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New PMO Office: सिंगापुर के पूर्व पीएम से सलाह लेते थे पीएम मोदी, पीएमओ के लिए लिया कई देशों से आइडिया

PMO Relocation: 95 साल से सत्ता का केंद्र रहा साउथ ब्लॉक अब संग्रहालय बन जाएगा। पीएमओ दूसरी इमारत से चलेगा।

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पीएम मोदी नेहरू के बाद सबसे लंबे समय पीएमओ में रहने वाले पीएम हैं। (फोटो सोर्स: पीआईबी)

Prime Minister Modi New PMO Office: पंडित जवाहर लाल नेहरू के बाद सबसे लंबे समय तक लगातार पीएमओ में बैठने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। अब तक वह 'साउथ ब्लॉक' में बैठते थे, अब 'सेवा तीर्थ' में बैठेंगे। 95 साल से साउथ ब्लॉक सत्ता का केंद्र रहा है। भारत की आजादी के साथ ही प्रधानमंत्री का दफ्तर भी इसी इमारत में रहा है। अब प्रधानमंत्री का दफ्तर साउथ ब्लॉक से दूसरी जगह जा रहा है।

नेहरू के जमाने से पीएमओ (तब इसे PM's secretariat या PMS कहते थे) साउथ ब्लॉक से ही चलता आ रहा था। हालांकि, उनके समय में PMS उतना ताकतवर नहीं था। वह बनाना तो चाहते थे, लेकिन सरदार पटेल ने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया था। हालांकि, इंदिरा गांधी एक तरह से ऐसा करने में सफल रही थीं। उनके जमाने में पीएमओ बड़ा पावरफुल हो गया था।

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तब से अब तक पीएमओ में कई तरह के बदलाव आए हैं। नरेंद्र मोदी ने अपने 12 साल के कार्यकाल में जगह (साउथ ब्लॉक से सेवा तीर्थ कॉम्प्लेक्स) बदलने के अलावा भी पीएमओ को बहुत बदला है।

मोदी ने अपने कार्यकाल में पीएमओ में तकनीक का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया है। नए दफ्तर में तो और भी ज्यादा डिजिटलाइजेशन किया गया है। उन्होंने प्रशासन और अफसरों को चुनने के तरीके में भी काफी सुधार किया है।

ली से सलाह और गायकवाड़ से प्रेरणा

पीएमओ में मोदी के कामकाज करने के तरीकों में से कुछ का जिक्र जेएनयू के प्रोफेसर हिमांशु रॉय ने अपनी किताब PMO: Prime Minister’s Office Through the Years में किया है। उन्होंने लिखा है कि मोदी अपने दफ्तर के प्रशासनिक काम के सिलसिले में सिंगापुर के पूर्व प्रधानमंत्री ली कुआं यू से सलाह लिया करते थे। प्रशासन के मामले में वह बड़ौदा राज के सायाजीराव गायकवाड़ से भी काफी प्रभावित और प्रेरित हैं।

डिजिटल मंच का भरपूर इस्तेमाल

वेबसाइट, ऐप या अन्य डिजिटल मंचों के जरिए आम लोगों से जो सुझाव आते हैं, उन्हें संबंधित मंत्रालयों के पास भेजा जाता है। अगर लगता है कि सुझाव अमल के लायक है तो मंत्रालय इससे संबंधित सारे ब्योरे के साथ मंजूरी के लिए पीएमओ भेजता है। वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व सूचना आयुक्त उदय माहूरकर ( सूचना आयुक्त हैं) के हवाले से हिमांशु राय ने इससे जुड़ी प्रक्रिया के बारे में विस्तार से बताया है।

उनके हवाले से रॉय लिखते हैं कि टीम MYGov ऐप से डाटा लेकर पीएमओ और संबंधित मंत्रालय को भेजती है। इस काम में देश भर से लोग सरकार की मदद करते हैं। ये राष्ट्रसेवा के रूप में रिसर्च आदि का काम कर देते हैं।

पीएमओ के अफसर चुनने का क्या है पीएम मोदी का तरीका

पीएम मोदी अपनी टीम के लिए अफसरों का चयन करने में भी इस बात का ध्यान रखते हैं कि वे तकनीक का इस्तेमाल करने में माहिर हों। उन्होंने अफसर चुनने के लिए उनके एसीआर (सालाना गोपनीय रिपोर्ट) में मिली रेटिंग को मुख्य आधार बनाने का पारंपरिक तरीका भी दरकिनार कर दिया।

पीएम मोदी ने अफसरों की रियल-टाइम रेटिंग का नया तरीका निकाला, जो न्यूजीलैंड की सरकार से प्रेरित था। टाटा ग्रुप जैसे देश के कॉरपोरेट घरानों और यूएस, यूके जैसे देशों की सरकारों से सीख लेते हुए उन्होंने अफसरों की रेटिंग के चार मुख्य पैमाने तय कराए। इन पैमानों पर परखे जाने और इसमें सफल होने के बाद अफसर का नाम 'रिटेंशन पूल' में शामिल कर लिया जाता है। फिर सेंट्रल सर्विसेज बोर्ड (सीएसबी) के पास भेजा जाता है। यह बोर्ड जॉब प्रोफ़ाइल मैच करता है। यहां से कैबिनेट की अपॉइंटमेंट कमिटी (ACC) के पास मंजूरी के लिए भेजा जाता है।

इंदिरा के जमाने में पीएमओ: संख्या ही नहीं, प्रभाव भी बढ़ा

पीएमओ में आज 300 से ज्यादा कर्मचारी-अफसर काम करते हैं। नेहरू के जमाने में इनकी संख्या 117 थी। यह संख्या समय के साथ बढ़ती गई। 1968-69 में (जब इंदिरा गांधी पीएम थीं) पीएम सचिवालय में करीब 200 लोग काम करते थे। लाल बहादुर शास्त्री के समय में पीएम का दफ्तर अपने आप में एक विभाग की तरह हो गया। इसमें एक सचिव होता था, जिसका पूरा दखल होता था। नीति निर्माण में भी उनकी भागीदारी होने लगी।

शास्त्री के समय कानूनन पीएमओ को अधिकार दिए गए, लेकिन इंदिरा के जमाने में पीएमओ का दखल कानूनी दायरे से बाहर जाकर भी होने लगा। नौकरशाहों पर उनकी निर्भरता कुछ ज्यादा ही थी। इसकी एक वजह यह बताई जाती है कि जब पहली बार वह प्रधानमंत्री बनीं तो उनके पास प्रशासनिक अनुभव की कमी थी।

इंदिरा के काल में पीएम के दफ्तर में अफसरों की संख्या बढ़ी, बल्कि इनका दखल भी बढ़ा। आपातकाल के दौरान तो पीएमओ सत्ता का समानान्तर केंद्र की तरह काम कर रहा था। लेकिन, आपातकाल हटने के बाद जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो न केवल प्रधानमंत्री सचिवालय में स्टाफ कम हो गए, बल्कि उनके अधिकार भी पहले जैसे नहीं रह गए।

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Updated on:
13 Feb 2026 05:17 pm
Published on:
13 Feb 2026 03:26 pm
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