
Social Media Companies POCSO Act:राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री के मामलों में सोशल मीडिया कंपनियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार से संबंधित सामग्री की शिकायतों को स्थानीय पुलिस तक पहुंचाने के संबंध मेंसुप्रीम कोर्टके निर्देशों का अब भी पालन नहीं किया जा रहा है। कानूनगो ने आरोप लगाया कि सोशल मीडिया कंपनियां कानूनी प्रावधानों से बचने की कोशिश कर रही हैं और भारत के बच्चों के साथ छल (धोखा) कर रही हैं।
उन्होंने कहा कि देश में बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए पॉक्सो (POCSO) जैसा सख्त कानून मौजूद है। इसके बावजूद बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामलों में कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं होना गंभीर चिंता का विषय है।
प्रियंक कानूनगो ने पॉक्सो एक्ट के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि कानून की धारा 19 में बच्चों के साथ होने वाले यौन अपराधों की जानकारी स्थानीय पुलिस थाने को देने का प्रावधान है। उन्होंने कहा कि धारा 20 के तहत यह जिम्मेदारी सोशल मीडिया कंपनियों पर भी लागू होती है।
उन्होंने पॉक्सो नियमावली के नियम 11 का हवाला देते हुए कहा कि बच्चों के यौन शोषण से संबंधित अपराधों की जानकारी पुलिस को दी जानी चाहिए। कानूनगो के मुताबिक, सोशल मीडिया कंपनियां इस जिम्मेदारी से बचने के लिए अदालतों का रुख कर रही हैं।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि स्थानीय पुलिस थाने को सूचना देने की जिम्मेदारी कानून का हिस्सा है और इससे कोई भी बच नहीं सकता। इसके बावजूद संबंधित निर्देशों का पूरी तरह पालन नहीं होने का दावा करते हुए उन्होंने इस पर सवाल उठाए।
एनएचआरसी सदस्य ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री के प्रसार को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि बड़ी संख्या में बच्चे यौन शोषण का शिकार हो रहे हैं और उनकी आपत्तिजनक वीडियो सामग्री बनाई जा रही है।
कानूनगो ने कहा कि इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म पर ऐसी सामग्री की बिक्री के मामले सामने आए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि मेटा जैसी कंपनियां इन प्लेटफॉर्म पर विज्ञापनों के माध्यम से कमाई करती हैं, जबकि बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री को लेकर जवाबदेही तय होनी चाहिए।
उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस को सूचना देने के बजाय सोशल मीडिया कंपनियां एनजीओ और महंगे वकीलों के माध्यम से अदालतों में कानूनी दांव-पेच का सहारा ले रही हैं। कानूनगो ने कहा कि बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए कानून का प्रभावी क्रियान्वयन जरूरी है।
प्रियंक कानूनगो ने आरोप लगाया कि सोशल मीडिया कंपनियां महंगे वकीलों की मदद ले रही हैं और विदेशी फंडिंग प्राप्त करने वाले एनजीओ के जरिए अदालतों में अपना पक्ष रख रही हैं। उनके अनुसार, इस पूरी प्रक्रिया में बच्चों के हितों और उनके न्याय पाने के अधिकार को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में कानून के तहत जेल की सजा का प्रावधान है। इसके बावजूद बच्चों के हितों के बजाय कंपनियों के हितों में काम किए जाने पर उन्होंने चिंता जताई।
कानूनगो ने कहा कि बच्चों के यौन शोषण से संबंधित मामलों में कानून का पालन सुनिश्चित करना जरूरी है, ताकि पीड़ितों को न्याय मिल सके और इस तरह के अपराधों पर प्रभावी कार्रवाई हो सके।
इससे पहले प्रियंक कानूनगो ने गुरुवार सुबह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट के जरिए इस मामले को उठाया था। उन्होंने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश वर्ष 2024 में पारित हुआ था, लेकिन अब तक उसका पालन नहीं किया गया है। उन्होंने यह भी बताया कि मामले में गुरुवार को फिर से सुनवाई हो रही है।
कानूनगो ने अपनी पोस्ट में कहा कि भारत का पॉक्सो कानून बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी शिकायतों की जानकारी स्थानीय पुलिस को देने के संबंध में स्पष्ट है। इसके बावजूद सोशल मीडिया कंपनियां सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद भी इस जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रही हैं।
उन्होंने कहा कि यह मामला कई वर्षों से लंबित है और बड़ी संख्या में बच्चे न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। कानूनगो ने सवाल उठाया कि जब बच्चे खुद अदालत में जाकर अपना पक्ष नहीं रख सकते और महंगे वकीलों का खर्च नहीं उठा सकते, तो उनके अधिकारों की पैरवी कौन करेगा?
प्रियंक कानूनगो ने सोशल मीडिया कंपनियों से सवाल किया कि वे बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी घटनाओं की जानकारी स्थानीय पुलिस को देने से क्यों बच रही हैं। उन्होंने यह भी पूछा कि जब बच्चों के खिलाफ अपराधों को रोकने के लिए स्पष्ट कानूनी प्रावधान मौजूद हैं, तो उनके क्रियान्वयन में देरी क्यों हो रही है।
उन्होंने मेटा की विज्ञापन से होने वाली कमाई का जिक्र करते हुए सवाल किया कि जब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस तरह की सामग्री फैलती है, तो उससे मिलने वाले ट्रैफिक और विज्ञापन से होने वाली कमाई का लाभ किसे मिलता है।एनएचआरसी सदस्य ने जोर देकर कहा कि बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामलों में कानून के प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। उन्होंने इस मुद्दे को बच्चों की सुरक्षा, कानूनी जवाबदेही और न्याय से जुड़ा गंभीर विषय बताया।