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59 साल पहले भी बांकीपुर में रचा गया था इतिहास, एक लड़के ने नई पार्टी बनाकर सीधे CM को दी थी मात

Prashant Kishor Bankipur Win: प्रशांत किशोर की बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जीत ने 59 साल पुरानी राजनीतिक कहानी को फिर जिंदा कर दिया है। 1967 में महामाया प्रसाद सिन्हा ने पटना पश्चिम सीट से तत्कालीन मुख्यमंत्री कृष्ण बल्लभ सहाय को हराकर बड़ा उलटफेर किया था। अब पीके ने बीजेपी के गढ़ बांकीपुर में जीत दर्ज कर उसी सियासी संयोग की याद दिला दी है।
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Updated: 4 Aug 2026, 12:15 PM IST
Prashant Kishor win 19324 votes
बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर ने दर्ज की जीत (Photo-X @jansuraajonline)

Prashant Kishor Bankipur Win: चुनावी रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर ने बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में जीत दर्ज की है। पीके ने 19324 वोटों से बीजेपी प्रत्याशी नीरज कुमार को मात दी है। बांकीपुर बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का गढ़ माना जाता है। जन सुराज पार्टी के नेता ने बीजेपी के इस अभेद्य गढ़ को भेद दिया है। पीके ने उपचुनाव ही नहीं जीता है बल्कि 59 साल पुरानी एक कहानी को दोबारा जिंदा कर दिया है। 

क्या है 59 साल पुराना संयोग? 

बता दें कि 59 साल पहले 1967 में बांकीपुर में भी ऐसी ही मंजर देखने को मिला था। तब इस सीट को पटना पश्चिम के नाम से जाता था। तब एक लड़का उभरा और चुनाव में मुख्यमंत्री को मात दे दी। दरअसल, महामाया प्रसाद सिन्हा ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी एक पार्टी बनाई, जिसका नाम- जन क्रांति दल था। 

तब विधानसभा चुनाव में राज्य के तत्कालीन सीएम कृष्ण बल्लभ सहाय पटना पश्चिम सीट से उतरे थे। महामाया प्रसाद सिन्हा भी इसी सीट से उतर गए और तत्कालीन सीएम सहाय को करीब 20 हजार वोटों से हराया। इस जीत के बाद महामाया प्रसाद सिन्हा को बिहार का सीएम बनाया गया। 

पीके ने भेदा बीजेपी का किला

प्रशांत किशोर और महामाया प्रसाद सिन्हा में एक समानता यह भी है कि दोनों ने बड़े नेताओं को हराया है। 1967 में सिन्हा ने तत्कालीन सीएम को हराया और खुद मुख्यमंत्री बन गए। वहीं अब प्रशांत किशोर ने बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट पर जीत दर्ज की है। क्योंकि इस सीट से नितिन नवीन ने 2010, 2015, 2020 और 2025 में जीत दर्ज की थी। 

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद नितिन नवीन ने यह सीट छोड़ दी थी। इसके बाद बीजेपी ने उन्हें राज्य सभा भेज दिया। नितिन नवीन के सीट छोड़ने के बाद ही यहां पर उपचुनाव हुए थे।  

1967 में कांग्रेस के लिए बन गई थी चुनौती

महामाया प्रसाद सिन्हा कभी कांग्रेस के ही प्रमुख नेताओं में शामिल थे। कांग्रेस से मतभेदों के बाद उन्होंने अलग राजनीतिक मंच तैयार किया और गैर-कांग्रेसी ताकतों को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1967 के चुनाव में यही विपक्षी एकजुटता कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती बन गई। चुनाव में सिन्हा की जीत ने यह संदेश दिया कि कांग्रेस के मजबूत माने जाने वाले नेताओं को भी जनता के असंतोष का सामना करना पड़ सकता है। 

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4 Aug 2026, 12:15 PM IST
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