
भास्कर वैद्य
प्रभास पाटण। 36 साल पहले 25 सितंबर 1990 को सोमनाथ से अयोध्या के लिए रवाना हुई राम रथयात्रा भारतीय राजनीतिक और धार्मिक इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं में गिनी जाती है। भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में शुरू हुई इस यात्रा का उद्देश्य अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के समर्थन में जनसमर्थन जुटाना था। सोमनाथ में उस दिन मौजूद रहे लोगों में से कई आज भी कई उस आयोजन की स्मृतियां संजोए हुए हैं।
उस दिन सुबह से ही सोमनाथ मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में लोग जुटने लगे थे। आडवाणी के साथ पूर्व राजमाता विजयराजे सिंधिया भी थीं। रथ को वर्तमान दिग्विजय द्वार के पास खड़ा किया गया था। इसका स्वरूप रामायण काल में वर्णित रथ से प्रेरित बताया गया था। रथ का निर्माण मुंबई के कल्याण में किया गया था। रथ पर सूर्यवंशी प्रतीक के रूप में सूर्य का चिन्ह लगाया गया था। दोनों ओर गिर के शेरों की तस्वीरें तथा राम मंदिर का मॉडल भी प्रदर्शित किया गया था।
रथयात्रा शुरू होने से पहले सोमनाथ मंदिर में विशेष पूजा का आयोजन किया गया। आडवाणी ने 101 सफेद कमल के फूल से पूजा की और 151 ब्राह्मणों ने वैदिक मंत्रोच्चार किया। रथ प्रस्थान से पहले ‘राम यज्ञ’ की पूजा विधि भी कराई थी। जेतपुर के युवाओं ने 101 लोगों के रक्त से भरा कलश अर्पित किया। अंबाजी से आए आदिवासी समूह ने डांडिया रास प्रस्तुत किया, जबकि द्वारका के समुद्र से जुड़े समुदाय के लोगों ने आडवाणी को शंख और धर्मध्वज भेंट किए।
यात्रा के समय वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा संगठन में कार्य कर रहे थे। बाद के वर्षों में अयोध्या में राम मंदिर निर्माण से जुड़े कार्यक्रमों में उन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में भी हिस्सा लिया। रथयात्रा के राजनीतिक प्रभाव को लेकर विभिन्न राजनीतिक विश्लेषण और ऐतिहासिक विवरण सामने आते रहे हैं। भाजपा के समर्थक और कई राजनीतिक विश्लेषक इसे पार्टी के राष्ट्रीय विस्तार में महत्वपूर्ण घटनाओं में गिनते हैं।