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नई पिच पर सियासी खेल: भाजपा के हिंदुत्व 2.0 के सामने विपक्ष तलाश रहा नैरेटिव

Hindutva 2.0 BJP: भाजपा ने असम और पश्चिम बंगाल में हिंदुत्व आधारित राजनीति को कल्याणकारी योजनाओं और सुरक्षा के मुद्दों से जोड़कर चुनावी सफलता हासिल की। इसके साथ ही पार्टी को विपक्ष पर हमला बोलने के लिए मुस्लिम प्रतिनिधित्व का नया राजनीतिक मुद्दा भी मिल गया है।

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May 08, 2026
बंगाल-असम की जीत के बाद भाजपा ने कांग्रेस, वाम दलों व टीएमसी पर लगाया मुस्लिम पार्टी का टैग (इमेज सोर्स: ANI)

BJP Opposition Muslim Tag: पश्चिम बंगाल और असम के हालिया चुनावी नतीजों ने भारतीय राजनीति की दिशा बदलने के संकेत दिए हैं। भाजपा अब ‘हिंदुत्व 2.0’ को केवल चुनावी हथियार नहीं, बल्कि दीर्घकालिक राजनीतिक मॉडल के रूप में स्थापित करने की कोशिश में है। दूसरी ओर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, वाम दल और आम आदमी पार्टी जैसे विपक्षी दल अभी भी साझा नेतृत्व, स्पष्ट एजेंडा और प्रभावी नैरेटिव को लेकर संघर्ष करते दिख रहे हैं। ऐसे में देश की राजनीति अब केवल सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि धारणा और वैचारिक वर्चस्व की जंग बनती जा रही है।

भाजपा ने असम और पश्चिम बंगाल में हिंदुत्व आधारित राजनीति को कल्याणकारी योजनाओं और सुरक्षा के मुद्दों से जोड़कर चुनावी सफलता हासिल की। इसके साथ ही पार्टी को विपक्ष पर हमला बोलने के लिए मुस्लिम प्रतिनिधित्व का नया राजनीतिक मुद्दा भी मिल गया है। असम में कांग्रेस के 19 में से 18 विधायक मुस्लिम हैं, जबकि बंगाल में कांग्रेस और वाम दलों के सभी विधायक मुस्लिम समुदाय से आते हैं। टीएमसी में भी मुस्लिम विधायकों की संख्या उल्लेखनीय है। भाजपा अब विपक्ष को 'मुस्लिम राजनीति' तक सीमित बताकर व्यापक हिंदू मतदाता को साधने की रणनीति अपना रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस नैरेटिव को तोड़ना विपक्ष के लिए आसान नहीं होगा।

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हार्डकोर से हाइब्रिड: भाजपा का बदला हुआ फॉर्मूला

भाजपा का नया मॉडल पहले की तुलना में अधिक परिष्कृत और बहुस्तरीय माना जा रहा है। पार्टी अब केवल धार्मिक मुद्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि हिंदुत्व के साथ वेलफेयर योजनाओं, कानून-व्यवस्था और राष्ट्रवाद को भी जोड़ रही है। असम में ‘घुसपैठ’ और पहचान की राजनीति के साथ कल्याणकारी योजनाओं का संतुलन देखने को मिला, जबकि बंगाल में ‘सुरक्षा बनाम तुष्टीकरण’ का संदेश लाभार्थी वर्ग तक पहुंचाया गया। यही वजह है कि भाजपा का यह हाइब्रिड मॉडल नए सामाजिक और आर्थिक वर्गों तक पहुंच बना रहा है।

एसआइआर: डेटा से जनभावना तक की अधूरी लड़ाई

विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) को लेकर विपक्ष लगातार हमलावर है। विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया में मुस्लिम और विपक्ष समर्थक मतदाताओं के नाम बड़ी संख्या में हटाए गए। हालांकि यह मुद्दा अभी तक व्यापक जनभावना का रूप नहीं ले पाया है। भाजपा इसे पारदर्शिता और मतदाता सूची के 'शुद्धिकरण' के रूप में पेश कर रही है, जिससे विपक्ष का हमला अपेक्षित असर नहीं छोड़ पा रहा।

सोशल बनाम सांस्कृतिक इंजीनियरिंग

आगामी विधानसभा चुनावों, खासकर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में मुकाबला भाजपा की सांस्कृतिक इंजीनियरिंग और विपक्ष की सोशल इंजीनियरिंग के बीच दिखाई देगा। भाजपा जातीय सीमाओं से ऊपर उठकर व्यापक हिंदू पहचान बनाने की कोशिश कर रही है, जबकि विपक्ष अभी भी ओबीसी, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समीकरणों पर निर्भर नजर आता है। हालिया चुनावी रुझान बताते हैं कि सांस्कृतिक नैरेटिव कई जगह जातीय गणित पर भारी पड़ रहा है।

विपक्ष की कमजोर मैसेज पैकेजिंग

2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष ने संविधान बचाने और ओबीसी अधिकारों जैसे मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाया था, जिसका उसे लाभ भी मिला। लेकिन उसके बाद के चुनावों में विपक्ष अपने मुद्दों को संगठित और प्रभावशाली तरीके से पेश नहीं कर पाया। महंगाई, बेरोजगारी और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दे मौजूद होने के बावजूद विपक्ष की रणनीति बिखरी हुई और प्रतिक्रियात्मक दिखाई देती है। परिणामस्वरूप विपक्ष अक्सर भाजपा के एजेंडे पर ही खेलता नजर आता है।

गठबंधन बनाम जमीन की हकीकत

इंडिया ब्लॉक अभी तक स्थायी और एकजुट राजनीतिक मंच का रूप नहीं ले पाया है। उत्तर प्रदेश जैसे अहम राज्य में सपा और कांग्रेस के बीच तालमेल को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि ध्रुवीकरण की राजनीति के इस दौर में केवल गठबंधन पर्याप्त नहीं होगा। विपक्ष को स्पष्ट रणनीति, विश्वसनीय नेतृत्व और बूथ स्तर तक मजबूत तालमेल की जरूरत है। वहीं भाजपा पहले से ही छोटे क्षेत्रीय दलों को साथ लेकर अपने संगठनात्मक ढांचे को मजबूत बनाए हुए है।

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