
Brahma Chellaney on US China G2: अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते संपर्क के बीच G2 यानी अमेरिका-चीन के संभावित अनौपचारिक द्विपक्षीय ढांचे को लेकर चर्चा तेज है। रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ डॉ. ब्रह्मा चेलानी ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि ऐसे अनौपचारिक G2 का असर अमेरिका के अपने सहयोगी देशों पर पड़ सकता है। उन्होंने खास तौर पर ताइवान, जापान और भारत की चिंताओं का जिक्र किया है।
चेलानी के मुताबिक, ताइवान को डर है कि अमेरिका-चीन बातचीत में उसकी सुरक्षा सौदेबाजी का मुद्दा बन सकती है। अगर वॉशिंगटन और बीजिंग किसी बड़े समझौते पर पहुंचने की कोशिश करते हैं तो ताइवान से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा हो सकती है।
ब्रुकिंग्स के एक विश्लेषण में भी अमेरिका-चीन G2 की संभावनाओं को लेकर ताइवान की ऐसी चिंताओं का जिक्र किया गया है। हालांकि, इसमें यह भी कहा गया कि अमेरिकी चीन नीति में बदलाव को लेकर अभी कई अनिश्चितताएं हैं।
चेलानी ने कहा कि जापान को चिंता है कि चीन के प्रति अमेरिका का नरम रुख अमेरिका-जापान गठबंधन को कमजोर कर सकता है। जापान की सुरक्षा व्यवस्था में अमेरिका की अहम भूमिका है। ऐसे में वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच किसी बड़े समझौते का असर टोक्यो की रणनीति पर पड़ सकता है।
चेलानी के विश्लेषण के मुताबिक, ऐसी स्थिति में जापान भारत और ऑस्ट्रेलिया के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को और मजबूत करने पर जोर दे सकता है।
भारत के संदर्भ में चेलानी का कहना है कि G2 का ढांचा बहुध्रुवीय एशिया की सोच से मेल नहीं खाता। भारत ऐसी क्षेत्रीय व्यवस्था की वकालत करता है जिसमें केवल दो बड़ी शक्तियां ही फैसले तय न करें। इंडो-पैसिफिक में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच सहयोग इसी व्यापक रणनीतिक संतुलन का हिस्सा है। इसके मुकाबले G2 मॉडल में अमेरिका और चीन के बीच सीधे संवाद और समझौते ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
फिलहाल अमेरिका और चीन के बीच कोई औपचारिक G2 व्यवस्था नहीं है। G2 अभी एक रणनीतिक अवधारणा के तौर पर चर्चा में है। दोनों देशों के बीच व्यापार, सुरक्षा, ताइवान और क्षेत्रीय प्रभाव जैसे कई मुद्दों पर मतभेद भी हैं।
ऐसे में G2 की चर्चा का बड़ा सवाल यही है कि अगर अमेरिका और चीन दुनिया के बड़े मुद्दों पर अपनी भूमिका बढ़ाते हैं तो भारत, जापान और ताइवान जैसे देशों की रणनीतिक स्थिति पर इसका क्या असर होगा। चेलानी का तर्क है कि ऐसी स्थिति में अमेरिका के सहयोगी देशों को वॉशिंगटन की नीतियों में संभावित बदलाव को देखते हुए अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है।