Iran-Israel War: शशि थरूर ने कहा कि खाड़ी में जारी युद्ध से भारत सबसे अधिक प्रभावित हो रहा है। सरकार को जल्द से जल्द इस मामले में ठोस कदम उठाने चाहिए। हमारा यहां बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है।
Iran-Israel War: ईरान के खिलाफ जारी जंग को एक हफ्ता बीत गया है। 28 अक्टूबर से जारी जंग के बीच ईरान को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई मारे जा चुके हैं। पश्चिम एशिया में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों और दूतावासों पर ईरान ने बेलेस्टिक मिसाइल से हमला किया। कुछ मिसाइलें दुबई में नागरिक इलाके में भी गिरी है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव पर भारत की भी नजर है। वहां 40 लाख से अधिक भारतीय आबादी रहती है। ऐसे में भारत का वहां बहुत कुछ दांव पर है। ऐसे में कांग्रेस सांसद और संसद की विदेशी मामलों की स्थाई समिति के अध्यक्ष शशि थरूर ने इंडियन एक्सप्रेस में लेख लिखा है।
शशि थरूर ने इंडियन एक्सप्रेस में अपने आर्टिकल में लिखा कि ईरान-इजरायल जंग ने पश्चिम एशिया के नाजुक क्षेत्रीय व्यवस्था को तोड़ दिया है। साथ ही, वैश्विक अर्थव्यवस्था को हाई-वोल्टेज अनिश्चितता की स्थिति में धकेल दिया है। उन्होंने कहा कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा और लाखों नागरिकों का जीवन खाड़ी देशों में स्थिरता होने से सीधे तौर पर जुड़ा हैं। यह हमारे राष्ट्रीय हितों और विकास और तरक्की की हमारी उम्मीदों के लिए एक सीधा खतरा है। यह कोई विदेशी खबर नहीं है।
उन्होंने कहा कि सामरिक मामलों के विशेषज्ञ इस युद्ध को समझने की कोशिश कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांत इस युद्ध को सही नहीं ठहराते हैं। UN चार्टर का आधार राज्यों की संप्रभुता और उनकी सीमाओं की अखंडता का सम्मान है। सेना का प्रयोग मना है, सिर्फ आत्मरक्षा के मामलों में छूट है। फिर भी इस युद्ध में एक भी ऐसी शर्त नहीं है, जो पूरी हुई हो। युद्ध में देश के मुखिया और सरकार को कभी भी मिलिट्री टारगेट नहीं बनाया जाता।
उन्होंने कहा कि अमेरिका के एपिक फ्यूरी का मकसद ईरान को न्यूक्लियर हथियार बनाने से रोकना है, जबकि जेनेवा और ओमान की बातचीत में ईरान इस पर सहमत भी हो गया था। उन्होंने कहा कि जेनेवा की बातचीत में तो ईरान पूरी तरह से न्यूक्लियर प्रोग्राम बंद करने पर आ गया था। थरूर ने कहा कि युद्ध के जरिए शासन बदलना शायद ही कभी, या शायद कभी भी, मुमकिन हो। थरूर ने कहा कि आधुनिक हथियार इमारतों को जमींदोज कर सकते हैं, लेकिन नई सरकार नहीं बना सकते हैं। उन्होंने चेताया कि इस युद्ध से ईरान में एक नाकाम देश का माहौल पनपेगा, जो कहीं ज्यादा खतरनाक हो जाएगा।
थरूर ने आगे कहा कि युद्ध का आर्थिक नुकसान भी उतना ही चौंकाने वाला है। इलाके के एयरस्पेस और हॉर्मुज स्ट्रेट के बंद होने के चलते वैश्विक अर्थव्यवस्था शॉकवेव का सामना कर रही है। उन्होंने कहा कि दुनिया का 25 फीसदी कच्चा तेल इसी चोक प्वाइंट से गुजरता है, जिसके बंद होने से वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 65 डॉलर प्रतिबैरल से बढ़कर 83 डॉलर प्रतिबैरल पहुंच गई है।
थरूर ने आगे कहा कि जंग छेड़ने के स्ट्रेटेजिक लॉजिक को लेकर अजीब सवाल बने हुए हैं। क्या ईरान में सरकार बदलने का यह जुआ एक यूनिपोलर वेस्ट एशिया बनाने की इच्छा से प्रेरित था। जिसमें अभी बैन किए गए ईरानी तेल को एक ज्यादा फ्रेंडली सरकार के तहत दुनिया के मार्केट में शामिल किया जा सके? यह थ्योरी सही भी लगती है, क्योंकि अमेरिका चाहता है कि यूरोप का रूसी ऊर्जा पर से निर्भरता कम हो। ईरान में शासन बदलकर वहां चीन का दबदबा कम किया जाए।
थरूर ने कहा कि इस युद्ध में भारत के लिए बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है। खाड़ी में काम करने वाले लाखों भारतीयों का भविष्य अब अनिश्चित है, जबकि हजारों यात्री दुबई जैसे ट्रांजिट हब से कटे हुए हैं, हालांकि हाल ही में फंसे हुए यात्रियों को निकालने से यह दबाव कम हुआ है। सस्ते तेल की हमारी घरेलू प्राथमिकता कमजोर हो रही है, जिससे उस विकास को खतरा है जो हमारे विकास की कोशिशों को बढ़ावा देती है। भारत की डी-एस्केलेशन और डिप्लोमेसी की मांग एक जरूरत है। हमारे विकास के रास्ते के लिए हमारे बड़े पड़ोस में शांति और स्थिरता की जरूरत है। हमें इंटरनेशनल कम्युनिटी को यह मांग करते हुए लीड करना चाहिए कि सभी दिशाओं में उड़ रही मिसाइलें रुक जाएं, इससे पहले कि पश्चिम एशिया की खाई इतनी चौड़ी हो जाए कि हम सभी को निगल जाए।