
Expensive cancer drug: देश में कैंसर, स्पाइनल मस्कुलर एट्रॉफी (एसएमए) और हीमोफीलिया जैसी जानलेवा बीमारियों से जूझ रहे लाखों मरीज इलाज के साथ-साथ दवाओं की कीमत से भी लड़ रहे हैं। स्तन कैंसर की एक दवा का सालाना खर्च करीब 10 लाख रुपए है, तो एसएमए के एक इंजेक्शन की एकमुश्त कीमत 16 करोड़ रुपए तक पहुंच चुकी है। वजह है पेटेंट, जो कंपनियों को एकाधिकार देता है और कीमत तय करने की खुली छूट भी।
दूसरी ओर पेटेंट्स एक्ट की धारा 92 और 100 केंद्र सरकार को राष्ट्रीय आपातकाल, तात्कालिक जरूरत और सरकारी उपयोग के लिए पेटेंट धारक की सहमति के बिना सस्ती दवाएं बनवाने का अधिकार देती हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक देश में इन प्रावधानों का इस्तेमाल हो तो बड़ी संख्या में गरीब मरीजों को राहत मिल सकती है। ऐसे ही एक गरीब कैंसर पीडि़त मरीज की मौत के मामले में केरल हाईकोर्ट ने सरकार को पेटेंट एक्ट की धारा 92 और 100 के इस्तेमाल का सुझाव देते हुए जरूरी आंकड़े जुटाने का निर्देश दिया है।
केरल हाईकोर्ट में यह मामला स्तन कैंसर की रिबोसिक्लिब दवा से शुरू हुआ। इसका 21 दिन का कोर्स 58,000 रुपए से अधिक का पड़ता है। सालाना खर्च 10 लाख रुपए पहुंच जाता है। पड़ताल में सामने आया कि इसके अलावा भी कई दवाएं मरीजों पर बोझ बनी हुई हैं, इनमें शामिल हैं :
अब तक केवल एक बार साल 2012 में पेटेंट वाली दवा नेक्सावर (सोराफेनिब) बनाने का लाइसेंस सरकार ने दिया। इसके लिए किडनी व लीवर कैंसर के मरीजों को हर माह 2.80 लाख रुपए खर्च करने पड़ते थे। सरकार के कदम से कीमत घटकर 9 हजार (तीन फीसदी) रह गई थी। पेटेंट एक्ट की धारा 92 और धारा 100 के प्रावधानों का अब तक कोई इस्तेमाल नहीं हुआ है।
फार्मा कंपनियों नोवार्टिस और एली लिली ने केरल हाईकोर्ट में तर्क दिया कि धारा 100 केवल सरकारी उपयोग के लिए दवा बनाने की बात करता है, मरीजों को सस्ती दवा देने की नहीं। रिसर्च और पेटेंट की सुरक्षा पर कंपनियां काफी पैसा खर्च करती हैं। वे कुछ दवाएं मुफ्त भी देती हैं। कोर्ट ने साफ किया कि धारा 100 के तहत सरकारी इस्तेमाल का मतलब केवल सरकार के काम या राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे सीमित मकसद नहीं है। जनता की सेहत की रक्षा भी सरकार का अहम काम है।
जुलाई 2026 में राजस्थान मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड (आरएमएससीएल) ने अक्टूबर 2027 तक के लिए दवा खरीद का टेंडर निकाला। इसमें रिबोसिक्लिब 200 एमजी की 2,85,600 टेबलेट की दो साल की खरीद के लिए 25.04 करोड़ रुपए रखे गए। राज्य में 2024 में स्तन कैंसर के 11,488 मामले थे। विशेषज्ञों के मुताबिक 50 फीसदी मामलों में रिबोसिक्लिब की 600 एमजी रोजाना जरूरत होगी, यानी करीब 5,744 मरीजों को रोज 3 टेबलेट चाहिए। दवा में 21 दिन के कोर्स के बाद सात दिन का ब्रेक होता है। इस हिसाब से दो साल में एक मरीज को करीब 1,640 टेबलेट लगेंगी। यानी सरकारी खरीद सिर्फ 174 मरीजों के लिए काफी है, बाकी को खर्च खुद उठाना होगा।
कानून, कोर्ट और सरकार
पेटेंट दवाओं का खेल कैंसर या एड्स तक सीमित नहीं, हेपेटाइटिस और टीबी में भी बढ़ चुका है। कैंसर की दवाएं दो-दो करोड़ और एसएमए की 16-16 करोड़ तक पहुंच गई हैं। कंपनियां पुरानी दवाओं में मामूली बदलाव कर नई दवा उतार देती हैं व पेटेंट से एकाधिकार पा लेती हैं। इन्हें रोकना शासन का काम है। 'वंडर ड्रगÓ का उदाहरण सामने है। इसके दो इंजेक्शन की कीमत 42 हजार अमरीकी डॉलर (करीब 38 लाख रुपए) थी, जो साल में दो बार लगते थे। अमरीका में यह 28 हजार डॉलर में लॉन्च हुई थी। पेटेंट कार्यालय में लड़ाई लड़कर इसे 40 डॉलर (करीब 3,500 रुपए) तक लाया गया।
बिल्कुल। पेटेंट एक्ट की धारा 92 और 100 में प्रावधान है। इसके लिए सरकार को वाजिब वजह बतानी होती है, जो अधिकारी नहीं कर रहे। जब सरकार के पास आंकड़े ही नहीं होंगे कि पेटेंट के कारण हजारों महिलाएं जान गंवा रही हैं, तो प्रावधान का उपयोग कैसे होगा?
100 फीसदी है। देश में हर साल एक लाख महिलाएं स्तन कैंसर से मरती हैं। करीब 55 फीसदी पीडि़त महिलाएं एचआर /एचईआर2- (ल्यूमिनल ए) प्रारूप से ग्रस्त हैं। उन्हें एबेमासिक्लिब और रिबोसिक्लिब की जरूरत है, जिन पर सालाना 8-10 लाख रुपए खर्च होते हैं। यह परिवारों के बस में नहीं, इसलिए हजारों मौतें हो रही हैं। धारा 100 लागू करने के लिए यही आधार है।
नहीं। इन महंगी दवाओं से कंपनियों को भारत में वैसे भी ज्यादा मुनाफा नहीं हो रहा। सरकार उत्पादन करवाकर कई गुना ज्यादा मरीजों तक पहुंचाए तो मांग और कंपनियों का मुनाफा, दोनों बढ़ेगे। सरकार रॉयल्टी भी दे सकती है। मरीज मर रहे हों तो सरकार का दखल जरूरी है।
जल्द बदलाव की उम्मीद कम है। कोर्ट ने सरकार को आंकड़े जुटाने को कहा, पर समय सीमा नहीं दी। कीमत को ज्यादा माना, लेकिन धारा 100 के इस्तेमाल का फैसला सरकारी नीति पर छोड़ दिया। यानी हजारों मरीजों को सस्ती दवा के लिए अभी इंतजार करना होगा। फिर भी उम्मीद है कि यह फैसला कैंसर ही नहीं, अन्य गंभीर रोगों की महंगी दवाएं उपलब्ध कराने का रास्ता दिखाएगा।