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हथकड़ियों में वापसी के बाद भी पंजाब से नहीं थमा पलायन, अमेरिका से डिपोर्ट हुए युवाओं का नया ठिकाना बना स्पेन

अमेरिका से डिपोर्ट किए जाने के बावजूद पंजाब के कई युवाओं का विदेश जाने का सपना खत्म नहीं हुआ है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, कपूरथला के बग्रियां गांव के तीन युवाओं सहित कुछ लोग अब स्पेन पहुंच गए हैं।
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Punjab youth migration Indian deportees from US
अमेरिका से हथकड़ियों में लौटे भारतीय (फ़ोटो- X@pressSec)

Punjab youth migration: बेहतर जिंदगी और परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने का सपना पंजाब के युवाओं को लगातार विदेशों की ओर खींच रहा है। अमेरिका से डिपोर्ट और भारी कर्ज के बोझ तले दबे होने के बावजूद कई युवाओं ने विदेश जाने का अपना इरादा नहीं छोड़ा है। अब इनमें से कुछ ने अमेरिका की जगह स्पेन का रुख किया है। द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, इसमें पंजाब के कपूरथला जिले के बगड़ियन गांव के तीन युवक भी शामिल हैं, जिन्हें फरवरी 2025 में अमेरिका से डिपोर्ट किया गया था। कुछ महीने बाद ये तीनों फिर से विदेश के लिए निकल पड़े, इस बार मंजिल स्पेन थी।

फरवरी 2025 में बेड़ियों में लौटे थे भारतीय

रिपोर्ट के अनुसार 5 फरवरी 2025 को 104 भारतीयों को लेकर अमेरिका का एक सैन्य विमान अमृतसर पहुंचा था। विमान में सवार भारतीयों को हाथों में हथकड़ी और पैरों में बेड़ियां होने की वजह से पूरे देश में इस पर काफी चर्चा हुई थी। विदेश मंत्रालय के आंकड़ों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में बताया गया है कि जनवरी 2025 से जुलाई 2026 के बीच 4,800 भारतीयों को अमेरिका से डिपोर्ट किया गया।

स्पेन जाने के लिए घर रख दी गिरवी

बगड़ियन गांव के दलित मजहबी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले 42 वर्षीय मंजीत सिंह भी उन लोगों में शामिल थे जिन्हें डिपोर्ट किया गया था। इससे पहले मंजीत अपने गांव के पास एक क्लिनिक में डॉक्टर के सहायक के रूप में काम करते थे। अपनी दो छोटी बेटियों का भविष्य सुरक्षित करने और एक पक्का घर बनाने की उम्मीद में उन्होंने 30 लाख रुपये का कर्ज लिया और जनवरी 2025 में अवैध तरीके से अमेरिका में घुसने की कोशिश की। मेक्सिको सीमा पार करते समय उन्हें पकड़ लिया गया और एक महीने के भीतर वापस भेज दिया गया।

अमेरिका से लौटने के बाद यह परिवार 30 लाख रुपये के कर्ज के बोझ तले दब गया। इस कर्ज को चुकाने और अपने परिवार को भुखमरी से बचाने के लिए मनिंदर ने नवंबर 2025 में अपना घर गिरवी रख दिया और स्पेन चला गया। फिलहाल वह बार्सिलोना के पास एक खेत में मजदूर के तौर पर काम कर रहा है। घर पर उनका परिवार बहुत मुश्किल से गुजारा कर रहा है, वे बुजुर्ग माता-पिता की पेंशन, सरकारी राशन और पंजाब सरकार की महिला सम्मान योजना से मिलने वाले 3,000 रुपयों के सहारे जी रहे हैं।

दूसरे परिवार की कहानी भी ऐसी ही

बगड़ियन गांव के सुखराज सिंह की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। मेक्सिको बॉर्डर पर दीवार पार करने की कोशिश करते समय उन्हें पकड़ लिया गया था। 20 दिनों तक हिरासत में रखने के बाद हथकड़ी लगाकर उन्हें भारत भेज दिया गया। इसके बावजूद, उन्होंने विदेश जाने की कोशिश नहीं छोड़ी और अब वे स्पेन में हैं। उनके परिवार के अनुसार, उन्हें वहां एक रेस्टोरेंट में काम मिल गया है।

