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के प्रस्ताव को लेकर राज्य सभा सांसद कपिल सिब्बल ने कई सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि एक साथ चुनाव कराने से चुनावी खर्च कम हो सकता है, लेकिन इससे जुड़े कई प्रावधान ऐसे हैं, जिन पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
राज्य सभा सांसद कपिल सिब्बल ने कहा कि देश में लगभग हर महीने या दो से चार महीने के अंतराल पर कहीं न कहीं चुनाव होते रहते हैं। इन चुनावों में काफी खर्च होता है। ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ के तहत चुनाव एक साथ कराए जाने से इस खर्च को कम किया जा सकता है।
कपिल सिब्बल ने प्रस्तावित व्यवस्था में कई महत्वपूर्ण और जटिल सवाल भी सामने आएंगे। सिब्बल ने उदाहरण देते हुए कहा कि विधानसभा का कार्यकाल पांच साल है और किसी राज्य में तीन साल बाद सरकार गिर जाती है, तो शेष दो साल के लिए ही चुनाव कराया जाएगा। ऐसे में उस चुनाव से बनने वाली सरकार का कार्यकाल भी केवल दो साल का होगा।
उन्होंने कहा कि इस तरह की व्यवस्था से कई बड़े संवैधानिक और व्यावहारिक प्रश्न पैदा होंगे। सिब्बल ने ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ से जुड़ी समिति की कार्यप्रणाली को लेकर भी सवाल उठाए।
कपिल सिब्बल ने कहा कि जब संसद में कोई कानून बनाया जाता है तो उस पर व्यापक चर्चा होती है। विधेयक संसद में आने के बाद उसके विभिन्न पहलुओं पर बहस होती है। इस दौरान समाचार पत्रों में भी कानून के पक्ष और विपक्ष में विशेषज्ञों तथा विभिन्न लोगों की राय प्रकाशित होती है।
उन्होंने कहा कि महत्वपूर्ण कानूनों पर संपादकीय और सार्वजनिक बहस होना लोकतंत्र के लिए अच्छी बात है। खासकर ऐसे कानून, जिनका देश के भविष्य पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है, उन पर ज्यादा चर्चा होनी चाहिए।
सिब्बल के मुताबिक, ऐसी चर्चाओं के दौरान यह सवाल भी सामने आता है कि प्रस्तावित कानून संविधान के अनुरूप है या नहीं।
राज्य सभा सांसद ने कहा कि संसद जब कानून पारित करती है तो वह यह अंतिम रूप से तय नहीं करती कि कानून संवैधानिक है या असंवैधानिक। किसी कानून की संवैधानिक वैधता की समीक्षा उच्च न्यायपालिका करती है।
उन्होंने कहा कि यदि किसी कानून को असंवैधानिक बताते हुए चुनौती दी जाती है, तो संबंधित याचिकाओं पर अदालत सुनवाई करती है और फिर न्यायपालिका कानून की संवैधानिकता पर फैसला करती है।
सिब्बल ने कहा कि इसलिए किसी बड़े और दूरगामी प्रभाव वाले कानून को लेकर संसद में चर्चा के साथ-साथ सार्वजनिक स्तर पर भी अलग-अलग मत सामने आना जरूरी है।