उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार कर्नाटक मुख्यमंत्री का पदभार संभालते वाले है। वहीं, लोक निर्माण मंत्री सतीश जारकीहोली कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी (केपीसीसी) के अध्यक्ष पद के लिए सबसे मजबूत दावेदारों में से एक के रूप में उभर रहे हैं।
Satish Jarkiholi: डीके शिवकुमार के कर्नाटक के मुख्यमंत्री के रूप में पदभार संभालने की संभावना के साथ, कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी (केपीसीसी) के अगले अध्यक्ष को लेकर कथित तौर पर चर्चा शुरू हो गई है। इस लिस्ट में लोक निर्माण मंत्री सतीश जारकीहोली सबसे आगे चल रहे हैं।
नेतृत्व परिवर्तन के साथ-साथ कांग्रेस उच्च कमान राज्य में एक बड़ा संगठनात्मक फेरबदल करने की योजना बना रही है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया आज अपने इस्तीफे की घोषणा कर सकते है। कथित तौर पर पार्टी के भीतर अपने समर्थकों के लिए महत्वपूर्ण पदों की मांग की है।
कांग्रेस पदाधिकारियों के बीच जारकीहोली को एक ऐसे संगठनात्मक नेता के रूप में देखा जाता है जो विभिन्न गुटों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखने में सक्षम हैं। चल रही चर्चाओं को स्वीकार करते हुए सतीश ने दिल्ली में पत्रकारों से कहा था कि यदि पार्टी नेता मुझे कोई जिम्मेदारी लेने के लिए कहते हैं, तो मैं उस पर विचार करूंगा और अपनी राय उच्च कमान को दूंगा।
सतीश को पदोन्नत करने की संभावना ऐसे समय में अतिरिक्त राजनीतिक महत्व रखती है जब कांग्रेस मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से शिवकुमार को संभावित सत्ता हस्तांतरण का प्रबंधन करते हुए क्षेत्रीय, जातिगत और गुटीय समीकरणों को सावधानीपूर्वक संतुलित करने का प्रयास कर रही है।
बेलगावी के प्रभावशाली पिछड़े वर्ग के नेता ने लगातार केपीसीसी अध्यक्ष पद के लिए अपना दावा जताया है और समझा जाता है कि उन्होंने पार्टी नेतृत्व को पहले ही सूचित कर दिया था कि वे अपने मंत्री पद को तभी छोड़ेंगे जब उन्हें संगठनात्मक नेतृत्व सौंपा जाएगा।
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि सतीश ने बार-बार 2028 तक मुख्यमंत्री बनने की अपनी आकांक्षा व्यक्त की है, जिससे केपीसीसी का पद उनकी दीर्घकालिक राजनीतिक स्थिति के लिए एक महत्वपूर्ण मंच बन गया है।
कांग्रेस के लिए सतीश की नियुक्ति एक साथ कई राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति करती है। उत्तरी कर्नाटक में मजबूत संगठनात्मक पकड़ रखने वाले और अहिंदा तथा पिछड़े वर्ग के एक प्रमुख चेहरे के रूप में सतीश को पिछड़े वर्गों, दलितों और अल्पसंख्यकों के समर्थन को एकजुट करने के साथ-साथ राजनीतिक रूप से संवेदनशील कित्तूर क्षेत्र में पार्टी की पकड़ को मजबूत करने में सक्षम नेता के रूप में देखा जाता है।
उनकी पदोन्नति से कांग्रेस को सामाजिक प्रतिनिधित्व का एक मजबूत संदेश भेजने में भी मदद मिल सकती है, ऐसे समय में जब कर्नाटक की राजनीति में जातिगत समीकरण हावी हैं। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि उच्च कमान विभिन्न समुदायों और गुटों को समायोजित करने के लिए कम से कम तीन उपमुख्यमंत्री पद सृजित करने की संभावना तलाश रही है। लिंगायत, मुस्लिम, दलित और पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व को अंतिम सत्ता-साझाकरण फार्मूले में शामिल किए जाने की संभावना है।