इस परिवार के लिए विदेश जाने का सपना हमेशा से ही मुश्किलों भरा रहा है। सुखराज के पिता जसबीर सिंह 2000 में ग्रीस गए थे, जहां उन्होंने खेतों में मजदूरी की। उनके परिवार का कहना है कि वहां उनका अनुभव बहुत बुरा रहा, जिसका असर उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ा। बाद में उनके बड़े बेटे गुरप्रीत सिंह 2012 में जर्मनी चले गए। उन्होंने वहां लगभग नौ साल काम किया, लेकिन फिर उन्हें वापस भारत लौटना पड़ा। अब वे गांव में दो गायें पालकर और उनका दूध बेचकर अपना गुजारा करते हैं।

जब जसबीर सिंह से पूछा गया कि क्या उन्हें अपने बेटे के दोबारा वापस भेजे जाने का डर नहीं है, तो उन्होंने बताया कि अब परिवार के पास कोई जमीन नहीं बची है। पंजाब में दूसरों की जमीन पर खेती करना घाटे का सौदा है और प्राइवेट सेक्टर की नौकरियों में बहुत कम वेतन मिलता है। नशे की बढ़ती समस्या के बीच, विदेश में काम करने से कम से कम एक भरोसेमंद और स्थिर आमदनी तो मिल जाती है।

15 हजार रुपये की नौकरी छोड़ स्पेन चले गए तरजीत

बगड़ियन गांव के ही एक और युवक तरजीत सिंह को भी फरवरी 2025 में अमेरिका से वापस भारत भेज दिया गया था। उनकी मां निर्मल कौर के अनुसार परिवार ने एक स्थानीय नेता से संपर्क किया। उस नेता ने तरजीत को लुधियाना की पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी दिलाने में मदद करने का प्रस्ताव दिया, जिसमें उन्हें हर महीने लगभग 15,000 रुपये मिलते। लेकिन सैलरी कम होने की वजह से तरजीत ने स्पेन जाने का फैसला किया, जहां उनका छोटा भाई धर्मजीत पहले से ही एक रेस्टोरेंट में काम कर रहा था।

गांव के सरपंच चरणजीत सिंह बताते हैं कि गांव के ज़्यादातर युवाओं ने सिर्फ 10वीं या 12वीं तक की पढ़ाई की है, जिसकी वजह से उन्हें देश के अंदर कोई अच्छा रोजगार मिलना मुश्किल हो जाता है। शिक्षा और नौकरी के मौकों की कमी,और साथ ही खेती-किसानी के संकट के कारण इन युवाओं के पास विदेश जाने के लिए अपनी जमीन या घर गिरवी रखने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचता। यही मजबूरी उन्हें भारी जोखिम उठाकर बार-बार सीमा पार करने की कोशिश करने के लिए मजबूर करती है।

स्पेन क्यों बना पसंदीदा ठिकाना

ट्रैवल एजेंटों के अनुसार, अमेरिका से डिपोर्ट होने के बाद वीजा नियमों में सख्ती के कारण कई युवक अब यूरोप का रुख कर रहे हैं। जहां अमेरिका या कनाडा जाने के लिए एजेंट 30 लाख से 50 लाख रुपये तक लेते हैं, वहीं स्पेन के लिए वीजा 8 लाख से 10 लाख रुपये में आसानी से मिल सकता है। इसके अलावा, स्पेन में वीजा की अवधि बढ़ाना या आगे चलकर वर्क परमिट पाना भी काफी आसान माना जाता है।

शेंगेन क्षेत्र में खुली सीमाओं की वजह से, ये युवा स्पेन से पुर्तगाल या इटली जैसे देशों में भी आसानी से जा सकते हैं और वहां काम की तलाश कर सकते हैं। यही कारण है कि वापस भेजे जाने के सदमे से उबरने के बाद कई लोगों ने स्पेन को अपनी नई मंजिल के रूप में चुना है।

Updated on:
21 Oct 2026 02:23 pm
Published on:
21 Oct 2026 02:23 pm