
Election Commissioners: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर अब बहस केवल वोटर लिस्ट में बदलाव तक सीमित नहीं रही। द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि निर्वाचन आयोग के दो आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं पर कई बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं। इसी रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए और कहा कि पूरे SIR अभ्यास की वैधानिकता की समीक्षा जरूरी है।
निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर राजनीतिक बहस बुधवार को उस समय और तेज हो गई, जब कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने द इंडियन एक्सप्रेस की उस पड़ताल पर प्रतिक्रिया दी, जिसमें दो चुनाव आयुक्तों की ओर से SIR से जुड़ी प्रक्रियाओं पर लगातार आपत्तियां दर्ज किए जाने का दावा किया गया है।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर औपचारिक आपत्ति जताई। रिपोर्ट में कहा गया है कि आपत्तियों का संबंध नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाताओं के नाम जोड़ने-हटाने, नाम बहाल करने, अपील और चुनावी डेटा के प्रबंधन जैसे अहम विषयों से था।
तिवारी ने इसी रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि यदि दो चुनाव आयुक्त लगातार फैसलों पर आपत्ति दर्ज कर रहे थे और इसके बावजूद वही प्रक्रियाएं आगे बढ़ती रहीं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आयोग में निर्णय आखिर किस प्रक्रिया के तहत लिए जा रहे थे। उन्होंने इसे आयोग के बाहर किसी प्रभाव की आशंका से भी जोड़ा, हालांकि यह उनका राजनीतिक आरोप है, स्थापित तथ्य नहीं।
कांग्रेस सांसद ने खास तौर पर Form-6 में किए गए बदलाव का उल्लेख किया। यह फॉर्म नए मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होता है। द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, SIR से जुड़े एक नए सवाल को इसमें जोड़ा गया था। रिपोर्ट में कहा गया है कि चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने मई में इस बदलाव की वैधानिक प्रक्रिया पर सवाल उठाया था, जबकि बाद में संधू ने भी इसे कथित तौर पर अनधिकृत और अवैध बताया।
यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू भी सामने आता है। Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023 की धारा 18 के अनुसार आयोग का कामकाज जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से होना चाहिए। मतभेद की स्थिति में फैसला बहुमत के आधार पर किया जाता है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि दोनों आयुक्तों ने चुनावी रोल से जुड़े डिजिटल सिस्टम और उसके एक्सेस को लेकर चिंता जताई थी। मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि SIR का असर बड़े पैमाने पर मतदाता सूचियों पर पड़ा है। द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए थे। यह संख्या ड्राफ्ट रोल से हटाए गए नामों की है और इसे स्थायी रूप से मतदान अधिकार समाप्त होने के बराबर नहीं माना जाना चाहिए।
तिवारी ने इन घटनाक्रमों के आधार पर SIR प्रक्रिया को शुरुआत से ही निरस्त किए जाने और पूरे मामले में संवैधानिक कार्रवाई की संभावना पर सवाल उठाया है। हालांकि, इन दावों और आपत्तियों के बीच अंतिम कानूनी स्थिति संबंधित प्रक्रियाओं, दस्तावेजों और सक्षम संस्थाओं के निर्णय से ही तय होगी।