
Ram Vilas Paswan Jayanti: लोक जनशक्ति पार्टी के संस्थापक और पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की आज जयंती है। देश के दलित नेताओं में उनका नाम शुमार था। उन्हें भारतीय राजनीति का ‘मौसम वैज्ञानिक’ कहा जाता था। वे सियासी हवाओं के रूख को पहले ही भांप लेते थे और उसी के अनुसार अपना फैसला भी लेते थे। रामविलास पासवान लगभग हर सरकार में मंत्री रहे हैं। राजनीति में कहानियां लिखने वाले रामविलास पासवान की प्रेम कहानी भी किसी से छुपी नहीं है। कैसे उन्होंने प्रेमिका के कहने पर सिगरेट और शराब छोड़ दी थी।
यह कहानी 1977 की है, जब रामविलास पासवान पहली बार लोकसभा पहुंचे थे। देश के लोकतंत्र के लिए 1977 का चुनाव काफी ऐतिहासिक था। आपातकाल के बाद देश में जनता पार्टी की लहर थी। इस लहर में हाजीपुर से रामविलास पासवान ने 4 लाख से अधिक वोटों से जीत दर्ज की थी। इसके बाद पासवान पूरे देश में चर्चा का केंद्र बन गए।
जब रामविलास पासवान सांसद बन गए थे, तब उनके आवास पर एक दिन वाणिज्य मंत्रालय में डिप्टी डायरेक्टर गुरुबचन सिंह अपनी बेटी के साथ मिलने पहुंचे। बेटी एयर होस्टेस बनाना चाहती थी।
गुरुबचन सिंह का मानना था कि जनता पार्टी के सांसद की सिफारिश से इंडियन एयरलाइंस में उसके अंतिम चयन की संभावना बढ़ जाएगी। मुलाकात का समय शाम 6 बजे था, लेकिन पासवान 8 बजे पहुंचे। कमरे में प्रवेश करते ही उनकी नजर उस गोरी, दुबली-पतली युवती पर पड़ी। पहली नजर में ही दिल दे बैठे। उस समय रीना रामविलास पासवान से 12 साल छोटी थी।
इसके बाद रामविलास और रीना की मुलाकात के बात बातचीत बढ़ गई। पारिवारिक आना-जाना भी शुरू हो गया था। रीना ने देखा कि पासवान सिगरेट, पान और चाय के बहुत बड़े शौकीन थे।
मुलाकात के दौरान एक दिन रीना ने जिद की- क्या आप शादी से पहले सिगरेट-पान नहीं छोड़ सकते? इस पर रामविलास पासवान ने तुरंत जवाब दिया- क्यों नहीं? अभी छोड़ देता हूं। इसके बाद उन्होंने सिगरेट-पान को दोबारा हाथ तक नहीं लगाया। इतना ही नहीं चाय भी छोड़ दी थी।
यह रिश्ता संसद तक चर्चा का विषय बना। लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप की किताब 'पार्लियामेंट विट एंड ह्यूमर' में इसका जिक्र है। एक सत्र में पासवान का नाम दो सूचियों में पहले नंबर पर था। आंध्र प्रदेश के कांग्रेस सांसद गोपाल रेड्डी ने मजाक उड़ाया, "पासवान को 'दो फल' मिले हैं।" लोकसभा अध्यक्ष बलराम जाखड़ और अन्य सांसदों ने भी हंसी-मजाक किया। लेकिन पासवान ने कभी इसे मुद्दा नहीं बनाया। वे अपने फैसले पर अडिग रहे।