
CM Siddaramaiah, DK Shivakumar
Karnataka Politics: कर्नाटक में मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर घमासान जारी है। सिद्धारमैया का बतौर मुख्यमंत्री दूसरा कार्यकाल पूरा होता नजर नहीं आ रहा है। इससे पहले भी प्रदेश के दो मुख्यमंत्री एस. निजलिंगप्पा और देवराज उर्स का दूसरा कार्यकाल अधूरा ही रहा गया। ऐसी खबर आ रही है कि कांग्रेस उन्हें उनके कट्टर विरोधी डीके शिवकुमार से बदलने और उन्हें राज्यसभा भेजने की तैयारी कर रही है। हालांकि चुनाव में केवल दो साल बचे है। कांग्रेस के उच्च कमान के करीबी माने जाने वाले धनवान राजनेता डीके शिवकुमार को 2023 के मुख्यमंत्री पद के लिए नजरअंदाज किए जाने से पार्टी में उनकी अहमियत का पता चलता है। दरअसल, सिद्धारमैया कांग्रेस शासित सभी राज्यों में एकमात्र ओबीसी मुख्यमंत्री हैं। वहीं दूसरी ओर, शिवकुमार प्रभावशाली वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं। राहुल गांधी के सामाजिक न्याय अभियान के बीच सिद्धारमैया को अचानक मुख्यमंत्री बनाना कांग्रेस के लिए अच्छा संकेत नहीं होगा।
कांग्रेस अच्छे से जानती है कि 78 वर्षीय सिद्धारमैया कोई साधारण क्षेत्रीय नेता नहीं हैं। वे कर्नाटक कांग्रेस के सबसे बड़े नेता बने हुए हैं, ठीक वैसे ही जैसे भाजपा के लिए बीएस येदियुरप्पा थे। एक जनप्रिय व्यक्ति जिनका प्रभाव क्षेत्रों और समुदायों से परे है। यह सब तब भी है जब यह जोशीला नेता एक किसान परिवार से आता है और राजनीति में अपनी पीढ़ी के पहले व्यक्ति के रूप में उभरा है। वर्तमान में वे देश में कांग्रेस सरकार का नेतृत्व करने वाले एकमात्र ओबीसी सदस्य हैं और एक ऐसे अनुभवी नेता हैं जिन्होंने इस वर्ष फरवरी में पेश किए गए बजट सहित रिकॉर्ड 17 राज्य बजट पेश किए हैं।
सिद्धारमैया का पिछड़े, अल्पसंख्यक और अहिंदा गठबंधन (अल्पसंख्यक, पिछड़े वर्ग और दलितों के लिए कन्नड़ संक्षिप्त नाम) में प्रभाव अद्वितीय है, जिसे उन्होंने दशकों की मेहनत से बनाया था। राज्य के जाति सर्वेक्षण के अनुसार, अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति जनसंख्या का 25 प्रतिशत है, जबकि मुस्लिम लगभग 13 प्रतिशत हैं। कुरुबा समुदाय, जिससे सिद्धारमैया संबंधित हैं, जनसंख्या का 7 प्रतिशत है।
साल 2023 के चुनावों में अहिंडा गठबंधन द्वारा सिद्धारमैया को दिए गए मजबूत समर्थन ने कांग्रेस को राज्य के द्विध्रुवीय जातिगत परिदृश्य (वोक्कालिगा-लिंगायत विभाजन) को दरकिनार करने में मदद की। यही एक बड़ा कारण रहा है कि कांग्रेस उच्च कमान ने लगातार शिवकुमार के बजाय सिद्धारमैया का समर्थन किया है। जनता परिवार के विभिन्न गुटों में अपनी भूमिका निभाने के बाद 2006 में ही कांग्रेस में शामिल होने के बावजूद, सिद्धारमैया ने अपनी कई भाग्य योजनाओं, विशेष रूप से अन्ना भाग्य योजना के माध्यम से और कर्नाटक के लिए एक अलग झंडा हासिल करने में भी कर्नाटक की राजनीति में अपनी छाप छोड़ी है।
