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चंडीगढ़ में ‘वारिस पंजाब दे’ का शक्ति प्रदर्शन, क्या पंजाब में फिर मजबूत हो रही है पंथक राजनीति?

Amritpal Singh Release Protest Chandigarh: पंजाब में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले पंथक राजनीति फिर सक्रिय होती दिख रही है। शिरोमणि अकाली दल के कमजोर होते प्रभाव के बीच ‘वारिस पंजाब दे’ अमृतपाल सिंह की रिहाई जैसे मुद्दों के जरिए अपना राजनीतिक आधार मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
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Updated: 2 Aug 2026, 3:29 PM IST
Amritpal Singh Release Protest Chandigarh
आगामी चुनाव को लेकर 'अकाली दल वारिस पंजाब दे' ने तैयारी शुरू कर दी है (Photo-IANS)

Punjab Election: पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। यह भी अटकलें लगाई जा रही है कि इस साल के अंत तक चुनाव हो सकते है। इसको लेकर सभी राजनीतिक दलों द्वारा तैयारी तेज कर दी है। इसी बीच अकाली दल वारिस पंजाब दे ने भी आगामी चुनावों को देखते हुए अपनी रणनीति भी बना ली है।

अकाली दल वारिस पंजाब दे ने राजधानी चंडीगढ़ में 29 जुलाई को सांसद अमृतपाल सिंह की रिहाई की मांग को लेकर एक विरोध प्रदर्शन किया गया। दरअसल, इस विरोध प्रदर्शन से यह भी संदेश दिया गया कि प्रदेश में पंथक राजनीतिक आज भी प्रभावशाली है। इस प्रदर्शन ने साफ कर दिया है कि पंथक मुद्दों को लेकर पंजाब में अब भी बड़ी संख्या में लोगों को लामबंद किया जा सकता है।

दशकों तक अकाली दल का रहा दबदबा

बता दें कि पंजाब की राजनीति में पंतक मुद्दों की बात हो और शिरोमणि अकाली दल का जिक्र नहीं हो, ऐसा लंबे समय तक संभव नहीं था। दशकों तक अकाली दल का सिख धार्मिक और राजनीतिक मुद्दों पर मजबूत प्रभाव रहा। पार्टी के पास जमीनी कैडर, व्यापक संगठनात्मक नेटवर्क और पंथक मुद्दों पर हजारों लोगों को जुटाने की क्षमता थी।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह राजनीतिक वर्चस्व लगातार कमजोर हुआ है। इसकी वजह लगातार चुनावी हार, 2015 की बेअदबी की घटनाओं को लेकर पैदा हुआ विवाद, पार्टी के भीतर असंतोष और नेतृत्व को लेकर मतभेद है। 

प्रदेश में आज शिरोमणि अकाली दल संगठनात्मक कमजोरी से जूझ रहा है। इसके अलावा पार्टी से अलग हुए कई गुटों ने पारंपरिक पंथक वोट को और विभाजित कर दिया है। 

‘वारिस पंजाब दे’ के लिए खुला राजनीतिक अवसर

आगामी विधानसभा चुनाव में वारिश पंजाब दे अपना राजनीतिक संभावना देख रहा है। सांसद अमृतपाल की रिहाई को लेकर निकाला गया मार्च यह बताता है कि अकाली दल के कमजोर होने के बावजूद पंथक राजनीति का प्रभाव खत्म नहीं हुआ है। 

मुख्यधारा की पार्टियों के लिए भी चुनौती

दरअसल, ‘वारिस पंजाब दे’ की बढ़ती सक्रियता पंजाब की मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों के लिए भी चुनौती पेश करती है। AAP सरकार चलाने के मुद्दों के साथ-साथ धार्मिक संस्थाओं और पंथक भावनाओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती रही है। वहीं कांग्रेस ने पंथक मुद्दों को लेकर अपेक्षाकृत आक्रामक राजनीतिक रुख अपनाने से दूरी बनाए रखी है।

दूसरी ओर, पंजाब में अपना आधार बढ़ाने की कोशिश कर रही भाजपा की भी सिख धार्मिक राजनीति में सीमित स्वीकार्यता है। ऐसे में शिरोमणि अकाली दल के कमजोर होने के बाद फिलहाल कोई भी स्थापित राजनीतिक दल पंथक नैरेटिव पर अपना एकाधिकार नहीं रखता।

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2 Aug 2026, 3:29 PM IST
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