
Ravana Temples in India: रामायण में रावण को भगवान राम के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में दर्शाया गया है। कथा के अनुसार, उन्होंने साधु का वेश धारण कर माता सीता का हरण किया और उन्हें लंका ले गए। यह घटना उनकी बहन शूर्पणखा के अपमान का बदला लेने और भगवान राम को चुनौती देने के उद्देश्य से बताई जाती है।
हालांकि, रामायण में विरोधी पात्र होने के बावजूद भारत के कई हिस्सों में रावण को सम्मान और श्रद्धा के साथ याद किया जाता है। उन्हें भगवान शिव का परम भक्त, महान विद्वान, कुशल वीणा वादक और न्यायप्रिय शासक माना जाता है। मान्यता है कि उन्होंने शिव तांडव स्तोत्र की रचना भी की थी। देश में ऐसे कई स्थान हैं, जहां रावण से जुड़ी मान्यताएं आज भी जीवित हैं। आपको बताते हैं ऐसी ही 5 जगहों के बारे में
उत्तर प्रदेश का बिसरख गांव रावण का जन्मस्थान माना जाता है। यहां दशहरे पर रावण के पुतले नहीं जलाए जाते। नवरात्र के 9 दिनों में स्थानीय लोग रावण की आत्मा की शांति के लिए यज्ञ करते हैं। यहां स्थित प्राचीन विश्रवेश्वर महादेव मंदिर रावण की स्मृति का प्रमुख केंद्र माना जाता है। मान्यता है कि मंदिर में मौजूद अष्टकोणीय शिवलिंग की स्थापना रावण के पिता महर्षि विश्रवा ने की थी।
मध्य प्रदेश के मंदसौर को रामायण के अनुसार रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका माना जाता है। इसी कारण यहां रावण को दामाद के रूप में सम्मान दिया जाता है। स्थानीय लोग उन्हें भगवान शिव का परम भक्त और महान विद्वान मानते हैं। यहां रावण की 35 फीट ऊंची प्रतिमा भी स्थापित है। दशहरे के दिन यहां रावण के निधन पर शोक व्यक्त किया जाता है और प्रार्थना की जाती है।
महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में गोंड जनजाति रावण और उनके पुत्र मेघनाद को देवता के रूप में पूजती है। फाल्गुन पर्व के दौरान विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। गोंड समुदाय का मानना है कि वाल्मीकि रामायण में रावण को उस रूप में दानव नहीं बताया गया, जैसा बाद की कुछ परंपराओं में चित्रित किया गया।
आंध्र प्रदेश के काकीनाडा में एक ऐसा मंदिर बताया जाता है, जहां रावण की भगवान शिव के प्रति भक्ति को विशेष रूप से याद किया जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, रावण ने स्वयं इस स्थान को भगवान शिव के मंदिर के लिए चुना था। यहां उन्हें शिवभक्त के रूप में सम्मान दिया जाता है।
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले स्थित बैजनाथ मंदिर का संबंध भी रावण से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए रावण ने यहां अपने दसों सिर अर्पित किए थे। स्थानीय परंपरा के अनुसार, इसी कारण बैजनाथ में दशहरा नहीं मनाया जाता और रावण के पुतले नहीं जलाए जाते।