यह कहावत सच है कि एक बार धोखा खाने के बाद इंसान सावधान हो जाता है। कांग्रेस को अच्छी तरह पता है कि कुछ साल पहले राजस्थान में अशोक गहलोत बनाम सचिन पायलट का मामला कैसे सामने आया था, जब 2020 में टोंक के विधायक लगभग 18 बागी विधायकों के साथ हरियाणा में डेरा डाले हुए थे।
लंबे समय से शिवकुमार और उनके समर्थन उनको मुख्यमंत्री बनाने की मांग कर रहे है। अब शिवकुमार के लिए उत्तराधिकार का रास्ता साफ होने की उम्मीद है। उनकी संगठनात्मक कुशलता ने कांग्रेस की 2023 की वापसी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हालांकि, शिवकुमार कोई मामूली नेता नहीं हैं। वे कांग्रेस को वह सब कुछ प्रदान करते हैं जिसकी सिद्धारमैया में कमी थी - एक ऐसा नेता जो पार्टी संगठन में गहराई से जुड़ा हुआ है, पार्टी तंत्र पर मजबूत पकड़ रखता है। उसकी उम्र भी अब उनके पक्ष में है। शिवकुमार 64 वर्ष के हैं और कर्नाटक में कांग्रेस के लिए दीर्घकालिक उम्मीद की किरण साबित हो सकते हैं।
सिद्धारमैया लंबे समय से मुख्यमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार रहे हैं और कांग्रेस में उन्हें व्यापक समर्थन प्राप्त है। इसका मुख्य कारण यह है कि कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं द्वारा सिद्धारमैया को अभी भी बाहरी माना जाता है। सिद्धारमैया पहले जेडी(एस) में थे, 2006 में ही कांग्रेस में शामिल हुए थे। लेकिन पार्टी में उनका उदय अभूतपूर्व रहा है, उन्होंने दो बार उपमुख्यमंत्री और फिर मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया है।
सफलता के बावजूद, नौ बार विधायक रहे सिद्धारमैया दो लोकसभा चुनाव हार गए। इसी वजह से उन्होंने राज्य की राजनीति में ही बने रहने का फैसला किया, जिससे उन्हें काफी लाभ मिला, जैसा कि हम देख चुके हैं। शायद यही कारण है कि सिद्धारमैया राष्ट्रीय राजनीति में जाने से हमेशा हिचकिचाते रहे हैं।
शिवकुमार की सबसे बड़ी खूबी उनकी संगठनात्मक क्षमता है। यही कारण है कि उन्हें कांग्रेस का सबसे कुशल संकटमोचक भी माना जाता है। जब भी आंतरिक असहमति ने कांग्रेस सरकारों को खतरे में डाला है, शिवकुमार उच्च कमान के सबसे भरोसेमंद व्यक्ति रहे हैं। गांधी परिवार से उनकी घनिष्ठता जगजाहिर है।
इसके अलावा, वे देश के सबसे धनी राजनेताओं में से एक हैं, जिनकी घोषित संपत्ति 1,400 करोड़ रुपये से अधिक है। यही कारण है कि उन्हें कांग्रेस का "धनवान राजनेता" कहा जाता है। शिवकुमार शक्तिशाली वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं। माना जाता है कि उनके प्रभाव ने 2023 में जेडी(एस) के एक बड़े हिस्से के वोट कांग्रेस की ओर मोड़ दिए थे। हालांकि, सिद्धारमैया के विपरीत, उन्हें जन नेता नहीं माना जाता है। उनका प्रभाव पुराने मैसूर क्षेत्र तक ही सीमित माना जाता है।
Updated on:
28 May 2026 01:14 pm
Published on:
28 May 2026 01:02 pm
बड़ी खबरें
View Allराष्ट्रीय
ट्रेंडिंग
